चीन में ओलंपिक मेडल लाने पर भी 'खिलाड़ियों की कड़ी आलोचना' क्यों ?
टोक्यो ओलंपिक में चीन की मिक्स्ड डबल्स टीम ने पिछले हफ़्ते जब टेबल टेनिस में सिल्वर मेडल जीता तो उन्होंने आँखों में आँसू भरकर चीन की जनता से माफ़ी माँगी.
चीन की महिला टेबल टेनिस खिलाड़ी लिउ शाइवेन ने कहा, "ऐसा लगता है कि मैंने टीम का सिर नीचा किया है....मैं सबसे माफ़ी माँगती हूँ."
उनके पार्टनर शू शिन ने कहा, "पूरे देश की नज़रें इस फ़ाइनल पर थीं. मुझे लगता है कि चीनी टीम ये रिज़ल्ट नहीं स्वीकार सकती."
चीनी टीम को फ़ाइनल मैच में जापान के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. इस हार के बाद चीन के लोगों ने सोशल मीडिया पर ग़ुस्सा और नाराज़गी ज़ाहिर की.
चीन में लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म वीबो पर किसी ने लिखा कि मिक्स्ड डबल्स की जोड़ी ने देश का सिर नीचा किया है.
'मेडल गँवाया यानी देश को धोखा दिया'
कई लोगों ने आरोप लगाया कि मैच के रेफ़री का झुकाव जापानी खिलाड़ियों की तरफ़ था और उन्होंने जापान के पक्ष में फ़ैसले सुनाए.
ओलंपिक के बीच चीन में इन दिनों 'राष्ट्रवाद का बुखार' कुछ ज़्यादा ही तेज़ है और लोगों के लिए मेडल टैली खेल की उपलब्धि से कहीं ज़्यादा बन गई है.
विशेषज्ञों ने बीबीसी से बातचीत में कहा, 'अति राष्ट्रवादी' चीनियों के लिए ओलंपिक मेडल मिस करने का मतलब है कि 'आप देशभक्त नहीं हैं.'
नीदरलैंड्स के लीडेन एशिया सेंटर के डॉक्टर फ़्लोरियन श्नाइडर कहते हैं, "चीनी जनता के एक तबके के लिए ओलंपिक मेडल टैली देश की क्षमता और प्रतिष्ठा का रियल टाइम ट्रैकर होता है."
वो कहते हैं, "इस संदर्भ में देखें तो अगर कोई खिलाड़ी दूसरे देश की टीम से हार जाता है तो माना जाता है कि उसने देश का सिर नीचा किया है- या यहाँ तक कि उसने देश को धोखा दिया है."
जापान को लेकर प्रतिक्रिया
टेबल टेनिस का मैच जापान से हारने को लेकर चीन के लोग ज़्यादा गुस्से में इसलिए थे क्योंकि दोनों देशों के सम्बन्ध उतार-चढ़ाव भरे रहते हैं.
उत्तरी चीन के मंचूरिया पर 1931 से पहले जापान का अधिपत्य था और इसे लेकर बड़े स्तर पर युद्ध हुआ था. इस युद्ध में लाखों चीनी लोग मारे गए थे. इस युद्ध की कड़वी यादें आज भी दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घोलती हैं.
श्नाइडर के अनुसार यही वजह है कि चीन के राष्ट्रवादियों के लिए टेबल टेनिस का यह मैच महज़ एक मैच नहीं बल्कि 'युद्ध' था.
मैच के नतीजे के बाद सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म वीबो पर जापान विरोधी भावनाओं की बाढ़ सी आ गई. लोगों ने दोनों खिलाड़ियों को भला-बुरा कहा.
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ताइवान से हार पर ग़ुस्सा
मगर ये सिर्फ़ जापान से होने वाले इस टेनिस मैच की ही बात नहीं है.
जापान के ली जुनहुई और लिउ यूचेन को लोगों ने इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वो बैडमिंटन डबल्स के फ़ाइनल में ताइवान के खिलाड़ियों से हार गए थे.
वीबो पर एक शख़्स ने लिखा, "आप दोनों लोग क्या नींद में थे? आपने थोड़ी-सी भी कोशिश नहीं की. क्या बकवास है!"
चीन और ताइवान के बीच हाल के सालों में सम्बन्ध और ज़्यादा तनावपूर्ण हुए हैं.
चीन ताइवान को ख़ुद से अलग हुआ एक हिस्सा भर मानता है जबकि कई ताइवानी लोग इससे अलग राय रखते हैं.
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गोल्ड मेडल जीतने वाली खिलाड़ी की भी ट्रोलिंग
चीन में जिन खिलाड़ियों को निशाना बनाया गया उनमें से एक शार्पशूटर यांग कियान हैं. ये तब हुआ जब उन्होंने टोक्यो ओलंपिक में अपना पहला गोल्ड मेडल जीता.
लोगों ने उनकी एक पुरानी पोस्ट को लेकर उन्हें भला-बुरा कहना शुरू कर दिया जिसमें वो अपने नाइकी जूतों का कलेक्शन दिखा रही थीं.
चीनी लोग नाइकी से इसलिए ख़फ़ा हैं क्योंकि नाइकी ने शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों से जबरन मज़दूरी कराए जाने के आरोपों के कारण वहाँ की कपास इस्तेमाल करना बंद कर दिया था.
एक शख़्स ने लिखा, "एक चीनी खिलाड़ी के तौर पर आपने ये नाइकी के जूते क्यों जुटा रखे हैं? आपको तो नाइकी का बहिष्कार करने वालों की अगुआई करनी चाहिए?"
इसके बाद यांग ने यह पोस्ट डिलीट कर दी थी.
यांग की साथी वांग लुयाओ को इसलिए ग़ुस्से का सामना करना पड़ा क्योंकि वो महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफ़ल स्पर्धा के फ़ाइनल में जगह नहीं बना पाईं.
एक शख़्स ने कमेंट किया, "हमने आपको ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा था या बस यूँ ही कमज़ोर दिखने के लिए?"
चीन के 'लिटिल पिंक्स'
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ लुयाओ को लोगों ने इतना भला-बुरा कहा कि वीबो को 33 यूज़र्स का अकाउंट सस्पेंड करना पड़ा.
चीन के लोग ओलंपिक में खिलाड़ियों की हार पर जिस तरह दुखी और नाराज़ हो रहे हैं वो अनोखा है.
लोवा स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉक्टर जोनाथन इसके पीछे काफ़ी हद तक 'लिटिल पिंक्स' को ज़िम्मेदार मानते हैं.
लिटिल पिंक्स उन चीनी युवाओं को कहा जाता है जो इंटरनेट पर बहुत आक्रामक होकर राष्ट्रवादी बातें लिखते-बोलते हैं.
हाल के वर्षों में चीन में राष्ट्रवाद की भावना और ज़्यादा उफान पर आई है क्योंकि वैश्विक स्तर पर इसका प्रभाव बढ़ा है और पश्चिमी देशों पर इसके विकास में बाधा डालने के आरोप लगे हैं.
टोक्यो ओलंपिक ऐसे समय में आया है जब इसी साल जुलाई में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे हुए हैं. इस मौके पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने भाषण में कहा था कि कोई भी विदेशी ताक़त चीन को परेशान नहीं कर सकती.
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'अति राष्ट्रवाद यानी बाघ की सवारी'
डॉक्टर श्नाइडर कहते हैं, "अधिकारियों ने लोगों को समसामयिक मुद्दों को राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नज़रिए से देखने की आदत डलवाई है. चीनी जनता को बताया गया है कि देश की सफलता सबसे ज़्यादा मायने रखती है इसलिए खिलाड़ियों को टोक्यो में सफल होना ही पड़ेगा."
हालाँकि डॉक्टर श्नाइडर इस ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि यह ज़रूरी नहीं है कि ऐसे आक्रामक लोग चीन की बाक़ी जनता का भी प्रतिनिधित्व करते हों.
सोशल मीडिया पर खिलाड़ियों की आलोचना और ट्रोलिंग के बीच ऐसे लोग भी सामने आए जिन्होंने चीनी टीमों और खिलाड़ियों का समर्थन किया.
चीन की सरकारी मीडिया ने भी लोगों से ज़्यादा 'तर्कपूर्ण' ढंग से सोचने को कहा.
इसके बावजूद विशेषज्ञों को डर है कि यह ख़तरनाक दौर है क्योंकि ऐसा लगता है कि राष्ट्रवाद कुछ ज़्यादा ही हावी हो गया है.
डॉक्टर जोनाथन कहते हैं, "कम्युनिस्ट पार्टी अपने फ़ायदे के लिए इंटरनेट पर राष्ट्रवाद को भुनाने की कोशिश करती है, लेकिन मौजूदा स्थिति दिखाती है कि जब चीनियों पर यह भावना हावी हो जाती है तो सरकार के लिए भी उन पर काबू पाना मुश्किल हो सकता है."
वो कहते हैं, "राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाना बाघ की सवारी करने जैसा है. एक बार आप इस पर सवार हो गए तो फिर उतरना बहुत मुश्किल होता है."
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