PART-3: अमेरिका के प्यादे हैं मोहम्मद युनूस; बांग्लादेश में तख्तापलट के पीछे हर कदम पर कैसे हैं US के निशान?
US-Bangladesh: अमेरिका अकसर लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन लोकतंत्र को लेकर अमेरिका के एक डबल गेम के बारे में जान लीजिए, फिर मोहम्मद युनूस के अमेरिका के साथ संबंध को लेकर तीसरे पार्ट की बात करेंगे।
बाइडेन प्रशासन ने अपने कार्यकाल के दौरान दो बार लोकतांत्रिक शिखर सम्मेलन करवाए, जिनमें दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों को आमंत्रित किया गया। हैरानी की बात ये थी, इसमें पाकिस्तान को भी शामिल होने का न्योता भेजा गया, जब इमरान खान प्रधानमंत्री हुआ करते थे, लेकिन शेख हसीना को इसमें शामिल होने का न्योता नहीं भेजा गया। ये बाइडेन प्रशासन का डबल गेम नहीं है तो और क्या है, कि जिस पाकिस्तान में एक बार भी 5 सालों तक सरकार टिक नहीं पाई, उसे न्योता भेजा जाता है, और जो प्रधानमंत्री देश को आर्थिक संपन्नता के रास्ते पर ले जा रही हैं और चरमपंथियों पर नकेल कस रही है, उसे न्योता नहीं भेजा जाता है।

अमेरिका से कितने गहरे हैं युनूस के संबंध?
मुहम्मद यूनुस की अमेरिका से नजदीकी को भारतीय ऑब्जर्वर्स ने भी उजागर किया है। नीति आयोग के सदस्य डॉ. अरविंद विरमानी ने पिछले हफ्ते की शुरुआत में "एक्स" पर लिखा था, कि "आईएमएफ में बांग्लादेश का प्रतिनिधित्व करने से मुझे जो पता चला है, वह यह है, कि मोहम्मद यूनुस के पास अमेरिका में एक बड़ा, प्रभावशाली अनुयायी वर्ग है, जिसने बांग्लादेश को आईएमएफ बीओपी ऋण रोकने के लिए यूएसजी पर पैरवी की, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री हसीना/अवामी लीग का उनके साथ व्यवहार अस्वीकार्य लगा।
पाकिस्तान के लिए आईएमएफ ऋण के प्रति अमेरिका का नजरिया इसके बिल्कुल विपरीत था।"
उन्होंने कहा, "यह एक दशक पहले की बात है, जब अवामी लीग के चुनाव जीतने (स्वतंत्र और निष्पक्ष) पर कोई सवाल ही नहीं था।" दिल्ली में आधिकारिक सूत्रों ने स्वीकार किया कि यूनुस मूल रूप से वही करेंगे, जो वाशिंगटन उन्हें करने के लिए कहेगा, लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उन्होंने रिकॉर्ड पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया, जिसमें भारत अपनी रणनीतिक चिंताओं को देखने के अलावा, हसीना के हटाए जाने के बाद से अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर भी चिंतित है।
रिपोर्ट से मोहम्मद युनूस को लेकर क्या निष्कर्ष निकलता है?
बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक और उससे जुड़ी कम से कम 48 अन्य संस्थाओं से संबंधित विभिन्न आरोपों और अनियमितताओं की जांच के लिए मामून उर रशीद के नेतृत्व में "ग्रामीण बैंक आयोग" की स्थापना की गई थी। प्रारंभिक निष्कर्षों से बैंक के मैनेजमेंट, शासन और इसके ऑपरेशन में कई तरह की अनियमितताओं का खुलासा हुआ था।
अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले इस आयोग ने 200 से ज्यादा बैठकें कीं थीं और 30,000 से ज्यादा पन्नों के दस्तावेजों की जांच की थी।
रिपोर्ट में पाया गया, कि ग्रामीण बैंक के मैनेजमेंट ने जांच आयोग के साथ सहयोग नहीं किया, आधी अधूरी और कभी-कभी गलत जानकारी प्रदान की। इसके अलावा, ग्रामीण बैंक के भीतर पारदर्शिता की भारी कमी थी। इसके अलावा, जांच में कुछ नॉमिनेटेड डायरेक्टर्स ने तो भाग लिया, लेकिन इलेक्टेड डायरेक्टर्स ने जांच में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। जांच में पता चला, कि ग्रामीण बैंक ने कई तरह की वित्तीय अनियमितताएं की हैं और देश के कानूनों का जमकर उल्लंघन किया है।

जॉर्ज सोरोस और ग्रामीण फोन
जांच रिपोर्ट में पता चला, कि ग्रामीण बैंक ने एक संगठन बनाया था, जिसका नाम था 'ग्रामीण फोन', जिसका गठन ही अवैध था और इसके जरिए वित्तीय लेनदेन को काफी ज्यादा जटिल बना दिया गद था। ग्रामीण फोन का गठन मोहम्मद युनूस के कहने पर ही किया गया था। इन संगठनों में मोहम्मद यूनुस की भागीदारी ने, उनकी जवाबदेही और पारदर्शिता के बारे में गंभीर सवाल उठाए, विशेष रूप से ट्रस्टों और अन्य संस्थाओं को जिस तरह से फंड दिए गये, वो संदिग्ध थीं।
रिपोर्ट में कहा गया है, कि फरवरी 1999 में, मोहम्मद यूनुस ने सोरोस इकोनॉमिक डेवलपमेंट फंड और ओपन सोसाइटी इंस्टीट्यूट से ऋण हासिल किया था, जिसका संचालन विवादास्पद व्यवसायी जॉर्ज सोरोस द्वारा किया जाता है, जो अपने हितों के मुताबिक कमजोर लोकतांत्रिक देशों में सत्ता परिवर्तन के लिए जाने जाते हैं।
जॉर्ज सोरोस अकसर भारतीय लोकतंत्र को लेकर भी जहर उगलते रहते हैं और अडानी को लेकर हिंडनबर्ग के खुलासों के तार भी जॉर्ज सोरोस से जुड़े हुए हैं। जांच से पता चला, ग्रामीण बैंक के के नियंत्रण से जुड़ी शर्तों के साथ जॉर्ज सोरोस की कंपनी ने ग्रामीण फोन लिमिटेड के 35% शेयर खरीदे थे।
जांच आयोग ने अपने व्यापक निष्कर्षों के आधार पर अपल की, कि ग्रामीण फोन लिमिटेड के मोबाइल दूरसंचार लाइसेंस को फौरन सस्पेंड कर दिया जाए। हालांकि, चूंकि यह एक चालू उद्यम था, इसलिए इसने कहा, कि इसे संचालन बंद करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, और डिजिटल मोबाइल दूरसंचार लाइसेंस को ट्रस्ट में रखा जा सकता है या ग्रामीण टेलीकॉम के नाम पर भी जारी किया जा सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व मोनवरुद्दीन आयोग के सदस्यों ने भी सुझाव दिया था, कि यह संगठनों को "लेयर" बनावने की योजना का एक हिस्सा था, ताकि धन का इस्तेमाल किस तरह से और कहां कहां किया जा रहा है, इसके बारे में किसी को साफ साफ जानकारी ही नहीं मिल सके।
जांच आयोग के अंतिम निष्कर्ष अगस्त 2011 में पेश किया था। नवंबर 2013 में, बांग्लादेश की संसद ने ग्रामीण बैंक अधिनियम, 2013 को पारित किया, जिसने माइक्रोक्रेडिट संगठन पर सरकार का नियंत्रण बढ़ाया, लेकिन इसके स्वामित्व में हिस्सेदारी नहीं बढ़ाई।
अधिनियम ने सरकार को बैंक के संचालन के लिए नियम बनाने की अनुमति दी, जिसमें 25% हिस्सा बरकरार रखा गया, जबकि शेष 75% उधारकर्ता-शेयरधारकों के पास था। इसने केंद्रीय बैंक की मंजूरी के साथ प्रबंध निदेशक की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया, एमडी के लिए 60 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित की, और दो चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्मों द्वारा सालाना ऑडिट को भी जरूरी कर दिया।
नए कानून ने पिछली टैक्स छूट को खत्म कर दिया और उन्हीं टैक्स छूट को लागू करने की इजाजत दी, जिसे सरकार तय करे। हालांकि, सूत्रों ने दावा किया कि ये बदलाव औपचारिक थे और बैंक के ऑपरेशन को प्रभावित नहीं करते थे और न ही इसके जरिए वो परिणाम ही हासिल किए जा सकते थे, जिसके लिए आयोग का गठन किया गया था।
यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख नियुक्त किए जाने और शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद अब साफ हो गया है, कि दशकों से चली आ रही इस लड़ाई में अंतिम विजय अमेरिकी विदेश विभाग की ही हुई है।












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