Pakistan Election: ना नेताओं के भड़काऊ बयान, ना महंगाई पर घमासान.. पाकिस्तान में चुनावी शोर क्यों नहीं है?

Pakistan Election News: आज फरवरी महीने की तीसरी तारीख है और आठ फरवरी को पाकिस्तान में आम चुनाव होने जा रहे हैं। हालांकि, पार्टियों और उम्मीदवारों के बैनर और पोस्टर्स तो सड़कों पर लगे हुए हैं, लेकिन लोगों का कहना है, कि जो चुनाव पहले एक त्योहार की तरह होता था, वो इस बार बिल्कुल खामोश है।

ना तो महंगाई पर बात हो रही है और ना ही नेताओं के ही उत्तेजक बयान आ रहे हैं, जो अकसर भारत और पाकिस्तान में होने वाले चुनाव में आम बात मानी जाती है।

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रावलपिंडी के कॉमर्शियल क्षेत्र में दुकान चलाने वाले 46 साल के मालिक मुहम्मद इकरार समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बात करते हुए बताते हैं, कि "मुझे याद नहीं है, कि हमारा क्षेत्र पहले कभी इतना खामोश हुआ था।"

लेकिन पाकिस्तान में चुनाव प्रचार धीमा क्यों चल रहा है? मतदाताओं में कोई उत्साह क्यों नहीं है? आइये समझने की कोशिश करते हैं।

महंगाई और कार्रवाई ने इलेक्शन का स्वाद फीका

पाकिस्तान में हर हद को पार कर गई महंगाई और राजनीतिक अनिश्चितता ने, देश के शोर-शराबे वाले चुनाव अभियानों को फीका कर दिया है। उम्मीदवार और चुनाव प्रचार की सामग्री बनाने वाले निर्माता.. दोनों का कहना है, कि महंगाई इतनी ज्यादा है, कि चुनाव प्रचार करना काफी मुश्किल हो गया है।

आम नेताओं के लिए काफी ऊंची कीमत पर चुनावी सामग्री खरीदना काफी मुश्किल साबित हो रहा है।

8 फरवरी को होने वाला आम चुनाव, देश का पहला ऐसा चुनाव है, जब देश में महंगाई दर 30 प्रतिशत से ज्यादा है, देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है, डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत काफी ज्यादा गिर चुकी है और देश 3 अरब डॉलर के आईएमएफ प्रोग्राम के सहारे चल रहा है।

दूसरी सबसे बड़ी वजह पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान पर क्रैकडाउन को लेकर है, जिससे पीटीआई समर्थक निराश और उदास हो चुके हैं। चुनाव से ठीक पहले इमरान खान को ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत 10 सालों की सजा सुनाने के बाद उन्हें तोशाखाना मामले में पत्नी बुशरा बीबी के साथ 14 सालों की एक और सजा सुना दी गई है।

जनता में इन सजाओं का संदेश साफ तौर पर गया है, कि इमरान खान को सेना ने शांत कर दिया है। इमरान खान को अब जिंदगी भर जेल में रखने के लिए, या कम से कम इस चुनाव से पूरी तरह से साफ कर दिया गया है।

इमरान खान पिछले साल अगस्त से जेल में बंद हैं। उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह बैट छीन लिया गया है और अलग अलग वजहों से करीब 90 प्रतिशत उम्मीदवारों के नामांकन रद्द कर दिए गये हैं। जो उम्मीदवार बचे हैं, वो उन्हीं सीटों पर बचे हैं, जहां उनके जीतने की संभावना नहीं है।

पाकिस्तान के कॉमर्शियल कैपिटल कराची में इमरान खान की पार्टी का झंडा बेचने वाले जवाद जिवानी ने कहा, कि "पिछले चुनावों में बहुत सारी गतिविधियां थीं और हमारे कारोबार में तेजी आई थी, लेकिन इस चुनाव में हमारा कारोबार पिछले चुनाव की तुलना में आधे से काफी कम रह गया है।"

स्थिति ये है, कि इलेक्शन लड़ रहे उम्मीदवार काफी कम सभाओं का आयोजन कर रहे हैं। पहले के चुनावों में ट्रकों, अलग अलग गाड़ियों पर उम्मीदवार अपने लिए प्रचार करवाते थे, दिन भर लॉउडस्पीकर बजते रहते थे, और चुनावी शोर से जो जनता परेशान हो जाती थी, उसे इस बार चुनावी सन्नाटा खरोंच रहा है।

कराची में प्रिंटिक मशीन चलाने वाले सैयद अरसलान हैदर ने रॉयटर्स से कहा, कि पिछले चुनाव के बाद से एक वर्ग फुट बैनर की कीमत 130 प्रतिशत बढ़ गई है। लाहौर के प्रिंटर अब्दुल अजीज ने कहा, कि स्टिकर छापने की लागत लगभग 70 प्रतिशत और पोस्टर छापने की लागत लगभग 90 प्रतिशत बढ़ गई है।

इसके अलावा टीवी विज्ञापन भी खामोश हैं।

प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार बिलावल भुट्टो जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सीनेटर ताज हैदर ने कहा, कि उनकी पार्टी ने लागत बचाने के लिए सार्वजनिक रैलियों और मुद्रित सामग्री के बजाय टीवी को चुना है।

मुताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के सीनेटर फैसल सुब्ज़वारी ने कहा, "अगर हमारे पास हमारे पिछले अभियानों की तरह संसाधन होते, तो हम इसे बेहतर कर सकते थे।"

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चुनाव में इमरान खान फैक्टर

पाकिस्तान के राजनीतिक दलों को मुख्य रूप से देश और विदेश के धनी उम्मीदवारों और दानदाताओं द्वारा वित्त पोषित किया जाता है, लेकिन चुनाव की तारीख पर अनिश्चितता ने इस फंडिंग को प्रभावित किया है।

अगस्त में संसद भंग होने के बाद नवंबर में चुनाव होने थे, लेकिन जनगणना के कारण इसे फरवरी तक के लिए टाल दिया गया। जनवरी में, पाकिस्तान की सीनेट के सदस्यों ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए इसमें और देरी की मांग की।

व्यवसायियों और उम्मीदवारों का कहना है, कि इमरान खान की पीटीआई की अनुपस्थिति, और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली सैन्य प्रतिष्ठान की बेईमानी की आशंका ने भी चुनाव प्रचार पर असर डाला है। लोगों का कहना है, कि पाकिस्तान की अवाम अब मान रही है, कि चुनाव फिक्स है और करोड़ों रुपये सिर्फ नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री बनाने के लिए ढोंग के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं।

इमरान खान, जिनकी पार्टी ने पिछला चुनाव जीता था, उनका कहना है, कि सेना उन्हें सत्ता से दूर रखना चाहती है, लेकिन सेना इससे इनकार करती है।

पीटीआई उम्मीदवार और जेल में बंद पार्टी के उपाध्यक्ष शाह महमूद कुरेशी की बेटी मेहरबानो कुरेशी ने कहा, कि लोग इमरान खान को लेकर अपना समर्थन दिखाने और पीटीआई की प्रचार सामग्री लटकाने से डरते हैं।

उन्होंने कहा, कि "जहां भी हमने इमरान खान के बैनर पोस्टर्स लगाए हैं, उन्हें तोड़ दिया गया है, या लोग उन्हें लगाने से बहुत डरते हैं, क्योंकि जैसे ही कोई घर झंडा लगाता है, तो फिर पुलिस उन्हें धमकाने के लिए पहुंच जाती है।"

डराने-धमकाने के बारे में पूछे जाने पर लाहौर पुलिस की ओर से तत्काल कोई टिप्पणी नहीं आई।

पीटीआई के पूर्व संसद सदस्य और वर्तमान उम्मीदवार खुर्रम शेर ज़मान ने भी कहा, कि PTI के लिए धन जुटाना चुनौतीपूर्ण हो गया है, क्योंकि जो भी कारोबारी हैं, वो सेना के डर से पार्टी को फंड देने के लिए तैयार नहीं होती है।

उन्होंने कहा, कि "वे शायद प्रतिष्ठान से डरे हुए हैं। हम जो भी खर्च कर रहे हैं, वह अपनी जेब से कर रहे हैं।''

खासकर चुनाव से पहले जिस तरह से नवाज शरीफ को ब्रिटेन से लाया गया और उनके चुनाव लड़ने के लिए रास्ते के हर कांटे को हटाया गया, उससे साफ हो गया है, कि नवाज शरीफ ही पाकिस्तान के अगले प्रधानंत्री बनने वाला वाले हैं। ऐसे में जब जनता को पहले से ही चुनावी रिजल्ट पता है, तो फिर उत्साह भी खत्म हो चुका है।

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