तालिबान - चीन अफ़ग़ानिस्तान को लेकर क्यों चिंतित है, क्या है उसकी रणनीति
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी से उत्पन्न संभावित खालीपन के बावजूद चीन अब भी ये मानता है कि अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया के लिए बहुपक्षीय वार्ता ही सबसे सही ज़रिया है.
अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति किस कदर गंभीर है इसका अंदाज़ा चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से हाल ही में दी गई उस चेतावनी से लगाया जा सकता है जिसमें उसने अपने नागरिकों से जल्द से जल्द अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की अपील की है.
पाकिस्तान के साथ अपने राजनयिक संबंध के 70 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान 7 जुलाई को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पाकिस्तान से क्षेत्रीय शांति को कायम रखने, बातचीत के माध्यम से राजनीतिक समाधान तलाशने में अफ़ग़ानिस्तान की पार्टियों का समर्थन करने, अफ़ग़ानिस्तान से सुरक्षा ख़तरों को पड़ोस के देशों में फैलने की संभावना को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने और इस क्षेत्र में पूरी स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिए एक दूसरे का हाथ थामकर चलने का आग्रह किया.
इससे पहले 23 जून को संयुक्त राष्ट्र में चीन के दूत झांग जून ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अफ़ग़ानिस्तान में शांति और सुलह प्रक्रिया का समर्थन करने का आग्रह किया था.
जहां एक तरफ़ विदेशी मीडिया में यह रिपोर्ट आई कि चीन अफ़ग़ान मामलों में संभवतः और अधिक प्रत्यक्ष किरदार निभाने के उचित अवसर की तलाश में है, तो स्थानीय मीडिया के माध्यम से चीन ने इसे ख़ारिज करते हुए बहुपक्षीय वार्ता में अपनी भूमिका निभाने को प्राथमिकता दी.
भले ही अमेरिकी सेना की वापसी से एक संभावित खालीपन पैदा हो रहा हो, चीन का मानना है कि बहुपक्षीय वार्ता ही अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया के लिए सबसे अच्छा रास्ता है.
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'हस्तक्षेप'
यह समझते हुए कि अगर अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता ग़लत हाथों में पड़ गई तो इससे न केवल इस देश और इसके आसपास के देशों को नुक़सान पहुंचेगा बल्कि यह इस क्षेत्र में चीन के हितों को भी प्रभावित कर सकता है. लिहाज़ा अमेरिकी सैनिकों की वापसी के समय के निकट आने के साथ ही चीन अफ़ग़ान मुद्दे पर सक्रिय रूप से मध्यस्थता करता दिख रहा है.
हालांकि वो चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर वो खुलेआम शामिल होता हुआ न दिखे.
क्योंकि वो ये नहीं चाहता है कि पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका की तरह वह भी अफ़ग़ान फंदे में फंसे.
बल्कि वो इस क्षेत्रीय समूह में अपनी कहीं मज़बूत भूमिका को लेकर रचनात्मक हस्तक्षेप का प्रयोग कर रहा है.
इसमें शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ), और चीन+सेंट्रल एशिया (सी+सी5) के साथ ही चीन, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय वार्ता की व्यवस्था शामिल हैं.
जैसा कि चीन की मीडिया में बताया गया है कि इन समूहों के अधिकतर सदस्य अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देशों से हैं.
चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ़ कन्टेम्पररी इंटरनेशनल रिलेशन (सीआईसीआर) में सीनियर रिसर्च फेलो हू शीशेंग ने 8 जून को अपनी एक राय प्रकाशित करवाई जिसमें चीन के रचनात्मक हस्तक्षेप की व्याख्या करते हुए राय दी गई है.
हू ने कहा कि यह शांतिपूर्ण है क्योंकि इसमें विवादों को सुलझाने के लिए मंत्रणा यानी बातचीत करने का सुझाव दिया गया है.
उन्होंने इसे वैध और रचनात्मक बताते हुए इसके पक्ष में तर्क दिये.
उन्होंने कहा कि यह वैध है, क्योंकि बल प्रयोग का विरोध करता है और दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने के सिद्धांत का पालन करता है, और रचनात्मक इस नज़रिए से कि यह किसी मुद्दे पर एक उद्देश्यपूर्ण और निष्पक्ष रुख अपनाता है.
हू ने कहा कि चीन, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच बनी त्रिपक्षीय व्यवस्था अफ़ग़ान मुद्दे पर चीन के रचनात्मक हस्तक्षेप का एक उदाहरण है.
उन्होंने इसे अमेरिकी सैन्य युग के बाद अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण को लेकर सबसे अहम व्यवस्था बताया.
22 जून को पीएलए-डेली में लिखे अपने ओपिनियन पीस में रिसर्च सेंटर इन अफ़ग़ानिस्तान के प्रोफ़ेसर झू योंगबियाओ ने कहा कि चीन, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच बना यह त्रिपक्षीय समूह किसी भी अन्य व्यवस्था से बेहतर है और निश्चित ही यह इस पूरे इलाके में स्थिरता लाएगा.
चीन की अफ़ग़ानिस्तान में रुचि की वजह बेल्ट रोड परियोजना तो नहीं?
चीन की मीडिया में अफ़ग़ानिस्तान में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में चीन की रुचि के बारे में लिखा गया है.
हालांकि अब ये वहां की सुरक्षा स्थिति पर निर्भर करेगा.
3 जून को हुई त्रिपक्षीय वार्ता में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के विस्तार की संभावना पर चर्चा की. इस इलाके में एक ख़ास बीआरआई कार्यक्रम अफ़ग़ानिस्तान में शांति और विकास कार्यक्रमों के पनपने में मदद करेगा.
चीन की ऑनलाइन मीडिया Guancha.cn में 20 अप्रैल को छपे एक ओपिनियन लेख में चीन के उज़्बेकिस्तान में रहे पूर्व राजदूत यू होंगजुंन ने कहा कि चीन अपनी बीआरआई योजना में अफ़ग़ानिस्तान को शामिल करना चाहता है. लेकिन अब भी ये योजना अपनी प्रारम्भिक अवस्था में ही बना हुआ है.
यू कहते हैं, अगर अफ़ग़ानिस्तान भविष्य में लंबे समय तक शांति और स्थिरता बनाए रखने में कामयाब हुआ तो वहां बीआरआई परियोजना संभव है.
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भविष्य में तालिबान की सरकार के बारे में क्या हैं विचार
चीन की मीडिया में एक संभावना यह भी देखी जा रही है कि अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी हो सकती है. स्थिति को भांपते हुए चीन की सरकार का यह भी मानना है कि शांति वार्ता में तालिबान को शामिल करना, इसकी सफलता के मद्देनज़र एक अहम कदम होगा.
हॉन्ग-कॉन्ग स्थित सरकार समर्थक मीडिया चाइना रिव्यू न्यूज़ एजेंसी में 7 जून को छपे एक ओपिनियन में शंघाई इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनैशनल स्टडीज़ के शोधकर्ता लियू ज़ोंगई ने लिखा, चीन ने शांति प्रक्रिया में तालिबान की राजनीतिक स्थिति का सम्मान करने की आवश्यकता की बात की क्योंकि वो बड़ी संख्या में पश्तूनों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
लियू लिखते हैं, "इन्हें अफ़ग़ान राजनीति के ढांचे से बाहर नहीं किया जा सकता ऐसा किया तो अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे का कभी समाधान ही नहीं हो सकेगा."
हालांकि, चीन के कुछ विशेषज्ञों ने सत्ता संभालने के बाद तालिबान इसे कैसे देखेगा इस पर संदेह ज़ाहिर किया है.
2 मई को सरकारी न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ ने अफ़ग़ानिस्तान की स्थित पर अपना एक विश्लेषण छापा. इसमें लान्झोउ यूनिवर्सिटी के झू योंगबियाओ का हवाला देते हुए कहा है कि तालिबान शांति वार्ता को अंतिम लक्ष्य के बजाय एक रणनीति के रूप में देखता है क्योंकि वो अभी अपने नेतृत्व में एक राजनीतिक शासन स्थापित करने में जुटा है.
28 जून को Guancha.cn पर एक इंटरव्यू में शंघाई कोपरेशन ऑर्गेनाइजेशन रिसर्च सेंटर के निदेशक पान गुआंग ने कहा, वर्तमान स्थिति की देखते हुए, चीन शायद अलग-अलग चैनलों के ज़रिए तालिबान से संपर्क कर रहा है.
उन्होंने कहा कि चीन को आश्वासन दिया है कि वो चीन के लिए ख़तरा नहीं बनेगा और पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक आंदोलन का समर्थन नहीं करेगा. लेकिन यह कहना मुश्किल है कि क्या तालिबान चीन को दिए गए अपने इस वादे पर खरा उतरेगा.
आगे कि स्थिति क्या होगी, ये अभी से समझना मुश्किल है.
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