भारत में बंद हुआ अफगानी दूतावास, तालिबान पर मोदी सरकार की 'चीन वाली चाल' से पाकिस्तान परेशान
Afghan Embassy India: भारत में कूटनीतिक मोर्चे पर बड़े बदलाव हो रहे हैं। इस वक्त जहां सारा ध्यान कनाडा के साथ गतिरोध पर है, वहीं अफगानिस्तान के साथ भी अंदरखाने बहुत कुछ चल रहा है। नई दिल्ली में अफगान दूतावास ने 1 अक्टूबर से अपना ऑपरेशन बंद कर दिया है, लेकिन इस फैसले के पीछे कई सारे गणित और कैमेस्ट्री हैं।
अफगान दूतावास का संचालन अफगानिस्तान की पिछली सरकार के राजनयक ही अभी तक कर रहे थे, जबकि करीब दो साल पहले, 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा जमा लिया था और उसके साथ ही पूर्ववर्ती अशरफ गनी की सरकार का भी पतन हो गया था।
अफगानिस्तान के दिल्ली दूतावास ने एक बयान में कहा, कि "बेहद दुख, अफसोस और निराशा के साथ कहना पड़ रहा है, कि नई दिल्ली में अफगानिस्तान का दूतावास अपने संचालन को बंद किया जा रहा है।"

नई दिल्ली में अफगान दूतावास क्यों बंद हो रहा है?
अफगानिस्तान दूतावास ने भारत को सूचित किया है, कि तालिबान सरकार और नई दिल्ली से सहयोग की कमी के कारण इसे बंद करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
दूतावास के बयान में कहा गया है, "हम भारत में राजनयिक समर्थन की कमी और काबुल में एक वैध कामकाजी सरकार की अनुपस्थिति के कारण अफगानिस्तान और उसके नागरिकों के सर्वोत्तम हितों की सेवा के लिए आवश्यक अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को पूरा करने में अपनी कमियों को स्वीकार करते हैं।"
द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस फैसले को पहली बार इसी हफ्ते विदेश मंत्रालय (एमईए) को एक अहस्ताक्षरित नोट वर्बेल में सूचित किया गया था, जिसमें संकेत दिया गया था, कि दूतावास इस महीने के अंत में बंद हो जाएगा।
नोट में यह भी उल्लेख किया गया है, कि नई दिल्ली ने कई अनुरोध पत्रों को अस्वीकार कर दिया था, जिसमें करीब 3,000 अफगान छात्रों के लिए सहायता और वीजा की मांग की गई थी, जो 2021 में भारत की यात्रा करने वाले थे, लेकिन उन्हें यात्रा कागजात नहीं दिए गए थे।
पत्र में यह भी अनुरोध किया गया था, कि नई दिल्ली में मिशन के ऊपर अफगान तिरंगे को फहराने की अनुमति दी जाए। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, यह झंडा अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे तालिबान शासन ने उखाड़ फेंका था।
वहीं, सीएनएन-न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अफगानिस्तान के राजदूत फरीद मामुंडजे ने कथित तौर पर तालिबान सरकार को एक पत्र लिखा था, कि वह हर मोर्चे पर काम करने में नाकाम रहे हैं क्योंकि उन्हें समर्थन और राजनयिक विचार नहीं मिले हैं। उन्होंने यह भी कहा, कि व्यापारियों और अन्य लोगों के लिए वीजा के लिए भारत सरकार से अनुरोध का कोई नतीजा नहीं निकला।
अफगान राजनयिक ने भारत की ऐसी प्रतिक्रिया के लिए तालिबान शासन को दोषी ठहराया और कहा, कि तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार में समावेशिता की कमी और अफगानिस्तान में सत्ता में बैठे लोगों की विश्वसनीयता की कमी ने एक भूमिका निभाई।
आपको बता दें, कि तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से भारत या दुनिया के किसी अन्य देश द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। लेकिन, ऐसा माना जा रहा है, कि भारत ने भी तालिबान को लेकर 'चीन वाली चाल' चली है।

चीन की चाल क्या थी?
चीन ने भी अभी तक तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी है, लेकिन चीन ने पिछले महीने काबुल में अपना नया राजदूत तैनात कर दिया है, जो तालिबान शासन को मान्यता देने की दिशा में पहला कदम है।
चीन तेजी से तालिबान शासन के तहत अफगानिस्तान में पांव फैला रहा है, लिहाजा देरी करने से भारत को आने वाले वक्त में काफी नुकसान हो सकता है और दक्षिण एशिया में भारत ही ऐसा देश रहा है, जिसने तालबान के साथ संबंध बनाने में काफी देरी की। लिहाजा, भारत अब वो गलती नहीं दोहराना चाहता है और भारत ने पिछले दो सालों में तालिबान शासन के साथ कई स्तरों पर बातचीत भी की है।
तालिबान ने भारत को भी अफगानिस्तान में आकर अपने लंबित प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने और अफगानिस्तान में अलग अलग प्रोजेक्ट्स में निवेश करने का ऑफर दिया हुआ है। तालिबान भारत के साथ संबंध बनाना चाहता है, क्योंकि अगर भारत की तरफ से पॉजिटिव संकेत मिलता है, तो उसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता हासिल करने की दिशा में बहुत बड़ी जीत हासिल होगी।
भारत का क्या कहना है?
भारत सरकार के सूत्रों ने कहा है, कि अफगान दूतावास ने विदेश मंत्रालय को शटडाउन पर एक सूचना जारी की थी।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने एक सूत्र के हवाले से कहा, कि "इस कम्युनिकेश की प्रामाणिकता और इसकी सामग्री की जांच की जा रही है।" सूत्र ने कहा, कि "यह पिछले कई महीनों से राजदूत के भारत से बाहर रहने, कथित तौर पर शरण प्राप्त करने के बाद राजनयिकों के तीसरे देशों में जाने के साथ-साथ दूतावास कर्मियों के बीच अंदरूनी कलह की रिपोर्टों के संदर्भ में है।"
रिपोर्ट के मुताबिक, अफगान राजदूत पिछले कई महीनों से भारत में नहीं हैं और वो किसी और देश में रह रहे हैं।
सीएनएन-न्यूज18 के मुताबिक, भारत सरकार के अधिकारियों ने कहा है, कि दूतावास को बंद करने का फैसला अफगान पक्ष द्वारा किया गया है। अधिकारियों ने कहा, कि "हमने यहां (उनके) मिशन की मदद और सुविधा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है। ये उनका अपना फैसला है। हम ईमानदारी से चाहते हैं कि वे काम करें।"
अधिकारियों ने यह भी बताया है, कि अफगान दूत कुछ समय से लापता हैं। भारत सरकार के सूत्र कथित तौर पर मामुंडज़े से नाराज़ हैं। एक अधिकारी ने सीएनएन-न्यूज18 को बताया, कि "वह भारत सरकार और तालिबान के बीच दरार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।" उन्होंने बताया, कि भले ही भारत ने तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार को मान्यता नहीं दी है, लेकिन मामुंडजे की गतिविधियां "भारत सरकार और तालिबान शासन के बीच तनाव पैदा करने के लिए पर्याप्त थीं।"
मामुंडज़े सवालों के घेरे में क्यों हैं?
मई में दूत मामुंडज़े के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सामने आये थे। इसके बाद टोलो न्यूज़ ने कथित तौर पर भारत में अफगान शरणार्थियों के एक अहस्ताक्षरित पत्र का स्क्रीनशॉट ट्विटर पर पोस्ट किया था। इसमें मामुंडजे सहित तीन राजनयिकों को नामित किया गया और उन पर एक भारतीय कंपनी के साथ जमीन लीज लेने के समझौते से संबंधित भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया।
हालांकि, मामुंडज़े ने आरोपों से इनकार किया था और हाल ही में उन्होंने दिप्रिंट को बताया था, कि वे "मिशन पर कब्ज़ा करने के तालिबान के मकसद के पक्ष में" एक व्यापक एजेंडे का हिस्सा था।
दरअसल, अप्रैल-मई में, नई दिल्ली स्थित अफ़ग़ान दूतावास अंदरूनी कलह से हिल गया था। ऐसी रिपोर्टें आईं थीं, कि तालिबान ने ममुंडज़े की जगह मिशन का नेतृत्व करने के लिए एक प्रभारी डी'एफ़ेयर नियुक्त किया था।
कादिर शाह, जो 2020 से दूतावास में ट्रेड काउंसिलर के रूप में काम कर रहे थे, उन्होंने अप्रैल के अंत में विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर दावा किया था, कि उन्हें तालिबान ने चुना है।
यह मामला तब सामने आया था, जब मामुंडज़े लंदन में अपने परिवार से मिलने गए थे। मई में, वह वापस लौटे और व्यापार पार्षद को परिसर में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। इस प्रकरण के बाद, दूतावास ने एक बयान जारी कर कहा, कि उसके नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
लेकिन, इसके तुरंत बाद मामुंडज़े वापस लंदन चले गए और तीन महीने से भारत नहीं लौटे हैं।
तो क्या नई दिल्ली में आएंगे तालिबान के दूत?
यह देखना बाकी है।
खास तौर पर, तालिबान शासन ने विदेशों में कम से कम 14 मिशनों में अपने अधिकारियों को भेज दिया है, जहां उसने अपने नामांकित व्यक्तियों को तैनात किया है। हालांकि, नई दिल्ली अभी उनमें से एक नहीं है।
पाकिस्तान, चीन, रूस और ईरान उन कुछ देशों में से हैं, जिन्होंने तालिबान द्वारा समर्थित राजनयिकों की नियुक्ति की अनुमति दी है। इन दूतावासों में, लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पिछले "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान" के बजाय तालिबान या "इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान" (आईईए) का झंडा फहराया जाता है।
अगस्त 2021 में तालिबान द्वारा देश पर कब्ज़ा करने के बाद भारत ने काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया था। लेकिन, अब उसके पास अफगानिस्तान में मानवीय सहायता के समन्वय के लिए एक तकनीकी टीम है।
लेकिन, भारत के लिहाज से अफगानिस्तान जितना महत्वपूर्ण है, उससे देखखर इस बात की संभावना है, कि आने वाले वक्त में नई दिल्ली से तालिबान के दूत को मान्यता दे दी जाए।
लेकिन, मौजूदा स्थिति से पाकिस्तान काफी परेशान है, क्योंकि भारत और तालिबान के बीच जिस तरह के संबंध बन रहे हैं, उसकी उम्मीद पाकिस्तान ने नहीं की थी। पाकिस्तान को पता चल गया है, कि तालिबान के दूत के जाने के साथ ही, तालिबान और भारत के बीच अच्छे संबंध स्थापित हो जाएंगे और तालिबान को भारत जैसे मददगार देश की जरूरत है, जबकि पाकिस्तान से अफगानिस्तान के लोग काफी नाराज रहते हैं।
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