मानवाधिकार से कश्मीर तक और CAA से लोकतंत्र तक.. अमेरिका को मुंह बंद कर अपनी गिरहेबां में क्यों झांकना चाहिए?
US-India Tie: यूएस के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 10 सितंबर 2013 को कहा था, कि "अमेरिका दुनिया का सिपाही नहीं है।" राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने अमेरिका के लोगों से सीरिया के खिलाफ सैन्य हमले में उनकी प्रशासन का साथ देने की अपील की थी।
क्योंकि, बशर अल-असद शासन ने देश में चल रहे गृहयुद्ध के दौरान एक हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को मौत के घाट उतार डाला था। देश वासियों को संबोधित करते हुए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ने आगे कहा था, कि "हमारे आदर्श और सिद्धांत... मैंने निर्धारित किया है, असद शासन की तरफ से रासायनिक हथियारों के हमलों का जवाब देने के लिए उसे निशाना बनाकर एयरस्ट्राइक करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।"

संप्रुभता का उल्लंघन करने में माहिर अमेरिका
पिछले दिनों खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश का आरोप भारत पर लगाते हुए अमेरिका ने खूब हो हल्ला मचाया था और बार बार अमेरिकियों ने 'संप्रभुता' शब्द का इस्तेमाल किया था। लेकिन, ये वही अमेरिका है, जो दूसरे देशों की संप्रभुता को रौंदने में माहिर रहा है।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के मिलिट्री इंटरवेंशन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1776 के बाद से अमेरिका ने 393 बार दूसरे देशों में सैन्य हस्तक्षेप किया है, जिसमें शीत युद्ध युग के बाद 114 बार दूसरे देशों पर सैन्य हमले शामिल हैं।
अमेरिका ने बार बार अमेरिकी आदर्श और सिद्धांत के नाम पर, मानवाधिकार और लोकतंत्र की बहाली के नाम पर दूसरे देशों पर हमले किए हैं। खासकर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों मे सबसे ज्यादा हमले अमेरिका ने किए हैं।
अमेरिकी हस्तक्षेप सिर्फ सैन्य हमले तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि अमेरिका एशियाई देशों के आंतरिक मामलों में टिप्पणियां करने के लिए भी कुख्यात रहा है, जिनका उसकी बाहरी या आंतरिक सुरक्षा से कोई संबंध नहीं होता है।
जैसे, पिछले हफ्ते ही अमेरिका ने भारत के "नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 की अधिसूचना" पर टिप्पणी करते हुए इसपर चिंता जताई और कहा, कि वो नजदीकी से इसके परिणामों की 'निगरानी' कर रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने संवाददाताओं से कहा, कि "हम 11 मार्च को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम की अधिसूचना को लेकर चिंतित हैं। हम इस अधिनियम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, कि इसे कैसे लागू किया जाएगा।"
जिसका भारत ने फौरन पलटवार किया। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने मीडिया से कहा, अमेरिकी विदेश विभाग का बयान "गलत, गलत सूचना वाला और अनुचित है"।
वहीं, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी टिप्पणी की आलोचना की और अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी के इस बयान के जवाब में, कि अमेरिका धार्मिक स्वतंत्रता और समानता को नहीं छोड़ सकता, जयशंकर ने जैक्सन-वनिक संशोधन, लॉटेनबर्ग संशोधन और स्पेक्टर संशोधन का उल्लेख किया, जो विशिष्ट अल्पसंख्यकों के लिए तेजी से नागरिकता प्रदान करता है।
उन्होंने कहा, कि "अगर आप कह रहे हैं, कि आप कुछ आस्थाओं को चुन रहे हैं, दूसरों को नहीं, तो मैं आपको दुनिया भर से कई उदाहरण दूंगा।"
यहां तक कि यूरोपीय संसद ने भी 28 जनवरी 2020 को एक प्रस्ताव पेश करके सीएए पर अपनी नाक घुसाने की कोशिश की थी और इसे "भेदभावपूर्ण" बताया।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के पूर्ववर्ती, डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी सभी खामियों के बावजूद, सीएए विवाद में घसीटे जाने से इनकार कर दिया था। अपनी फरवरी 2020 की यात्रा के दौरान, उन्होंने कहा था, कि "मैं उस (सीएए) पर चर्चा नहीं करना चाहता। मैं इसे भारत पर छोड़ना चाहता हूं। और यह वास्तव में भारत पर निर्भर है।"
सीएए को लेकर भारतीय लोगों का रूख कुछ भी हो सकता है, लेकिन अमेरिका को बोलने का कोई हक नहीं है और इसपर अमेरिका टिप्पणी करे, ये उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। क्योंकि, सीएए के लागू होने से न तो यूरोप या अमेरिका की बाहरी या आंतरिक सुरक्षा पर कोई असर पड़ेगा और न ही वहां रहने वाले मुसलमानों पर।

अमेरिका को अपनी गिरहेबां में झांकने का वक्त आया!
अमेरिका भारत के आंतरिक मामलों में, जैसे लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के मुद्दो पर जब जब बात करता है, उसकी नीयत से पाखंड की बदबू आती है। भारत की अपनी समस्याएं हो सकती हैं, और जब तक भारत उन्हें सुलझाने में मदद नहीं मांगता, वाशिंगटन को अपने काम से काम रखना चाहिए।
क्योंकि, यदि अमेरिका दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है, तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारत ने पिछले 10 सालों आर्थिक तौर पर खुद को इतना मजबूत कर लिया है, कि दुनिया के ज्यादातर देश भारत से जुड़ना चाहते हैं। भारत अपनी समस्याओं से खुद निपटने में सक्षम हैं और अमेरिका को भारत के मामलों को लेकर मुंह बंद रखना चाहिए।
डेमोक्रेटिक हो या रिपब्लिकन सरकार, अमेरिका का भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का इतिहास रहा है। अप्रैल 2022 में, बाइडेन ने अपने चीनी और रूसी समकक्षों शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन का उल्लेख करते हुए, भारत को भी सत्तावादी शासन करार दे दिया था। मार्च 2023 में जारी अमेरिकी विदेश विभाग की धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट कहा गया था, कि भारत में कुछ समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है, जो पूरी तरह से अमेरिकी पूर्वाग्रह और राजनीतिक विद्वेश पर आधारित था।
लिहाजा, ओबामा के ये कहने के बाद भी, कि अमेरिका दुनिया का सिपाही नहीं है, अमेरिका के राष्ट्रपतियों का दूसरे देशों के मामले में दखल देना जारी रहा है। यहां तक कि ओबामा ने 2015 में 10 दिनों में दो बार धार्मिक असहिष्णुता को लेकर भारत पर निशाना साधा था।
कश्मीर और आतंकवाद पर अमेरिका का पाखंड
कश्मीर से लेकर सीएए तक.. भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिकी की दोहरी बयानबाजी और हस्तेक्षप किसी पाखंड से कम नहीं है।
अमेरिका ने 1948 के बाद से ही कश्मीर पर पाकिस्तान का समर्थन करना जारी रखा और 17 जनवरी 1948 को कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में अमेरिका और ब्रिटेन की प्रत्यक्ष भागीदारी देखी गई थी। पाकिस्तान को खुश करने के लिए अमेरिका ने उस वक्त ये तक मान लिया था, कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है।
हालांकि, भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अगुआ बन चुका था, फिर भी अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के नाम पर भारत पर दबाव डालना जारी रखा और कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए, भारत पर हमले करने के लिए उसने लगातार पाकिस्तान को घातक हथियारों की सप्लाई की। और 1971 में अमेरिकी पाखंड को उस वक्त दुनिया ने देखा, जब पाकिस्तान का साथ देने के लिए राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अमेरिका के परमाणु जहाज सातवें बेड़े को भारत के खिलाफ युद्ध के लिए बंगाल की खाड़ी में भेज दिया।
वो तो रूस था, जिसने अपने 22वें बेड़े को भेजकर अमेरिका को काउंटर कर दिया था, नहीं तो 1971 युद्ध का अंजाम कुछ और हो सकता था।
मानवाधिकार की बात करने वाले अमेरिकियों ने बांग्लादेश में पाकिस्तान की तरफ से किए गये नरसंहार के खिलाफ चूं तक नहीं किया, जबकि बांग्लादेश में 3 लाख से ज्यादा बंगालियों को पाकिस्तानी फौज ने मारा डाला था और 2 लाख से ज्यादा महिलाओं के साथ रेप किया था।
फिर बिल क्लिंटन प्रशासन ने कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर भारत पर दबाव डाला और विलय के साधन को मान्यता देने से इनकार कर दिया। अक्टूबर 1993 में, दक्षिण एशिया के लिए तत्कालीन अमेरिकी सहायक सचिव रॉबिन राफेल ने कहा था, कि "हम कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र के रूप में देखते हैं। हम विलय पत्र को इस अर्थ में मान्यता नहीं देते हैं, कि कश्मीर हमेशा के लिए भारत का अभिन्न अंग है।"
भारत के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप का एक और उदाहरण 1998 में मिलता है, जब पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने कहा, कि वो "गहराई से निराश" है और उसने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिका ने भारत पर CTBT और NPT में शामिल होने के लिए दबाव बनाने की भी कोशिश की।
इसके अलावा, अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने 2013 में अपनी किताब मैग्निफिसेंट डिल्यूजन्स में दावा किया है, कि 2009 में ओबामा ने पाकिस्तान को गुप्त रूप से पेशकश की थी, कि अगर वह आतंकवादी समूहों को समर्थन देना बंद कर दे, तो वह भारत से कश्मीर पर बातचीत के लिए कह सकता है। यहां तक कि ट्रंप ने भी पांच बार कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश की थी।
इसके अलावा, खालिस्तान को लेकर अमेरिका का डबल गेम तो पूरी दुनिया देख ही रहा है। जिससे यही पता चलता है, कि अमेरिका अभी भी अपने आधिपत्य और एकध्रुवीय दुनिया में विश्वास करता है। हालांकि, रूस और चीन ने अमेरिकी प्रभुत्व को खत्म कर दिया है, लेकिन अमेरिका इसे समझने को तैयार नहीं है। लेकिन, अब अमेरिका को यह समझना चाहिए, कि वह दूसरे देशों पर अपनी शर्तें थोप नहीं सकता है, खासकर भारत के खिलाफ अमेरिका को अपना मुंह बंद रखना चाहिए, क्योंकि भारत के पास इतनी शक्ति है, कि वो अपने तमाम मसलों से खुद भी निपट सकता है।












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