ईरान में स्कूली छात्राओं को जहर देने का सिलसिला जारी, क्या इस्लामिक सरकार ले रही है बदला?
ईरान में पिछले साल 22 साल की कुर्द लड़की महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में संदिग्ध मौत के बाद प्रदर्शन शुरू हुए थे, जिसने इस्लामिक सरकार की बुनियाद को हिला दिया है।

Iran News: ईरानी शहरों में स्कूली छात्राओं का रहस्यमयी जहर देने का सिलसिला लगातार जारी है और अभी तक सरकारी जांच में छात्राओं को जहर देने को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई है। यानि, स्कूली छात्राओं को जहर कौन दे रहा है, क्यों दे रहा है, इसको लेकर कोई खुलासा ईरानी अधिकारियों ने अभी तक नहीं किया है और करीब 900 लड़कियां जहर से प्रभावित हुई हैं। वहीं, अब आरोप लग रहे हैं, कि पिछले महीनों ईरान में हिजाब के खिलाफ किए गये प्रदर्शन के बाद इस्लामिक कट्टरपंथी सरकार अब अपने ही नागरिकों से खूनी बदला ले रही है और छात्राओं को चुन-चुनकर जहर दे रही रही है।

कौन दे रहा है ईरानी छात्राओं को जहर?
ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी के विरोधियों ने दावा किया है, कि ईरान सरकार नहीं चाहती है, कि लड़कियां स्कूल जाएं, लिहाजा उनके मन में खौफ पैदा किया जा रहा है। वहीं, विरोधियों का आरोप है, कि पिछले साल 15 सितंबर को मोरल पुलिस के हाथों 22 साल की कुर्दिश लड़की महसा अमीनी की मौत के बाद ईरान में जो व्यापक प्रदर्शन हुए थे, उसे कुचलने के लिए राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने कठोर कदम उठाए थे और अब छात्राओं से बदला लिया जा रहा है। स्कूली छात्राओं को जहर देने की पहली ज्ञात घटना 30 नवंबर को ईरान के क़ोम शहर में हुई थी, जब लगभग 50 छात्राएं गंभीर बीमार पड़ गईं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। मीडिया के मुताबिक, लड़कियों को अचानक उल्टियां होने लगी, उन्हें सांस लेने में परेशानी हो रही थी और फिर वो बेहोश होने लगीं। कई लड़कियों को अस्थाई पैरालाइसिस अटैक भी आया था। बाद में होश में आई लड़कियों ने बताया, कि उन्होंने किसी तरह के गंध का अनुभव किया था और उसके बाद ही उनकी वो स्थिति हुई।

8 राज्यों में लड़कियों को दिया गया जहर
रिपोर्ट के मुताबिक, अभी तक 11 साल की एक लड़की फ़तेमेह रेज़ाई की जहर से मौत की बात सामने आई है, हालांकि उसके परिवार और डॉक्टर ने कहा है, कि वह "एक गंभीर संक्रमण से मरी है और उसे ज़हर नहीं दिया गया था।" जबकि, वो भी अपने दोस्तों के साथ ही अस्पताल में भर्ती हुई थी और उसे भी उल्टियां आईं थीं। ईरानी मीडिया ने बताया, कि आठ प्रांतों और राजधानी तेहरान और बोरुजेर्ड और अर्देबी शहरों में कम से कम 58 स्कूलों में लड़कियों को जहर देने की घटना सामने आई है। कुछ स्कूलों में छात्रों के साथ साथ शिक्षकों पर भी जहर का असर हुआ और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। वो भी जहरीले हमले से प्रभावित हुए थे। वहीं, शनिवार को, रॉयटर्स समाचार एजेंसी ने बताया, कि ईरान के 31 प्रांतों में से 10 प्रांतों के कम से कम 30 से ज्यादा स्कूल जहरीले हमले से प्रभावित हुए हैं और दर्जनों छात्राओं क अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।
सरकार ने की पल्ला झाड़ने की कोशिश
सबसे पहले, ईरानी शासन ने घटनाओं को खारिज करने और उन्हें कम करने की कोशिश की। फिर भी, जैसे-जैसे हमलों की संख्या में इजाफा होता गया, सरकार को लगने लगा, कि वो अब इन घटनाओं को छिपा नहीं सकती है, क्योंकि देश भर में स्कूल जाने वाली लड़कियों पर होने वाले ये हमले आकस्मिक नहीं हो सकते हैं। लिहाजा, ईरान सरकार अब अलग अलग दलीलें देने में लगी है। वहीं, जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने शुक्रवार को संदिग्ध हमलों की पारदर्शी जांच का आह्वान किया है। वहीं, जर्मनी और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई देशों ने स्कूली छात्राओं पर होने वाले इन हमलों को लेकर चिंता व्यक्त की हैं। ईरानी उप शिक्षा मंत्री यूनुस पनाही ने स्वीकार किया है, कि हमले जानबूझकर किए गए थे, लेकिन उन्होंने ये भी कहा, कि इसमें सैन्य कैमिकल नहीं, बल्कि पब्लिक कैमिकल का रसायन मिला है। उन्होंने कहा, कि "यह स्पष्ट हो गया है, कि कुछ लोग चाहते थे कि सभी स्कूल, विशेष रूप से लड़कियों के स्कूल बंद हो जाएं।" हालांकि, बाद में वो अपने बयान से मुकर गये और कहा, कि उनकी टिप्पणी को गलत समझा गया।

राष्ट्रपति का जहरीला बदला
पिछले शुक्रवार को, ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने दावा किया था, कि स्कूली छात्राओं को जहर देने काम ईरान के दुश्मनों का काम है, जो देश में अराजकता का माहौल पैदा करना चाहते हैं और माता-पिता और छात्रों के बीच भय, निराशा और असुरक्षा पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। ईरानी राष्ट्रपति ने जांच के लिए आंतरिक मंत्रालय की टीम को नियुक्त किया है और ईरानी प्रॉसीक्यूटर जनरल ने क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन शुरू करने की घोषणा की है। लेकिन, अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान के पारदिस उपनगर के डिप्टी गवर्नर रेज़ा करीमी सालेह ने दावा किया है, कि उनके शहर में स्कूल के बगल में मौजूद एक ईंधन टैंकर पर ज़हरीले पदार्थ से हमला किया गया था। उन्होंने कहा, कि कोम में कई और स्कूलों पर भी जहर से हमला किया गया है। कई ईरानियों को डर है, कि हमलों के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का हाथ है, क्योंकि शासन नहीं चाहता है, कि छात्राएं स्कूल जाएं

आतंकी संगठन भी कर चुके हैं ये तरीका इस्तेमाल
आपको बता दें, कि इस तरह के तरीकों का इस्तेमाल 2010 में अफगानिस्तान में तालिबान और हाल ही में नाइजीरिया में इस्लामिक आतंकवादी समूह बोको हरम ने भी किया था। इन दोनों ने भी लड़कियों को स्कूल जाने से रोकने के लिए उनपर जहर से हमला किया था। बोको हरम ने तो नाइजीरिया में साल 2014 में 276 स्कूली लड़कियों का अपहरण कर लिया था। ईरानी संसद और संसद की शिक्षा समिति के प्रमुख अलिर्ज़ा मोनादी ने मंगलवार को कहा, कि स्कूलों पर जानबूझकर हमला किया गया था और स्वास्थ्य मंत्रालय के 30 जहर-विज्ञानियों ने स्कूलों में पाए जाने वाले विषाक्त पदार्थों की नाइट्रोजन गैस के रूप में पहचान की है। मोनादी और देश के उप स्वास्थ्य मंत्री, यूनुस पनाही ने कहा, कि ऐसा लगता है कि हमलों का मकसद लड़कियों को स्कूलों में जाने से रोकना है, जिससे इस्लामी चरमपंथी समूहों की संभावित घुसपैठ के बारे में चेतावनी दी जा सके।












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