बार-बार भारत के खिलाफ अफवाह कौन फैला रहा है? श्रीलंका पर भारत की एक और सफाई
कोलंबो, 13 जुलाईः श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे बुधवार को देश छोड़कर मालदीव भाग गए। गोटाबाया राजपक्षे के भाई और श्रीलंका के पूर्व वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे के भी देश छोड़ने की खबर है। बीते महीने गोटाबाया के एक अन्य भाई व देश के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने भी श्रीलंका छोड़ दिया था और उसके बाद वह कहां गायब हो गए हैं इसकी कोई खबर नहीं है।

बुरी तरह भड़की जनता
इन राजनेताओं के देश छोड़ने की खबरों के बीच श्रीलंका की जनता बुरी तरह भड़क चुकी है। श्रीलंका में अफरा-तफरी का माहौल है और किसी को समझ नहीं आ रहा है, कि देश कौन चला रहा है। देश में कानून व्यवस्था नाम की चीज नहीं दिख रही है। इस बीच प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास के साथ साथ देश की संसद भवन को भी घेर लिया है। इस बीच श्रीलंका की स्थिति को लेकर भारत बेहद सतर्क हो चला है। वह पड़ोसी देश के मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावे किए गये, कि भारत ने गोटाबाया राजपक्षे के देश से बाहर निकलने के लिए सुविधाएं मुहैया कराईं।
भारत ने अफवाहों का किया खंडन
श्रीलंका में भारतीय उच्चायुक्त की तरफ से बकायदा बयान जारी करते हुए उन आरोपों को सिरे से नकार दिया गया है। भारतीय उच्चायोग स्पष्ट रूप से निराधार और अफवाह फैलाने वाली मीडिया रिपोर्ट्स का खंडन किया और बयान जारी करते हुए कहा कि, इस तरह की रिपोर्ट्स पूरी तरह से निराधार हैं, कि गोटाबाया राजपक्षे के हालिया देश से बाहर की यात्रा में भारत की तरफ से सुविधा प्रदान की गई। भारत सरकार हमेशा श्रीलंका के लोगों की मदद करता रहेगा। गौरतलब है कि इससे पहले भी भारत ने 10 जुलाई को स्पष्टीकरण जारी किया था। भारतीय उच्चायोग ने ट्विटर पर लिखा, ''मीडिया के एक धड़े और सोशल मीडिया में चल रहीं अटकलें कि भारत श्रीलंका में सेना भेज रहा है, को उच्चायोग स्पष्ट रूप से ख़ारिज करता है। ऐसी रिपोर्ट और विचार भारत सरकार की सोच में नहीं है।''
भारतीय उच्चायोग ने किया ट्वीट
13 मई को भी भारतीय उच्चायोग ने एक और ट्वीट किया था। इसमें भारतीय उच्चायोग ने लिखा, ''उच्चायोग इस बात को नकारता है कि श्रीलंकाई नागरिकों को भारत वीजा नहीं दे रहा है। पिछले कुछ दिनों से वीजा विंग के स्टाफ की कमी के कारण समस्याएं हो रही थीं। अब पूरी तरह का काम शुरू हो गया है और वीजा भी जारी किया जा रहा है। श्रीलंका के लोगों का भारत में स्वागत है।'' अब सवाल ये है कि श्रीलंका के मुद्दे को लेकर भारत बार-बार अपनी सफाई क्यों दे रहा है? श्रीलंका में भारत को लेकर इतनी अफवाहें क्यों फैलाई जा रही हैं कि भारत को बार-बार उन अटकलों पर विराम लगाने का प्रयास करना पड़ रहा है।

अलोकप्रिय हो चुका है राजपक्षे परिवार
भारत जानता है कि श्रीलंका में राजपक्षे परिवार बेहद अलोकप्रिय हो चुके हैं ऐसे में इस परिवार को किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन भारत की छवि खराब करेगा। इसलिए भारत, श्रीलंका से जुड़ी किसी भी अफवाह या अटकलों पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर रहा है। भारत जानता है कि उसके हित राजनीतिक रूप से स्थिर श्रीलंका में है। श्रीलंका का बेहद करीबी देश है। बीते डेढ़ दशक में श्रीलंका में चीन की बढ़ती आर्थिक सामरिक मौजूदगी भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

श्रीलंका में भारत विरोधी ग्रुप सक्रिय
श्रीलंका में एक गुट ऐसा है जो भारत से खार खाता है। हाल में ही हमने ऐसी खबर सुनी थी जिसमें पावर प्रोजेक्ट में भारत के पीएम मोदी द्वारा अग्रणी बिजनेसमैन अडाणी के लिए लॉबीइंग की बात कही जा रही थी। इस खबर को श्रीलंका में भारत विरोधी धड़े ने खूब भुनाने की कोशिश की थी और भारत के खिलाफ माहौल बनाने की साजिश रची थी लेकिन इसी बीच जिस अधिकारी ने पीएम मोदी को लेकर आरोप लगाया था उसने अपनी गलती मान ली और कहा कि उसने भावुक होकर ऐसी बात कह डाली थी। वहीं, राष्ट्रपति राजपक्षे ने भी अधिकारी के आरोप को गलत बताया था।

सुब्रमण्यम स्वामी ने किया ट्वीट
इसके बाद श्रीलंका में ऐसी खबरें भी प्लांट की गईं कि भारत श्रीलंका की खराब हो रही व्यवस्था से निपटने के लिए अपनी सेना भेज सकता है। इस खबर से पैदा हुई आग में घी डालने का काम सुब्रमण्यम स्वामी के ट्वीट ने किया। स्वामी ने लिखा, ''गोटाबाया और महिंदा राजपक्षे को स्वतंत्र चुनाव में मजबूत बहुमत के साथ चुना गया था। श्रीलंका में चुनी हुई सरकार को एक भीड़ बेदखल कर दे, इसे भारत कैसे देख सकता है। ऐसे में तो कोई भी लोकतांत्रिक देश हमारे पड़ोस में सुरक्षित नहीं है। अगर राजपक्षे भारत से सैन्य मदद चाहते हैं, तो हमें जरूर देनी चाहिए।'' इससे श्रीलंका में भारत विरोधी लॉबी को दुष्प्रचार करने का एक और मौका मिल गया।

भारत विरोधी राजपक्षे परिवार
यह ठीक बात है कि स्थिर और शांत श्रीलंका से भारत को फायदा है मगर राजपक्षे परिवार को बचाने या उसे शरण देने की कोई वजह दिखाई नहीं देती। यह राजपक्षे परिवार ही रहा जिसने श्रीलंका को भारत से दूर कर दिया। पिछले 15 वर्षों में श्रीलंका से भारत पूरी तरह बेदखल कर दिया गया। भारत की जगह चीन ने ले ली। राजपक्षे परिवार चीन का पिछलग्गू बन गया। चीन, श्रीलंका को लोन पर लोन देता गया और उसे अपनी गिरफ्त में लेता गया। चीन के साथ प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के करीबी संबंधों का ही परिणाम था कि राजपक्षे सरकार ने बेहद कम फायदे के बावजूद, पोर्ट सिटी बिल को संसद से मंजूरी दिलवाई और बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर चीनी निवेश को अनुमति दे दी।

राजपक्षे परिवार की चीन से नजदीकी
चर्चित लेखक जोनाथन ई. हिलमैन ने श्रीलंका और चीन के संबंधों पर बिल्कुल सही कहा था कि, 'अगर चीन के कर्ज को हम सिगरेट मान लें, तो श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह कैंसर के शिकार फेफड़े की वो तस्वीर है, जो सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी देने के लिए छापी जाती है।' श्रीलंका की सरकार ने चीन के सामरिक आयाम की पूरी तरह से अनदेखी कर दी। राजपक्षे सरकार चीन पर किस हद तक निर्भर हो गयी थी कि ड्रेगन को खुश करने के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शताब्दी समारोह के लिए एक सम्मेलन तक आयोजित कर लिया। महामारी के दौर में जब आम जनता टीकाकरण अभियान के लिए संघर्ष कर रही थी, तब श्रीलंका की सरकार ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के शताब्दी समारोह मना रही थी।

चीन ने श्रीलंका को अधर में छोड़ा
इस घटना के एक साल पूरे भी नहीं हुए हैं लेकिन इस बीच स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। कभी श्रीलंका की राजनीति में 8 मंत्री देने वाला राजपक्षे परिवार आज दर-दर भटक रहा है और एक देश से दूसरे देश शरण लेने का प्रयास कर रहा है। जनता अपने नेताओं को ढ़ूंढ रही है और उन्हें वापस लाने की मांग कर रही है। चीन खामोश है। ड्रैगन की चुप्पी बताती है कि यह देश किसी का सगा नहीं है, वहीं भारत, चाहकर भी भ्रष्ट नेताओं से भरे देश श्रीलंका की उतनी मदद नहीं कर पा रहा कि इस देश की स्थिति ठीक हो जाए।












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