China को लेकर भारत की 'मनमोहन सिंह वाली नीति'? ताइवान पर अभी तक क्यों नहीं आया बयान, जानिए
पड़ोस जारी भयानक तनाव के बावजूद भारत की खामोशी को लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत का इस मुद्दे पर चुप रहना जानबूझकर लिया गया फैसला है...
नई दिल्ली, अगस्त 05: चीन जिस अंदाज में ताइवान स्ट्रेट में बमों की बारिश कर रहा है और जिस तरह से ड्रैगन ने ताइवान को ब्लॉक किया है, उससे आशंका बन रही है, कि किसी भी वक्त चीन ताइवान पर आक्रमण कर सकता है और चीनी मीडिया लगातार ताइवान और अमेरिका के खिलाफ आग उगल रहा है। वहीं, ताइवान के खिलाफ चीनी आक्रामकता की दुनियाभर में निंदा की जा रही है, लेकिन, भारत ने अभी तक अपने सबसे बड़े दुश्मन के खिलाफ एक बयान तक जारी नहीं किया है, जिसको लेकर सवाल उठ रहे हैं और पूछा जा रहा है, कि क्या भारत अपने दुश्मन चीन के खिलाफ भी दोस्त 'रूस वाली नीति' अपना रहा है।

नई दिल्ली की खामोशी का क्या मतलब?
ताइवान के जलडमरूमध्य में काफी तेजी से स्थिति में परिवर्तन हो रहा है और तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। चीन पिछले 30 घंटे से ज्यादा वक्त से भीषण हथियारों के साथ लाइव ड्रिल और सैन्य अभ्यास कर रहा है। वहीं, चीन 6 समुद्री दिशाओं से ताइवान को ब्लॉक कर चुका है और मंगलवार से चीन नये स्तर पर सैन्य अभ्यास करने वाला है, जिसको लेकर ग्लोबल टाइम्स ने कहा है, कि ये असली युद्ध की तरह ही है। वहीं, एशिया में पैदा हुए इस तनाव को लेकर तमाम अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन अभी तक नई दिल्ली की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है और ऐसा लगता है, कि भारत ने इस तनाव को 'खामोशी से पढ़' रहा है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पेन्ह के नोम में हो रहे एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस यानि आसियान सम्मेलन में इस संवेदनशील विषय का जिक्र तक नहीं किया और कोई बयान जारी नहीं किया।

जानबूझकर बयान नहीं दे रहा भारत?
वहीं, पड़ोस जारी भयानक तनाव के बावजूद भारत की खामोशी को लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है, कि भारत का इस मुद्दे पर चुप रहना जानबूझकर लिया गया फैसला है, क्योंकि नई दिल्ली, अमेरिका और चीन के बीच एक संवेदनशील मुद्दे पर विवाद से बचने का प्रयास करती है, और यह भी देखते हुए कि भारत ने इस क्षेत्र के अन्य देशों के विपरीत साल 2010 के बाद से 'एक चीन नीति' का संदर्भ नहीं दिया है और ऐसा लग रहा है, कि भारत 'वन चायना पॉलिसी' से अब दूर जा रहा है, लिहाजा भारत इस संवेदनशील मुद्दे से बचने की कोशिश कर रहा है। गुरुवार को भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में भाग लिया और अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका और वियतनाम के विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत की।

दोस्तों की बातचीत से 'दु्श्मन गायब'
भारतीय विदेश मंत्री ने दोस्त देशों के विदेश मंत्रियों के साथ हुई इस बैठक को 'प्रोडक्टिव' और 'वार्म' कहा और उन्होंने कहा, कि आसियान देशों के साथ "इंडो-पैसिफिक, यूएनसीएलओएस, कनेक्टिविटी, कोविड-19, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, यूक्रेन और म्यांमार सहित कई मुद्दों पर चर्चा की है।" लेकिन, भारतीय विदेश मंत्री ने अपने बयान में ताइवान की स्थिति का कोई उल्लेख नहीं किया। वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग ने जयशंकर-ब्लिंकेन बैठक के बाद जो बयान जारी किया उसमें भी रूस तो शामिल था, लेकिन चीन गायब था। अमेरिकी विदेश विभाग के बयान में कहा गया, कि "दोनों नेताओं ने वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया, जिसमें यूक्रेन के खिलाफ रूस की क्रूर आक्रामकता और दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा पर इसके प्रभाव शामिल हैं।" इसके अलावा श्रीलंका के आर्थिक संकट और "म्यांमार में सैन्य शासन के अत्याचारों के लिए जवाबदेही को बढ़ावा देने" पर भी चर्चा की गई।

'एक सावधानी से उठाया गया कदम'
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों और विशेषज्ञों ने कहा कि, नई दिल्ली का अमेरिकी हाउस स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा, उनकी यात्रा के बाद पनपी परिस्थितियां, चीन का सैन्य और मिसाइल अभ्यास जैसे मुद्दों पर खामोश रहने का लिया गया फैसला 'सावधानीपूर्वक तय किया गया है', जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है, कि भारत सीमा वार्ता जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चीन के साथ विवाद पैदा नहीं करना चाहता, लेकिन "एक चीन नीति" के प्रति निष्ठा का दावा भी नहीं करना चाहता है। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के एक पूर्व वरिष्ठ रिडायर्ड अधिकारी ने कहा कि, भारत की "एक जोरदार चुप्पी शायद इस स्थिति की सबसे अच्छी प्रतिक्रिया है।"

भारत ने किया है 'वन चीन नीति' का पालन
भारत ने साल 1949 से ही 'एक चीन नीति' का पालन किया है, जो यह दर्शाता है, कि यह बीजिंग में पीआरसी के अलावा किसी भी सरकार को मान्यता नहीं देता है, इसके साथ ही भारत ताइवान के साथ सिर्फ व्यापार और सांस्कृतिक संबंध रखता है। लेकिन, नई दिल्ली ने 2008 के बाद आधिकारिक बयानों और संयुक्त घोषणाओं में वन चायना नीति का जिक्र करना बंद कर दिया। उस समय के अधिकारियों के अनुसार, सरकार ने अरुणाचल प्रदेश को चीनी क्षेत्र के एक हिस्से के रूप में दावा करने वाले चीनी बयानों की एक श्रृंखला के बाद ये फैसला लिया था और चीन ने अरुणाचल के कस्बों का नाम मंदारिन रख दिया था और अरूणाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के भारतीय नागरिकों को "स्टेपल वीजा" जारी करने का ऐलान कर दिया था, जिसके बाद भारत ने वन चायना नीति का जिक्र करना बंद कर दिया था।

चीन को लेकर मनमोहन सिंह ने बदली नीति!
साल 2010 में ब्रासीलिय में हुए सम्मेलन के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति हू जिंताओ और प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ बैठकों के दौरान अपने संयुक्त बयानों में एक-चीन सिद्धांत का उल्लेख नहीं किया था। वहीं, एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा कि, "सोच यह थी कि जब चीन हमारी संवेदनशीलता को ध्यान में नहीं रख रहा है, तो एक-चीन नीति को दोहराने की आवश्यकता क्यों थी, यह नीति में बदलाव नहीं बल्कि इसे दाहराने का फैसला नहीं लिया गया था और भारत की मोदी सरकार ने भी मनमोहन सिंह सरकार के इस फैसले को जारी रखा। भारतीय अधिकारियों ने पुष्टि की कि, साल 2014 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इस फैसले का समर्थन किया था।

क्या है 'वन चायना पॉलिसी'
चीन जिस देशों के साथ व्यापारिक और राजनयिक संबंध रखता है, उनके सामने 'वन चायना पॉलिसी' मानने का शर्त रखता है, जिसके मुताबिक, दूसरे देश ताइवान या हांगकांग को मान्यता नहीं देंगे और उन्हें भी चीन का ही हिस्सा मानेंगे। वहीं, इस हफ्ते जारी किए गए अलग-अलग बयानों में आसियान के विदेश मंत्रियों के साथ-साथ बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों ने "एक-चीन नीति" के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की स्पष्ट रूप से पुष्टि की है। पाकिस्तानी विदेश कार्यालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है, "पाकिस्तान ताइवान जलडमरूमध्य में उभरती स्थिति को लेकर बहुत चिंतित है, जिसका क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर प्रभाव है।" वहीं, बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भी एक-चीन नीति के लिए अपने "दृढ़ पालन" को दोहराया। आसियान के बयान में कि "सदस्य-राज्यों ने अपनी-अपनी एक-चीन नीति के लिए समर्थन को फिर से दोहराया और यह भी चेतावनी भी दी कि ''इस क्षेत्र में अस्थिरता "गलत अनुमान, गंभीर टकराव, खुले संघर्ष और प्रमुख शक्तियों के बीच अप्रत्याशित परिणाम" को जन्म दे सकती है''।
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