US Iran Deal: अब ईरान नहीं, अमेरिका का नया दुश्मन बना इजराइल! वो 5 कारण, क्यों ट्रंप-नेतन्याहू के बीच आई दरार?

US Iran Deal Impact on Israel: अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए समझौते के बाद Middle East की राजनीति तेजी से बदलती दिख रही है। इस बीच इजराइल को एक और बड़ा झटका तब लगा, जब उसके रक्षा मंत्री बेन ग्वीर को अमेरिका का वीजा नहीं मिला और उन्हें अपना मियामी दौरा रद्द करना पड़ा।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच कई मुद्दों पर मतभेद बढ़ते नजर आ रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान के बाद अब अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में भी दरार आ रही है? आइए पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।

US Iran Deal Impact on Israel

बेन ग्वीर को वीजा क्यों नहीं मिला?

इजराइली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रक्षा मंत्री बेन ग्वीर ने अमेरिका जाने के लिए वीजा आवेदन किया था। वह एक पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए मियामी जाना चाहते थे। अमेरिकी दूतावास ने उनसे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी करने को कहा। अधिकारियों ने यह भी बताया कि उनके खिलाफ दर्ज मामलों के कारण अतिरिक्त जांच जरूरी है। ग्वीर ने दूतावास पहुंचने और बायोमेट्रिक डेटा देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उनका वीजा क्लियर नहीं हुआ और उन्हें यात्रा रद्द करनी पड़ी।

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ईरान डील पर सबसे आक्रामक बयान ग्वीर ने दिया था

अमेरिका-ईरान समझौते की घोषणा के बाद इजराइल की तरफ से सबसे कड़ी प्रतिक्रिया बेन ग्वीर की ही आई थी। उन्होंने साफ कहा था कि इजराइल किसी अमेरिकी समझौते को मानने के लिए बाध्य नहीं है। ग्वीर ने यह भी संकेत दिया कि इजराइली सेना लेबनान से पीछे नहीं हटेगी। उनका बयान ट्रंप प्रशासन की उस कोशिश के खिलाफ माना गया, जिसमें क्षेत्र में तनाव कम करने और संघर्ष रोकने की बात कही जा रही है। इससे वॉशिंगटन और तेल अवीव के बीच दूरी बढ़ने की चर्चा तेज हो गई।

कौन हैं बेन ग्वीर और क्यों हैं विवादों में?

50 वर्षीय बेन ग्वीर इजराइल की दक्षिणपंथी राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। वह लंबे समय से कट्टर राष्ट्रवादी विचारों के लिए चर्चा में रहे हैं। उनके खिलाफ अतीत में हिंसा भड़काने और चरमपंथी संगठनों के समर्थन से जुड़े कई आरोप लग चुके हैं। हालांकि वह इन आरोपों को राजनीतिक बताते रहे हैं। गठबंधन राजनीति के कारण उन्हें सरकार में अहम जिम्मेदारी मिली। प्रधानमंत्री नेतन्याहू के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होती है। इसलिए उनके साथ जुड़ी हर घटना को सरकार की राजनीतिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है।

ट्रंप और नेतन्याहू के रिश्तों में क्या बदल गया?

एक समय ऐसा था जब ट्रंप और नेतन्याहू को दुनिया की सबसे मजबूत राजनीतिक जोड़ियों में गिना जाता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों में कई मुद्दों पर दोनों नेताओं की सोच अलग दिखाई दी है। खासकर ईरान और लेबनान को लेकर दोनों के बीच मतभेद बढ़े हैं। ट्रंप क्षेत्रीय तनाव कम करना चाहते हैं, जबकि नेतन्याहू सुरक्षा खतरों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की बात कर रहे हैं। यही वजह है कि पहले जैसी केमिस्ट्री अब दिखाई नहीं दे रही और दोनों देशों के रिश्तों पर सवाल उठने लगे हैं।

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लेबनान बना अमेरिका-इजराइल टकराव का नया केंद्र

लेबनान में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइली कार्रवाई लंबे समय से जारी है। अमेरिका चाहता है कि संघर्ष सीमित रहे ताकि क्षेत्र में व्यापक युद्ध न छिड़े। दूसरी तरफ इजराइल का मानना है कि सुरक्षा के लिए सैन्य दबाव बनाए रखना जरूरी है। रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप ने निजी बातचीत में नेतन्याहू से बेरूत पर हमले रोकने को कहा था। कुछ समय के लिए कार्रवाई धीमी हुई, लेकिन बाद में हमले फिर शुरू हो गए। इसके बाद दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेद और ज्यादा स्पष्ट हो गए।

चुनावी दबाव नेतन्याहू को कितना प्रभावित कर रहा है?

इजराइल में संभावित चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं और कई सर्वे नेतन्याहू के लिए चुनौतीपूर्ण तस्वीर दिखा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी दबाव के कारण नेतन्याहू ज्यादा आक्रामक रुख अपना सकते हैं। वह अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होगा। दूसरी तरफ अगर वह ट्रंप की लाइन पर पूरी तरह चलते हैं तो घरेलू राजनीति में नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि वह अमेरिका से मतभेद के बावजूद अपनी स्वतंत्र नीति का संकेत दे रहे हैं।

क्या अब अमेरिका और इजराइल के बीच नई दूरी बन रही है?

फिलहाल अमेरिका और इजराइल को दुश्मन कहना अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि दोनों देशों के बीच रक्षा, खुफिया और रणनीतिक साझेदारी अब भी बेहद मजबूत है। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका-ईरान समझौते ने रिश्तों में नई असहजता पैदा कर दी है। बेन ग्वीर का वीजा विवाद, लेबनान पर मतभेद और ईरान नीति को लेकर अलग-अलग सोच इसी बदलाव के संकेत हैं। आने वाले 60 दिनों में अगर समझौता आगे बढ़ता है तो तनाव और बढ़ सकता है। इसलिए दुनिया की नजर अब वॉशिंगटन और तेल अवीव के अगले कदम पर टिकी हुई है।

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