जब मारे गये थे 20 हजार चीनी सैनिक, वियतनाम के पक्ष में वाजपेयी ने लिया था एक बड़ा फैसला

अगर भारत और चीन में युद्ध शुरू हो तो क्या होगा ? सैन्य शक्ति में चीन, भारत से आगे है। लेकिन हमेशा ये याद रखना चाहिए कि युद्ध, संख्याबल से नहीं, आत्मबल और कूटनीति से जीता जाता है। महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना पांडवों से अधिक थी लेकिन विजय पांडवों को मिली थी। आधुनिक काल में भी वियतनाम जैसा छोटा सा देश अपने से अधिक सैन्य क्षमता वाले अमेरिका और चीन को हरा चुका है। तो भारत क्यों नहीं चीन को हरा सकता ? अमेरिका के नेशनल सिक्यूरिटी एनालिस्ट और लेखक गिलबर्टो विल्लहरमोसा ने कुछ समय पहले कहा था, 1979 में चीन ने सीमा विवाद को लेकर वियतनाम पर हमला कर दिया था। वह वियतनाम को सबक सिखाना चाहता था लेकिन खुद उसकी ही फजीहत हो गयी। भारत को धमकी देने वाला चीन वियतनाम युद्ध क्यों भूल जाता है। इस युद्ध में भारत ने वियतनाम का का खुल कर पक्ष लिया था। भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी उस समय विदेश मंत्री थे। जब फरवरी 1979 में चीन ने वियतनाम पर हमला किया तो उस समय वाजपेयी चीन की यात्रा पर थे। भारत ने चीन के हमले का विरोध किया और वाजपेयी चीन की यात्रा बीच में छोड़ कर भारत लौट आये। इस लड़ाई में चीन के करीब 20 हजार सैनिक मारे गये थे। तकनीकी रूप से चीन यह युद्ध हार गया था।

1979 के युद्ध की पृष्ठभूमि
वियतनाम के पड़ोसी देश कम्बोडिया (साम्यवादी उसे कम्पूचिया कहते थे) में लंबे गृहयुद्ध के बाद 1975 में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई थी। पोल पॉट के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार का गठन हुआ। पोल पॉट के समर्थक साम्यवादियों को खमेर रूज कहा जाता था। पोल पॉट के शासन में विरोधियों का भयंकर नंरसंहार हुआ। अनुमान है कि पोल पॉट के निरंकुश शासन के दौरान 17 से 25 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। चीन, पोल पॉट का समर्थक और संरक्षक था। कम्बोडिया में भयंकर रक्तपात से वहां के नागरिक जान बचाने के लिए वियतनाम भागने लगे। पॉल पोट के सैनिक सीमा पर वियतानामी लोगों को भी मारने लगे। आखिरकार वियतनाम ने दिसम्बर 1978 में कम्बोडिया पर आक्रमण कर दिया। जनवरी 1979 में वियतनाम ने अत्याचारी पोल पॉट के शासन का खात्मा कर दिया। इससे चीन वियतनाम पर आगबबूला हो गया। वह अपने समर्थक पोल पॉट को फिर सत्ता दिलाने के लिए बेचैन हो गया। उस समय चीन में डेंग शियाओपिंग का शासन था

चीन का वियतनाम पर आक्रमण
17 फरवरी 1979 को चीन ने वियतनाम पर हमला कर दिया। चीन के मुकाबले वितनाम एक छोटा देश था। वह हाल में अमेरिका से युद्ध लड़ कर बेहाल हो चुका था। अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश भी वियतनाम में दस साल तक युद्ध लड़ कर विजय हासिल नहीं कर सका था। यह वियतनाम की नैतिक जीत थी। इस हौसले ने वियतनाम को चीन से टक्कर लेने में बहुत मदद की। चीन ने पूरा जोर लोगा तब वह वियतनाम को हरा नहीं पाया था। इस युद्ध में मौत का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपल्ध नहीं है। वियतनाम का दावा है कि इस लड़ाई में चीन के 65 हजार सैनिक मारे गये थे तो दूसरी तरफ चीन एक लाख बीस हजार वियतनामी सैनिकों और गुरिल्लों के मारे जाने की बात करता है। युद्ध के बाद तटस्थ प्रेक्षकों ने इस लड़ाई में बीस हजार चीनी सैनिकों के मारे जाने का अनुमान लगाया था।

किस अर्थ में हुई थी चीन की हार
चीन ने वियतनाम पर इसलिए आक्रमण किया था कि वह कम्बोडिया से अपनी सेना हटा ले ताकि पोल पॉट को दोबारा सत्ता पर काबिज कराया जा सके। चीन ने रक्तपात तो मचाया लेकिन वह बुलंद हौसले वाले वियतनामी सैनिकों पर विजय प्राप्त न कर सका। इस बीच चीन को डर हो गया कि कहीं सोवियत संघ (रूस) वियतनाम के समर्थन में उस पर हमला न कर दे, इसलिए उसने युद्धविराम की घोषणा कर दी। चीनी सैनिकों ने वियतनामी क्षेत्रों को खाली कर दिया। लेकिन वियतनाम ने अपने सैनिकों को कम्बोडिया से नहीं हटाया। वियतनाम के सैनिक 1989 तक कम्बोडिया में जमे रहे जिससे पोल पॉट के दोबारा सत्ता में आने की सारी संभावनाएं खत्म हो गयीं। इस लिहाज से चीन इस लड़ाई में हार गया क्यों कि वह अपने समर्थक पोल पॉट को सत्ता नहीं दिला सका। वियतनाम इसलिए जीता हुआ माना गया क्यों कि वह चीन के प्रबल विरोध के बाद भी कम्बोडिया में मौजूद रहा। 1979 की लड़ाई के बाद चीन ने फिर कोई प्रत्यक्ष युद्ध नहीं लड़ा है। वियतनाम युद्ध में उसकी कई सामरिक खामियां उजागर हुईं थीं। बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों के मारे जाने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी हतबप्रभ रह गयी थी। भारत ने इस युद्ध में वियतनाम को कूटनीतिक समर्थन दिया था। जब तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन की यात्रा छोड़ कर भारत लौटने लगे तो चीनी सरकार ने उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए अनुरोध किया था। उस समय भारत ने चीन की विस्तारवादी नीति का आलोचना की थी। जब वियतनाम चीन की हेकड़ी ढीली कर सकता है तो परमाणु ताकत से लैस भारत क्यों नहीं ?












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