गामा पहलवान से कुलसुम नवाज़ का क्या था नाता

कुलसुम नवाज़
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कुलसुम नवाज़

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज़ की लंदन में मृत्यु हो गई. वो 68 वर्ष की थीं.

बीते साल अगस्त में जानकारी हुई थी कि उन्हें कैंसर है और इस साल 14 जून को उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा था.

उनके पति नवाज़ शरीफ और बेटी मरियम दोनों ही पाकिस्तान की जेल में हैं. उन्हें जुलाई में हुए चुनावों से पहले भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से बीमार कुलसुम नवाज़ को लंदन में छोड़कर आना पड़ा था.

कुलसुम साल 2017 में सांसद चुनी गईं थीं लेकिन वो शपथ नहीं ले पाईं क्योंकि अपने इलाज के लिए वो विदेश में थीं.

जब नवाज़ और मरियम शरीफ जुलाई में पाकिस्तान जाने के लिए लंदन छोड़ रहे थे तो उन्हें अंदाज़ा था कि दोनों को लंबा वक़्त जेल में बिताना पड़ सकता है और शायद वो कुलसुम नवाज़ को दोबारा नहीं देख पाएंगे.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कुलसुम नवाज़ को "साहसिक और गरिमापूर्ण महिला" बताया है.

कुलसुम नवाज़
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ग्रेट गामा पहलवान की नातिन

कुलसुम का जन्म साल 1950 में एक व्यापारी और निवेशक मोहम्मद हफीज़ बट और उनकी पत्नी रजिया बेगम के यहां हुआ. उनकी दो बहनें और दो भाई भी थे.

उनके पिता मूल रूप से कश्मीरी थे और लाहौर में बसे थे जबकि उनकी मां रज़िया बेगम अमृतसर के एक प्रसिद्ध पहलवान परिवार से थीं जो 1947 में भारत से लाहौर जाकर बस गया था.

कुलसुम नवाज़ मशहूर गामा पहलवान की नातिन थीं.

उन्होंने 1970 में लाहौर के प्रतिष्ठित फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज यूनिवर्सिटी से उर्दू साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. साल 1971 में अमीर उद्योगपतियों के परिवार से आए नवाज़ शरीफ़ से उनका निकाह हुआ. उनके पति तीन बार (1990-1993, 1997-1999 और 2013-2017) पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फि़कार अली भुट्टो के शासन में 1970 में उनके उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हो गया था. नतीजतन, शरीफ़ परिवार ने 1977 के सैन्य विद्रोह का समर्थन किया जिसने भुट्टो सरकार गिरा दी और फिर दो साल बाद विवादित ट्रायल के बाद भुट्टो को फांसी दे दी गई.

परिवार का राजनीति से नाता

ये जानते हुए कि परिवार को अपनी राजनीतिक पैंठ बनानी होगी, कुलसुम के ससुर मियां मोहम्मद शरीफ़ ने नवाज़ शरीफ़ के राजनीति में आने की राह तैयार की.

नवाज़ शरीफ़ 1977 में सेना के समर्थन वाली पाकिस्तान मुस्लिम लीग पार्टी में शामिल हो गए और फिर पंजाब के तत्कालीन सैन्य गवर्नर जनरल गुलाम जिलानी खान ने उन्हें राजनीति के लिए तैयार किया.

बिज़नेस स्टडीज में स्नातक शरीफ को जल्द ही पंजाब प्रांत की सेना से संचालित कैबिनेट में वित्त मंत्री नियुक्त किया गया. 1985 के गैर-पार्टी चुनावों में वह पंजाब के मुख्यमंत्री बने और 1990 में पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने.

कुलसुम नवाज़
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कुलसुम नवाज़

मिसाल पेश की

उन्हें 1993 में पद से हटा दिया गया लेकिन 1997 में नवाज़ शरीफ ने फिर से सत्ता हासिल कर ली.

उनके चार बच्चे हैं. इनमें दो बेटे और दो बेटियां हैं.

पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में वो पहली बार अक्तूबर 1999 में सामने आईं जब उनके पति की सरकार को गिरा दिया गया और उन्हें क़ैद कर लिया गया था.

उन्हें एक साल तक कैद में रहना पड़ा लेकिन जब नवाज़ शरीफ़ को मिलिट्री कोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई तो वे अगले 10 सालों तक देश ना लौटने की शर्त पर सऊदी अरब में अपने परिवार के साथ चले गए.

कुलसुम नवाज़ तब सुर्खियों में आईं जब हिरासत के दौरान सुरक्षाकर्मियों की अवहेलना करते हुए उन्होंने अपने मॉडल टाउन निवास से पूरे लाहौर शहर में जुलूस निकाला. उस वक्त वह पीएमएलएन पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष थीं और साल 2002 तक पद पर बनी रहीं.

मरियम नवाज़-नवाज़ शरीफ़
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मरियम नवाज़-नवाज़ शरीफ़

राजनीति में नवाज़ शरीफ की हमकदम

उसके बाद कुलसुम राजनीति से दूर रहीं लेकिन पिछले साल जब उनके पति को सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य करार दिया तो पार्टी ने उन्हें अपने पति की सीट से उपचुनाव में खड़ा किया. कुछ लोगों को पार्टी के इस फैसले से हैरानी हुई क्योंकि ऐसा लग रहा था कि शरीफ़ अपनी बेटी को अपनी राजनीतिक विरासत थमाएंगे.

लेकिन राजनीति के कुछ जानकारों ने बताया कि कुलसुम नवाज़ कोई राजनीतिक नौसिखिया नहीं थीं.

वह 1970 के दशक से ही नवाज़ शरीफ़ के पूरे राजनीतिक करियर के दौरान उनके साथ खड़ी रहीं और कई मामलों पर सलाह भी देती रहीं.

कुछ पार्टी नेताओं के मुताबिक़ उन्होंने कभी-कभी शरीफ के लिए भाषण भी लिखे और जब 1999 में मुशर्रफ़ शासन में शरीफ़ को गिरफ्तार किया गया तो कुलसुम ने उनकी रिहाई के लिए अभियान भी चलाया.

लेकिन कुलसुम नवाज़ अपनी राजनीतिक ज़िंदगी नहीं जी पाईं.

उन्होंने चुनाव आयोग में नामांकन पत्र दाखिल किया लेकिन फिर अचानक उसी दिन लंदन के लिए जाना पड़ा जब दोबारा उनकी उम्मीदवारी पर उठाई गई आपत्तियों का जवाब देने के लिए उन्हे आयोग के सामने पेश होना था.

कुछ लोगों ने उनके विदेश जाने को लेकर आलोचना भी की क्योंकि वो इसे मतदाताओं को हल्के में लेने की तरह देख रहे थे लेकिन जल्द ही पता चल गया कि उन्हें कैंसर है.

आखिरकार उनके नामांकन को मंजूरी दे दी गई और उन्होंने बड़े अंतर से इमरान खान की पीटीआई पार्टी के उम्मीदवार को हराया.

लेकिन सांसद के रूप में शपथ लेने के लिए वह कभी देश वापस नहीं आ सकीं.

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