APEC की कहीं नहीं थी चर्चा... जिनपिंग और बाइडेन की मुलाकात से बढ़ी पूछ, PM मोदी क्यों नहीं हुए शामिल?
दुनिया इस वक्त दो बड़े जंगों से जूझ रही है। रूस-यूक्रेन के अलावा इजराइ और हमास भी एक दूसरे से भिड़े हुए हैं। इन दोनों जंगों के बीच दुनिया दो फाड़ हो चुकी है और एक बार फिर से शीत युद्ध के खतरे की आहट मंडराने लगी है। इसी बीच 15 नवंबर की तारीख एक बड़ी घटना का गवाह बनने जा रही है।
संयुक्त राज्य अमेरिका 2011 के बाद पहली बार विश्व नेताओं के वार्षिक APEC शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। आज बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग APEC शिखर सम्मेलन के मौके पर आज आमने-सामने बैठकर मुलाकात करेंगे। बाइडेन और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के अलावा सैन फ्रांसिस्को में अन्य नेताओं का जमावड़ा भी लगेगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इनमें जापान के प्रधान मंत्री फुमियो किशिदा, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो, कनांडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो और रूस से डिप्टी सीएम एलेक्सी ओवरचुक आदि के नाम शामिल हैं।
क्या है APEC?
APEC का मतलब एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग है। यह प्रशांत महासागर के आसपास के देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने का एक मंच है। इस मंच का उद्देश्य एशिया-प्रशांत की बढ़ती निर्भरता का लाभ उठाना और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण के माध्यम से क्षेत्र को समृद्ध बनाना है। यह बैठक सदस्य देशों के बीच हर साल बारी-बारी से होती रहती है।
APEC समूह की शुरुआत 1989 में 12 सदस्यों के साथ हुई थी, लेकिन तब से चीन, रूस, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित 21 सदस्य हो गए हैं। ये सदस्य देश वैश्विक आबादी का लगभग 40 प्रतिशत और विश्व के व्यापार का लगभग आधा हिस्सा हैं।
APEC के सदस्य देशों में ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, न्यूजीलैंड, पापुआ न्यू गिनी, फिलीपींस, इंडोनेशिया, ताइवान, मलेशिया, हांगकांग, वियतनाम, सिंगापुर, थाईलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, मैक्सिको, पेरू और चिली हैं।
व्हाइट हाउस के सहयोगियों का कहना है कि इस साल के शिखर सम्मेलन का लक्ष्य बढ़ते जलवायु मुद्दे और कोरोना के बाद उबर रही APEC अर्थव्यवस्थाओं को और अधिक लचीला बनाने का प्रयास करना है।
APEC कितना प्रभावी है?
APEC मंच का दायरा सीमित है। यह व्यापार और अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है। इसमें कोई सैन्य घटक नहीं है और यह युद्ध जैसी विश्व-परिवर्तनकारी घटना से उत्पन्न नहीं हुआ है। इसमें तकनीकी रूप से देशों के बजाय सदस्य "अर्थव्यवस्थाएं" हैं। यही वजह है कि इसमें चीन नियंत्रित हांगकांग और स्वशासित ताइवान दोनों की भागीदारी है।
APEC की ताकत देशों को बड़ी पहलों पर एक साथ काम करने और बाध्यकारी समझौतों के बिना व्यापारिक संबंधों को आसान बनाने की क्षमता में निहित है। इस मंच की शुरुआत बढ़ते वैश्वीकरण के दौर में हुई थी, लेकिन तब की तुलना में अब व्यापार परिदृश्य अलग हैं।
अमेरिकी रणनीति सहयोग के बजाय चीन के साथ आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर केंद्रित रही है, भले ही अमेरिकी नेता सहयोग के महत्व पर जोर देते रहे हैं। बाइडेन इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी, फर्नीचर, कपड़ा और अन्य सामान जैसे चीनी विनिर्माण आयात के विकल्प विकसित करने के लिए क्षेत्र में अन्य देशों के साथ साझेदारी की तलाश कर रहे हैं।
बाइडेन नए इंडो-पैसिफिक व्यापार समझौते पर प्रगति को उजागर करने की भी कोशिश कर रहे हैं, जो पिछले साल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अधिक लोकप्रिय ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप से हटने के बाद शुरू हुआ था।
हाल के वर्षों में सम्मेलन में अपनी चुनौतियां और नाटकीय क्षण आए हैं। COVID-19 महामारी के कारण समूह की 2020 और 2021 में वर्चुअल बैठक हुई। 2022 में इसका आयोजन थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में हुआ था।
पिछले साल जो बाइडेन शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए क्योंकि उनकी पोती की शादी हो रही थी। उन्होंने अपनी जगह उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को भेजा था। बाइडेन के इस निर्णय को कुछ APEC नेताओं ने संगठन की उपेक्षा माना था। फिर, जैसे ही सम्मेलन में रूसी प्रतिनिधि ने बोलना शुरू किया, अमेरिका और चार अन्य देशों के प्रतिनिधि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण का विरोध करने के लिए बाहर चले गए।
चिली ने बड़े पैमाने पर विरोध के कारण 2019 में APEC मेजबान के रूप में अपना नाम वापस ले लिया था। वहीं, पिछले साल जब थाईलैंड ने बैंकॉक में शिखर सम्मेलन की मेजबानी की, तो लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों ने थाई प्रधानमंत्री की वैधता को चुनौती दी, जिसके बाद पुलिस को भीड़ पर रबर की गोलियों से गोलीबारी करनी पड़ी, जिसमें कई प्रदर्शनकारी और एक रॉयटर्स पत्रकार घायल हो गए थे।
इस साल इजराइल-हमास युद्ध को लेकर मनमुटाव बढ़ सकता है। शिखर सम्मेलन में शामिल विभिन्न देशों के पास संघर्ष के दोनों पक्षों पर मजबूत विचार हैं। आमतौर पर, किसी शिखर सम्मेलन के समापन पर सभी देशों द्वारा किसी प्रकार का संयुक्त बयान दिया जाता है, लेकिन इस वर्ष उन मतभेदों के कारण ऐसा नहीं किया गया है।
पीएम मोदी भी किए गए थे आमंत्रित
भारत इस समूह का सदस्य नहीं है, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। जून में पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान राष्ट्रपति जो बाइडन ने भारत को आमंत्रित किया था
पीएम मोदी ने नहीं लिया हिस्सा
हालांकि भारत के केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल इस शिखर सम्मेलन भाग ले रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की वजह से पीएम मोदी ने APEC सम्मेलन में हिस्सा लेने से परहेज किया।
भारत भी बनना चाहता है APEC का हिस्सा
भारत APEC का सदस्य बनने के लिए लंबे समय से प्रयास कर रहा है। पहली बार भारत की तरफ से 1991 में APEC में शामिल होने की मंशा जताई थी। उस समय भारत ने आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में कदम उठाने शुरू किए थे।
APEC में सदस्यता विस्तार पर अनौपचारिक रोक होने के कारण भारत का APEC में शामिल होना संभव नहीं हो पाया है। 2015 में यूएस-भारत संयुक्त रणनीतिक विजन में अमेरिका ने भारत की इस मंशा का स्वागत किया था।
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