तुर्की अब इसराइल की ओर इतनी उम्मीद से क्यों देख रहा?

अर्दोआन
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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इसी हफ़्ते मंगलवार को कहा था कि इसराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग जल्द ही तुर्की के दौरे पर आ सकते हैं.

अर्दोआन ने संवाददाताओं से यह भी कहा था कि इसराइल और तुर्की के बीत ऊर्जा समझौता भी हो सकता है.

अर्दोआन ने कहा था, "हम अभी इसराइली राष्ट्रपति हर्ज़ोग से बातचीत कर रहे हैं. वह तुर्की के दौर पर आ सकते हैं. इसराइली प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट का भी सकारात्मक रुख़ है. हम अपनी तरफ़ से पारस्परिक फ़ायदे के लिए सभी ज़रूरी कोशिश करेंगे. नेता के रूप में हमें एक दूसरे से लड़ने के बजाय शांति के साथ रहना चाहिए."

तुर्की की कमान रेचेप तैय्यप अर्दोआन के हाथ में आने के बाद से इसराइल के साथ देश के द्विपक्षीय संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. फ़लस्तीन के मुद्दे पर अर्दोआन इसराइल को लेकर हमलावर रहते हैं लेकिन द्विपक्षीय रिश्तों को उन्होंने कभी ख़त्म नहीं किया.

इसी सप्ताह गुरुवार को तुर्की के विदेश मंत्री मेव्लुत चोवाशुग्लू ने फ़ोन पर इसराइल के विदेश मंत्री याएर लैपिड के बात की. 13 सालों में ये पहली बार था जब दोनों देशों के आला नेताओं ने एकदूसरे से बात की थी.

अर्दोआन ने 2005 में इसराइल का दौरा भी किया था. पिछले साल जब मई महीने में इसराइल की तत्कालनीन बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार ने गज़ा में हमास के ख़िलाफ़ हमले शुरू किए थे तो अर्दोआन ने सभी इस्लामिक देशों से एकजुट होने की अपील की थी.

इसराइली प्रधानमंत्री नेफ्टाली बेनेट और विदेश मंत्री याएर लैपिड
Gil Cohen-Magen/Pool via REUTERS
इसराइली प्रधानमंत्री नेफ्टाली बेनेट और विदेश मंत्री याएर लैपिड

एक वक़्त था जब तुर्की मुसलमान बहुल देश के रूप में इसराइल का मज़बूत सहयोगी था, लेकिन अर्दोआन के सत्ता में आने के बाद से चीज़ें तेज़ी से बदलीं.

फ़लस्तीनियों के मुद्दे पर अर्दोआन इसराइल के ख़िलाफ़ हमेशा से आक्रामक रहे हैं. लेकिन 2010 के बाद चीज़ें और ख़राब हुईं. 2010 के मई महीने में मावी मारमारा पोत फ़लस्तीनी समर्थकों के लिए सामान लेकर जा रहा था.

इसी दौरान इसराइली कमांडो ने पोत पर रेड कर दी. यह पोत ग़ज़ा के लिए जा रहा था और इसराइली कमांडो ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में हमला बोला था. इस हमले में तुर्की के दस लोगों की जान गई थी. तब से ही तुर्की और इसराइल के रिश्तों में ऐसी दरार आई, जो सालों तक नहीं भरी.

लेकिन अर्दोआन के बारे में कहा जा रहा है कि वह अपने राजनीतिक करियर के सबसे मुश्किल दौर में हैं. देश में महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी है, राष्ट्रीय मुद्रा लीरा भी ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर हुई है, विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति बहुत ठीक नहीं है और अमेरिका के बाइडन प्रशासन ने उन्हें अलग-थलग कर रखा है. ऐसे में अर्दोआन पुरानी दुश्मनी भुलाकर इसराइल, सऊदी और यूएई से दोस्ती करने में लगे हैं.

मावी मारमारा पोत
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मावी मारमारा पोत

इसराइली अख़बार टाइम्स ऑफ़ इसराइल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "तुर्की के राष्ट्रपति अपने घर में बढ़ते आर्थिक संकट के बीच इसराइल को लेकर ऐसी बातें कर रहे हैं. आर्थिक मुश्किलों के बीच अर्दोआन क्षेत्रीय प्रतिद्ंवद्वियों से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं."

रिपोर्टों के मुताबिक़ "अमेरिका ने विवादित भूमध्यसागर गैस पाइपलाइन से पीछे हटने का फ़ैसला किया. इस फ़ैसले के बाद से अर्दोआन इसराइल की ओर देख रहे हैं. इसराइल के साथ-साथ तुर्की का ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी ग्रीस और अन्य देशों का एक समूह पूर्वी भूमध्यसागर से यूरोप के लिए एक संयुक्त गैस पाइपलाइन बनाने पर काम कर रहे हैं. तुर्की ने इस फ़ैसले का विरोध किया है. वह इस पर अपना दावा कर रहा है."

इस पाइपलाइन का अमेरिका के पूर्ववर्ती ट्रंप प्रशासन ने भी समर्थन किया था. लेकिन इसराइली और अन्य मीडिया में रिपोर्ट छपी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने पिछले हफ़्ते ग्रीस को गोपनीय तरीक़े से सूचित किया था कि वो अब इस प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं होंगे.

कहा जा रहा है कि अमेरिका ने ऐसा तुर्की से तनाव पैदा होने की आशंका के कारण किया. अर्दोआन ने इस रिपोर्ट को लेकर कहा है, "मुझे लगता है कि इस प्रोजेक्ट के वित्तीय मामलों को देखने के बाद अमेरिका ने इससे पीछे हटने का फ़ैसला किया है. मैं इसराइल से भूमध्यसागर से होते हुए यूरोप गैस पाइपलाइन ले जाने के लिए पुराने आइडिया पर बात कर रहा हूँ. हम इसे अब भी कर सकते हैं. अगर इसे यूरोप ले जाना है तो ये केवल तुर्की के ज़रिए ही जा सकता है." अर्दोआन के इस बयान को मिडल ईस्ट आई ने प्रकाशित किया है.

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इसराइली अख़बार हअर्त्ज़ की रिपोर्ट के अनुसार, इसराइली सरकार ने जुलाई 2020 में ईस्टमेड प्रोजेक्ट में 6 अरब यूरो के निवेश की मंज़ूरी दी थी. इस प्रोजेक्ट के तहत इसराइल और साइप्रस से यूरोप तक नई गैस पाइपलाइन बनाने की योजना है. इस प्रोजेक्ट को लेकर बहस तब शुरू हुई जब इस इलाक़े के बड़े गैस उपभोक्ता तुर्की ने प्रतिद्वंद्वी साइप्रस और इसराइल से गैस नहीं ख़रीदने की घोषणा की.

इस प्रोजेक्ट के लक्ष्य के बारे में कहा जा रहा है कि इसके ज़रिए रूस पर गैस को लेकर यूरोप की निर्भरता को कम करना है. इसराइली अख़बार हअर्त्ज़ के अनुसार, यह पाइपलाइन 1,900 किलोमीटर लंबी होगी, 550 किलोमीटर जम़ीन के भीतर और 1,350 किलोमीटर भूमध्यसागर के भीतर होगी. इस पाइपलाइन के ज़रिए गैस आपूर्ति का लक्ष्य 10 अरब क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष रखा गया है. इसे 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य है लेकिन समय और लंबा खींच सकता है.

हअर्त्ज़ की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका पीछे हटने की वजह रूस से तनाव और तुर्की हैं. रूस यूरोप में सबसे बड़ा गैस आपूर्तिकर्ता है. माना जा रहा है कि नई गैस पाइपलाइन के प्रोजेक्ट के पूरा होने से उसके हित प्रभावित होंगे. दूसरी तरफ़ तुर्की से अमेरिका के रिश्ते ख़राब हैं और अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर ईरान के साथ जारी वार्ता में दोनों देशों का समर्थन चाहता है.

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