लाल सागर के दो द्वीपों के लिए भिड़े सऊदी-इजरायल और मिस्र, क्या अमेरिका करवा पाएगा समझौता?

रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माने जाने वाले लाल सागर के दो द्वीप, तिरान और सनाफिर को लेकर काफी विवादित इतिहास रहा है।

रियाद, जुलाई 17: व्हाइट हाउस ने ऐलान किया है कि , इस साल के अंत तक अमेरिकी सैनिकों के साथ साथ पीस कीपिंग फोर्स इस साल के अंत तक रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माने जाने वाले लाल सागर के दो अहम द्वीप तिरान से बाहर निकल जाएं और अमेरिका की इस घोषणा के बाद माना जा रहा है, कि इजरायल और सऊदी अरब के बीत भविष्य के संपर्क के अवसरों को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका ने ये कदम उठाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने सऊदी अरब के दौरे के दौरान इस बात की घोषणा करते हुए कहा कि, 'हम कई महीनों की शांत और लगातार चलने वाली कूटनीति को धन्यवाद देते हैं, कि हमने लाल सागर के तिरान द्वीप से अंतर्राष्ट्रीय शांति फोर्स को निकालने के लिए एक समझौते तक पहुंच सके हैं।' अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि, इस इलाके को एक ऐसे क्षेत्र में परिवर्तित किया जाएगा, जो शांतिपूर्ण पर्यटन और आर्थिक विकास के लिए एक नया मंच बनेगा।

लाल सागर के तिरान द्वीप का क्या है विवाद?

लाल सागर के तिरान द्वीप का क्या है विवाद?

रणनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण माने जाने वाले लाल सागर के दो द्वीप, तिरान और सनाफिर को लेकर काफी विवादित इतिहास रहा है। मिस्र ने साल 2016 में लाल सागर के तिरान और सनाफिर द्वीपों को सऊदी अरब को सौंप दिया था, जो निर्जन होने के बाद भी महत्वपूर्ण रणनीतिक मूल्य के हैं। लेकिन उनकी संप्रभुता को स्थानांतरित करने से पहले उनकी क्षेत्रीय स्थिति को इज़राइल ने चुनौती दे दी है और इसके बाद ही इनके हक को ट्रांसफर किया जा सकता है। ऐसे में शांति सैनिकों को हटाने का फैसला, उनके स्थान और अशांत इतिहास से उत्पन्न मुश्किल स्थिति को हल करने में मदद कर सकता है और इजरायल और सऊदी अरब के बीच विश्वास का निर्माण कर सकता है और अमेरिका के ये दोनों सहयोगी देश अब इस दिशा में धीरे-धीरे कदम उठा रहे हैं और वाशिंगटन को उम्मीद है, कि एक दिन दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध बन सकते हैं।

इन द्वीपों पर कौन करता है दावा?

इन द्वीपों पर कौन करता है दावा?

ये दोनों द्वीप साल 1950 से मिस्र की संप्रभुता के अधीन हैं और स्वेज नहर संकट के दौरान साल 1956 में इन द्वीपों पर इजरायली सैनिकों ने हमला किया था और कब्जा कर लिया था। इजरायली सैनिकों ने हमला इसलिए किया था, क्योंकि मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासर ने नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, जो यूरोप और एशिया के बीच व्यापार के लिए काफी महत्वपूर्ण मार्ग थे। हालांकि, कुछ सालों के बाद मिस्र ने इन द्वीपों पर फिर से कब्जा कर लिया, लेकिन 1967 में एक बार फिर से इजरायल ने मिस्र के सैनिकों को इन द्वीपों से खदेड़ दिया और उनपर कब्जा जमा लिया। लेकिन, साल 1978 की कैंप डेविड शांति संधि के तहत, इज़राइल ने सिनाई, तिरान और सनाफिर का नियंत्रण मिस्र को वापस कर दिया और फिर 2016 में मिस्र ने अपने रिसॉर्ट शहर शर्म अल-शेख के पूर्व में स्थित द्वीपों को सऊदी अरब को सौंप दिया।

मिस्र ने द्वीपों का नियंत्रण सऊदी को क्यों सौंप दिया?

मिस्र ने द्वीपों का नियंत्रण सऊदी को क्यों सौंप दिया?

मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्ताह अल-सीसी द्वारा रियाद को क्षेत्रीय संप्रभुता सौंपने के विवादास्पद अप्रैल 2016 के फैसले ने मिस्र में राष्ट्रवादी विरोधों को जन्म दिया, जिसे जल्दी से दबा दिया गया। आलोचकों ने अल-सीसी पर सऊदी अरब से सहायता और निवेश लेने के बदले में द्वीपों को सौंपने का आरोप लगाया। जबकि, मिस्र की सरकार ने तर्क दिया कि, द्वीप मूल रूप से सऊदी अरब के थे, लेकिन 1950 के दशक में मिस्र को पट्टे पर दिए गए थे। वहीं, मिस्र की सरकार के इस फैसले पर मिस्र की अदालतों ने भी कई विवादित फैसले दिए। लेकिन, 1990 में मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने स्वेच्छा से दोनों द्वीपों का नियंत्रण सऊदी अरब को दे दिया और उसके बाद से ही सऊदी अरब लगातार यूनाइटेड नेशंस में इन दोनों द्वीपों को शामिल कर समुद्री सीमा बनवाने की कोशिश करता रहा, लेकिन इस काम में उसे दो दशक लग गये।

दोनों द्वीपों रणनीतिक महत्वपूर्ण क्यों हैं?

दोनों द्वीपों रणनीतिक महत्वपूर्ण क्यों हैं?

तिरान लाल सागर के रणनीतिक खंड में समुद्री मार्ग को नियंत्रित करता है, जिसका अर्थ है कि यह इलियट के लिए सभी शिपिंग को नियंत्रित करता है, जो कि लाल सागर तक इज़राइल की एकमात्र पहुंच है। सऊदी अरब का कहना है कि वह पर्यटन के लिए द्वीपों का विकास करना चाहता है। सऊदी अरब का द्वीपों पर पहला दावा 1957 में किंग सऊद बिन अब्दुलअज़ीज़ द्वारा किया गया था, और इसे अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। उस समय रियाद में अमेरिकी राजदूत के अनुरोध पर, सऊदी अरब ने 1968 में एक बयान जारी कर द्वीपों पर फिर से दावा किया और मुक्त समुद्री मार्ग को अपने हाथों में लेने की प्रतिज्ञा की।

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