कितनी खतरनाक है AIP टेक्नोलॉजी वाली पनडुब्बी? चीन-PAK के लिए बना रहा भारत, क्यों कहा जाता है समंदर का शिकारी?
Indian Navy News: भारतीय नौसेना के पास इस वक्त एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) टेक्नोलॉजी वाली एक भी पनडुब्बी नहीं है। ये एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जो किसी पनडुब्बी को समंदर का शांत मगर खूंखार शिकार बना देती है। ये टेक्नोलॉजी पारंपरिक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी की सतह के नीचे रहने में मदद करती है।
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है, कि भारत ने स्वदेशी रूप से AIP टेक्नोलॉजी का विकास कर लिया है और अगले साल तक भारतीय नौसेना के बेड़े में फ्रांसीसी स्कॉर्पीन पनडुब्बी पर फिट कर दी जाएगी।

बहुत ही साधारण शब्दों में समझें, तो सामान्य पनडुब्बियां पानी के अंदर ज्यादा समय तक नहीं रह सकती हैं और उन्हें बार बार बैट्री चार्ज के लिए बाहर आना पड़ता है और ऐसे में अमेरिका और चीन जैसे देशों ने परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण कर लिया है, जो बिना शोर किए ना सिर्फ तेज रफ्तार से समुद्र के अंदर चल सकती हैं, बल्कि कई महीनों तक समंदर के अंदर रह सकती हैं। लेकिन, परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों के निर्माण में काफी ज्यादा खर्च आता है, लिहाजा परमाणु ऊर्जा का विकल्प एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) टेक्नोलॉजी है, जो पनडुब्बियों के चलने के समय के शोर को काफी कर देती है और उसे लंबे वक्त तक समुद्र के अंदर रहने के लायक बनाती है।
भारत के पास कुल 16 पनडुब्बियां हैं, जिनमें से सिर्फ एक पनडुब्बी ही परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी है और भारत लंबे समय से एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) टेक्नोलॉजी की तलाश में था।
एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) टेक्नोलॉजी के फायदे
AIP टेक्नोलॉजी, बैटरी चार्ज होने के बीच पनडुब्बी की पानी के अंदर रहने की सहनशक्ति को तीन से चार गुना बढ़ा देती है, जिससे इसका पता लगने की संभावना काफी कम हो जाती है। जैसे-जैसे हिंद महासागर में चीनी नौसेना की मौजूदगी बढ़ती जा रही है, एआईपी वाली पनडुब्बियां बिना ट्रैक हुए उन पर बेहतर तरीके से नजर रख सकती हैं।
यह तकनीक पूर्वी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में विशेष रूप से उपयोगी साबित होगी। अरब सागर और पश्चिमी हिंद महासागर में, यह पाकिस्तान के खिलाफ हमारी पानी के अंदर की युद्ध करने की क्षमता को बढ़ाएगी।
भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख समीर कामत ने 6 जुलाई को लार्सन एंड टुब्रो के एएम नाइक हेवी इंजीनियरिंग कॉम्प्लेक्स में एआईपी एकीकरण और परीक्षण सुविधा का उद्घाटन किया। मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड (MDL) में पनडुब्बी पर लगाए जाने से पहले 2025 के अंत तक इस एडवांस सिस्टम का निर्माण और टेस्ट कॉम्प्लेक्स में किया जाएगा।
एआईपी-संचालित पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां (SSK) परमाणु ऊर्जा से चलने वाली नावों और गैर-एआईपी SSK के बीच में आती हैं। वे एक SSK को 10 से 14 दिनों तक पानी में डूबे रहने की अनुमति देते हैं, बिना अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए सतह पर आने की आवश्यकता के, लेकिन इससे दुश्मनों के लिए इनका पता लगाना आसान हो जाता है। वहीं, अन्य एसएसके करीब 48 घंटे तक पानी के नीचे रह सकते हैं।
लेकिन ईंधन-सेल-आधारित एआईपी अद्वितीय है, क्योंकि यह जहाज पर अपनी हाइड्रोजन की आवश्यकता उत्पन्न करता है। एक बार बनने के बाद इस तकनीक को बाकी स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियों में लगाने से पहले और परीक्षण से गुजरना होगा। वहीं, एक्सपर्ट्स ने बताया है, कि नई तकनीक के साथ हथियार प्लेटफॉर्म को अपग्रेड करने से ऑपरेशनल तत्परता कम हो जाएगी, क्योंकि इसके मरम्मत में कम से कम एक साल लगेगा।
भारत की चीन-पाकिस्तान की क्षमताओं पर नजर
भारतीय नौसेना जब एक बार AIP टेक्नोलॉजी हासिल लेता है, को फिर उसका बेड़ा पाकिस्तान के बेड़े से काफी बेहतर स्थिति में होगा। पाकिस्तान के तीनों फ्रांसीसी अगोस्टा-90B (PNS खालिद, साद और हमजा) AIP द्वारा संचालित हैं। पाकिस्तान को चीन के साथ 5 अरब अमेरिकी डॉलर के सौदे के तहत 2023 के अंत तक आठ 39 A युआन-क्लास AIP-संचालित पनडुब्बियाँ मिलने की भी उम्मीद है।
भारत लंबे समय से जर्मनी, फ्रांस और रूस से यह महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी हासिल करने की कोशिश कर रहा है। 2005 में, भारत ने छह स्कॉर्पीन पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए फ्रेंको-स्पेनिश संघ आर्मरिस के साथ एक समझौता किया था।
पांचवीं स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी जनवरी 2023 में भारतीय नौसेना में शामिल की गई। ये पनडुब्बियां भी AIP के बिना हैं, लेकिन उन्हें इस तकनीक के साथ फिर से तैयार करने की योजनाएं बन रही हैं। INS वाग्शीर (S26) (कलवरी-क्लास) का निर्माण किया जा रहा है, और AIP क्षमता वाली तीन और इकाइयों की योजना है।
भारतीय पनडुब्बी बेड़े में वर्तमान में 16 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं और हाल ही में बनी छह पनडुब्बियों के अलावा, बाकी 30 साल से ज्यादा पुरानी हैं और उनके रिटायरमेंट की उम्र काफी करीब है। पनडुब्बियों को शामिल करने में देरी की वजह से भारतीय नौसेना को अपने SSK-209s (जर्मन HDWs) और EKMs (रूसी किलो) को 10-15 साल तक चालू रखने के लिए उन्हें बीच में ही ठीक करना पड़ा।
भारत इस वक्त 6 पनडुब्बियों का निर्माण कर रहा है और इस प्रोजेक्ट का नाम 'प्रोजक्ट 75I' है और भारत इसके लिए अलग अलग देशों से बात कर रहा है।
अंडरवाटर शक्ति बढ़ा रहा है भारत
एक बात तो साफ है, कि अगर भारत इंडो-पैसिफिक में चीन से प्रभावी तरीके से मुकाबला करना चाहता है, तो उसे अंडरवॉटर गेम को और बेहतर बनाना होगा।
भारतीय नौसेना ने हाल ही में जर्मन थिसेनक्रुप और स्पेनिश नवांटिया की तरफ से पनडुब्बियों के निर्माण को लेकर मिले ऑपर का मूल्यांकन पूरा किया है। जर्मन शिपबिल्डर थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TkMS) ने AIP तकनीक के साथ छह पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए प्रोजेक्ट-75 के लिए बोली लगाने के लिए 2023 में भारतीय मझगांव डॉक्स लिमिटेड (MDL) के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।
TkMS ने पिछले 75 वर्षों में 170 से ज्यादा पनडुब्बियों का निर्माण किया है और दक्षिण कोरिया, तुर्की, इटली, इजराइल और सिंगापुर जैसे कई ग्राहकों के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) सहयोग किया है। इसकी पारंपरिक पनडुब्बियां भारतीय नौसेना (शिशुमार श्रेणी) में भी हैं। उनमें से तीन का निर्माण MDL (शाल्की श्रेणी) के साथ स्वदेशी रूप से किया गया था।
इस रेस में शामिल अन्य दावेदार स्पेन की नवांटिया के पास अभी तक कोई ऑपरेशनल एआईपी तकनीक नहीं है। 2023 में, एस-80 पनडुब्बियों के लिए एआईपी बेस्ट (बायो-इथेनॉल स्टील्थ टेक्नोलॉजी) सिस्टम के फैक्ट्री टेस्ट किए गये थे।
वहीं, यह देखते हुए कि सौदे पर हस्ताक्षर करने के बाद पहली स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी को भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल होने में 11 साल लग गए, प्रोजेक्ट 75 'आई' के तहत बनने वाली पनडुब्बियों को ऑपरेशन में आने में कम से कम एक दशक लगने का अनुमाने लगाया गया है।
पनडुब्बियों के मामले में भारतीय नौसेना चीनी नौसेना से 4:1 से पीछे है। 25 मार्च को, भारतीय नौसेना ने पश्चिमी समुद्र तट पर अपनी पनडुब्बियों के एक समूह की आश्चर्यजनक तस्वीरें जारी कीं। अरब सागर में हाल ही में खत्म हुए अभ्यास में आठ पनडुब्बियों ने एक साथ काम किया था। भारतीय नौसेना अभी भी चीन की पनडुब्बी सेना के 76 प्लेटफार्मों से काफी पीछे है, जिसमें 8 एसएसबीएन (बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी), 13 एसएसएन (परमाणु ऊर्जा चालित हमलावर पनडुब्बियां) और 55 एसएसके (डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां) शामिल हैं।
इससे पहले, पूर्व भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल हरि कुमार ने खुलासा या, था कि भारतीय नौसेना ने आईओआर के विभिन्न हिस्सों में संचालन के लिए एक साथ 11 पारंपरिक पनडुब्बियों को तैनात किया था।
स्वदेशी एआईपी को सितंबर 2025 में अपने पहले बड़े रिफिट से गुजरने पर आईएनएस कलवरी पनडुब्बी पर लगाया जाएगा। आईएनएस कलवरी एमडीएल द्वारा बनाई गई पहली स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी है। परिचालन पनडुब्बी को फिर से तैयार करने के लिए इसे आधे हिस्सों में काटना होगा और एक नया एआईपी खंड डालना होगा, जिससे इसकी लंबाई और वजन बढ़ जाएगा। फ्रांसीसी शिपबिल्डर नेवल ग्रुप इस जटिल प्रक्रिया में भारत की मदद करेगा।
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