क्या है NATO, जिसके नाम से भड़का है रूस, क्या भारत को बनना चाहिए शक्तिशाली गठबंधन का हिस्सा?
साल 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन यानि नाटो का गठन किया गया था और गठन के वक्त इस संगठन का एकमात्र उद्येश्य रूस के खिलाफ एक मजबूत सैन्य गठबंधन का निर्माण करना था।
नई दिल्ली, फरवरी 01: विश्व का सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन, नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन यानि नाटो, जिसके नाम से ही रूस भड़क जाता है और जिसको लेकर अभी रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जैसे हालात हैं, आखिर वो क्या है? आखिर नाटो के नाम से चीन और रूस जैसे देश क्यों गुस्से में आगबबूला हो जाते हैं और आखिर भारत अभी तक नाटो का हिस्सा क्यों नहीं बना है? नाटो को लेकर रूस का गुस्सा कितना ज्यादा है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि यूक्रेन ने जैसे ही नाटो में शामिल होने की इच्छा जताई, रूस ने एक लाख से ज्यादा सैनिक यूक्रेन की सीमा पर भेज दिए। ऐसे में सवाल ये है, कि क्या भारत को नाटो गठबंधन का हिस्सा बनना चाहिए?

क्या है नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन?
साल 1949 में नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन यानि नाटो का गठन किया गया था और गठन के वक्त इस संगठन का एकमात्र उद्येश्य रूस के खिलाफ एक मजबूत सैन्य गठबंधन का निर्माण करना था और नाटो के गठबंधन के वक्त इसमें अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन और आठ दूसरे यूरोपीय देश शामिल थे और धीरे धीरे इसमें कई और यूरोपीय देश जुड़ते चले गये और इस वक्त नाटो गठबंधन में 30 देश शामिल हैं और नाटो गठबंधन यूनाइटेड नेशंस के साथ मिलकर काम करता है। नाटो गठबंधन का मुख्यालय ब्रुसेल्स में है और इस गठबंधन की सबसे बड़ी खासियत ये है, कि अगर नाटो गठबंधन में शामिल किसी भी देश पर हमला होता है, तो उसे सभी 30 देश पर हमला माना जाएगा और सभी 30 देश एकसाथ सैन्य कार्रवाई करेंगे। इसीलिए नाटो गठबंधन विश्व का सबसे मजबूत सैन्य गठबंधन है। लिहाजा अकसर सवाल उठते रहते हैं, कि क्या चीन को रोकने के लिए भारत को भी नाटो को सदस्य बन जाना चाहिए, क्योंकि नाटो के निर्माण के बाद से ही भारत को इसमें शामिल होने का कई बार न्योता दिया गया।

चीन ने बढ़ाई है भारत की चिंता
पिछले कई सालों से चीन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दखल देने की कोशिश में है और यूरोपीय देशों ने भी हिंद प्रशांत क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की दिशा में अहम कदम उठाए हैं और भारत इस बात को काफी अच्छे से जानता है, कि कोई भी एक शक्ति हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा पैदा नहीं कर सकती है। इसके साथ ही चीन ने अपनी राजनीतिक विचारधारा वाले देशों के साथ मिलकर जिस तरह से भारत के लिए 'खतरा' पैदा किया है, उसके बाद इस समूचे क्षेत्र में भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए और चीन के वर्चस्ववादी सिद्धांत को चुनौती देने के लिए काफी ज्यादा कोशिशें करनी होंगी। साल 2019 में भारत को नाटो सहयोगी देश बनाने के लिए अमेरिकी सीनेटर्स ने मांग भी की थी और नाटो के आर्म्स सिद्धांत में संशोधन कर भारत को हथियार बनाने के लिए हाई-टेक्नोलॉजी देने की मांग की गई थी।
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क्या भारत को बनना चाहिए हिस्सा?
अमेरिका और रूस के बीच करीब 30 सालों तक शीत युद्ध चलता रहा और शीत युद्ध के दौरान भारत की दोस्ती अमेरिका के बजाय रूस के साथ ज्यादा रही और शीत युद्ध के दौरान भारत ने ऐसे किसी भी गठबंधन में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था और इसके पीछे भारत का गुटनिरपेक्ष सिद्धांत था। लेकिन, शीत युद्ध खत्म होने के बाद साल 1989 से 91 के बीच नाटो गठबंधन में ऐसे कई देश शामिल हो गये, जो गुट निरपेक्ष गुट का भी हिस्सा थे। और इसके पीछे नाटो की सबसे बड़ी शक्ति अनुच्छेद पांच है, जिसमें कहा गया है कि, नाटो के किसी भी सदस्य देश पर हमला गठबंधन के सभी सदस्य देशों के ऊपर हमला माना जाएगा और नाटो उस देश के खिलाफ संयुक्त सैन्य कार्रवाई करेगा। लिहाजा कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि, भारत को अब नाटो का सदस्य बन जाना चाहिए, क्योंकि अगर भारत नाटो का सदस्य बनता है, तो उसे चीन और पाकिस्तान के खिलाफ एक 'कवच' मिल जाएगा।

भारत को होगा सामरिक फायदा
एक्सपर्ट्स का कहना है कि, अगर भारत नाटो गठबंधन का हिस्सा बन जाता है, तो भारत को सबसे बड़ा फायदा हथियार क्षेत्र में होगा और भारत को बिना किसी खास मेहनत के उन्नत हथियारों का निर्माण करने के लिए टेक्नोलॉजी मिल जाया करेगी और भारत का नाटो गठबंधन के साथ नियमित संपर्क स्थापित हो जाएगा। इसके साथ ही नाटो गठबंधन के कई सदस्य देशों के साथ भारत का पहले से ही रक्षा संबंध हैं, जिनमें ब्रिटेन, अमेरिका और फ्रांस शामिल हैं, लिहाजा भारत के लिए नाटो सहयोगियों के साथ संबंध बनाना काफी आसान भी होगा और भविष्य में भारत को दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन के साथ सैन्य रणनीतिक लाभ भी मिलेगा और भारत से उसके दुश्मन देश सीधे तौर पर डरेंगे।

नाटो में शामिल होने से भारत को नुकसान
हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि, अगर भारत को नाटो में शामिल होने से कई फायदे हो सकते हैं, तो इसके कई नुकसान भी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि, नाटो गठबंधन में शामिल कई देशों में काफी आतंरिक विरोध हैं। नाटो गठबंधन में शामिल देशों और यूरोपीय संघ के बीच भी कई मुद्दों पर विरोध रहते हैं और नाटो गठबंधन में शामिल कई देश, रूस, मिडिल ईस्ट और चीन से संबंधित नीति पर भी परस्पर विरोधी रूख रखते हैं, लिहाजा अगर भारत भी नाटो में शामिल होता है, तो भारत को भी इन नये तरह के सरदर्द में फंसना होगा।

रूस के साथ संबंध हो जाएंगे खराब
चूंकी नाटो का गठन ही रूस के खिलाफ हुआ था, लिहाजा अगर भारत नाटो गठबंधन में शामिल होता है, तो भारत और रूस के संबंध फौरन खराब हो जाएंगे और भारत अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी के साथ अपने संबंधों को खराब नहीं करना चाहेगा। एक दिन पहले भी यूक्रेन के मुद्दे पर भी यूनाइटेड नेशंस में वोटिंग के दौरान भारत गैरहाजिर रहकर रूस की मदद कर चुका है और भारत अमेरिका के खिलाफ जा चुका है, जो दिखाता है कि, भारत के लिए रूस अभी भी कितना ज्यादा महत्वपूर्ण है। इतना ही नहीं, रूस पहले भी अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते सामरिक समझौतों पर नाराजगी जता चुका है, लिहाजा एक्सपर्ट्स कहते हैं, कि भारत रूस के साथ अपने संबंधों को खतरे में नहीं डालना चाहेगा। वहीं, भारत चूंकी अभी भी अपने 60 फीसदी सैन्य उपकरणों के लिए रूस पर निर्भर रहता है, लिहाजा एक्सपर्ट्स मानते हैं कि, नाटो में शामिल होने का विचार भारत के लिए सही नहीं होगा।

क्या मानते हैं डिफेंस एक्सपर्ट्स?
नाटो में भारत के शामिल होने और ना होने को लेकर तमाम एक्सपर्ट्स इस बात पर एकमत होते हैं, कि भारत को फिलहाल नाटो गठबंधन में शामिल नहीं होना चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, भारतीय विदेश नीति का अहम हिस्सा नाटो जरूर होना चाहिए और नाटो को लेकर भारत को अपनी राजनीतिक उपेक्षा जरूर खत्म करनी चाहिए, लेकिन भारत को नाटो का आधिकारिक सदस्य बनने से बचना चाहिए। एक्सपर्ट्स ये भी कहते हैं कि, नाटो गठबंधन दुनिया में कहीं ना कहीं लगातार टकराव में रहते हैं और अगर भारत इसमें शामिल होता है, तो बिना मतलब भारतीय सैनिक अलग अलग संघर्षों के दौरान मारे जाएंगे, लिहाजा भारत को नाटो में शामिल होने का कोई उचित कारण फिलहाल नहीं दिखाई देता है।
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