28 साल पहले जो बाइडेन ने भारत को 'महाशक्ति' बनने में डाला था अड़ंगा, चीन पर साध ली थी चुप्पी
वॉशिंगटन। अमेरिका में तीन नवंबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए मुकाबला कांटे को होता जा रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेट जो बाइडेन के बीच टक्कर है। विशेषज्ञों की मानें तो हो सकता है कि ऐन मौके पर नतीजे बदल जाएं। ऐसे में बाजी कौन जीतेगा कोई नहीं सकता। भारत और अमेरिका में बसे भारतीयों की नजरें नतीजों पर है। भारत और अमेरिका के बीच समीकरण साल 2000 से बदलने शुरू हुए हैं लेकिन पिछले 8-10 वर्षों में रिश्तों में एक नया मोड़ देखने को मिला है। जो बाइडेन उप-राष्ट्रपति रहे हैं और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ आठ साल तक काम करने का अच्छा-खासा अनुभव भी है। ऐसे में लोगों को उम्मीद है कि अगर वह जीते तो भारत के पक्ष में कुछ सकारात्मक फैसले ले सकते हैं। लेकिन सन् 1992 में एक ऐसी घटना हुई थी जिसकी वजह से बाइडेन आज तक विलेन बने हुए हैं।

भारत और रूस के बीच 250 मिलियन डॉलर की डील
साल 1992 का समय वह दौर था जब सोवियत संघ का पतन हो चुका था और रूस अपनी नई शुरुआत कर रहा था। रूस एक बड़े वित्तीय संकट से गुजर रहा था। अमेरिका की सत्ता रिपब्लिकन पार्टी के जॉर्ज बुश सीनियर के पास थी। भारत और रूस के बीच उसी साल क्रायोजेनिक इंजन की डील हुई थी। यह डील आज से 28 साल पहले 250 मिलियन डॉलर की रकम के साथ साइन हुई थी। इस डील के दौरान ही अमेरिका ने रूस को 24 बिलियन डॉलर के आर्थिक पैकेज देने का ऐलान किया था। बाइडेन उस समय एक सीनेटर थे। सीनेट की विदेशी संबंधों पर बनी कमेटी में 19-0 से वोटिंग हुई और इसमें कहा गया कि अगर रूस ने भारत के साथ डील को मंजूरी दी तो फिर अमेरिका से उसे आर्थिक मदद नहीं मिल सकेगी।

अमेरिकी मदद नहीं खोना चाहता था रूस
उस समय रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्त्सिन थे और उन्हें अमेरिकी दबाव के आगे झुकना पड़ गया था। जो बाइडेन ने उस समय सीनेट में कहा था, 'मुझे पूरी उम्मीद है कि रूस के नेताओं को थोड़ी अक्ल आएगी और वो आर्थिक मदद खोने के खतरे के बाद इस बिक्री को रोक देंगे।' बाइडेन ने उस समय यहां तक कह डाला था, 'यह कोई छोटी-मोटी डील नहीं है बल्कि बहुत खतरनाक डील है।' बाइडेन की तरफ से एक संशोधन पेश किया गया। इसके बाद अमेरिका की तरफ से आर्थिक मदद खोने के डर से रूस ने भारत के साथ यह डील उस समय कैंसिल कर दी। अमेरिका ने एक नया कानून बनाया जिसके तहत रूस अगर किसी भी देश को मिसाइल, परमाणु हथियार या फिर रासायनिक हथियारों की सप्लाई करेगा तो फिर उसे कोई मदद नहीं मिलेगी। यह वह दौर था जब भारत, पाकिस्तान की तरफ से समर्थन पा रहे आतंकवाद का शिकार होना शुरू हो चुका था।

चीन को मिल रही थी रूस से टेक्नोलॉजी
बाइडेन की वजह से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा था। कई वर्षों तक यह रूका रहा क्योंकि बाइडेन को लगता था कि अगर भारत और रूस के बीच यह डील हो गई थी तो खतरनाक हो सकता है। क्रायोजेनिक इंजन की वजह से भारत का अंतरिक्ष प्रोग्राम पीएसएलवी से जीएसएलवी तक आ पाया है। भारत ने खुद इसका हल तलाशा लेकिन इसमें खासी देर हो गई थी। रूस की तरफ बहुत कम मदद मिल सकी थी। मदद का लालच देकर अमेरिका ने रूस के सामने कोई और विकल्प नहीं छोड़ा था। डील साइन हो चुकी थी और बाद में इसे कैंसिल कर दिया गया। यह बात भी हैरान करने वाली है कि इसी समय चीन, रूस से टेक्नोलॉजी आयात कर रहा था। लेकिन बाइडेन ने उसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।

आखिरकार इसरो ने डेवलप की टेक्नोलॉजी
भारत को कई दशकों तक जिस तकनीक से दूर रखे जाने की कोशिशें की गई, उसी बेहद जटिल टेक्नोलॉजी में देश के वैज्ञानिकों ने महारत हासिल कर ली। साल 2015 में भारत क्रायोजेनिक इंजन का टेस्ट करने में सफलता मिली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी। दिसंबर 2015 में इस इंजन का टेस्ट हुआ और इसे देश का सबसे ताकतवर क्रायोजेनिक इंजन कहा गया। इंजन ने 800 सेकंड तक सफल परीक्षण को पास किया था। इसके बाद भारत ने 19 फरवरी 2016 को दूसरा क्रायोजेनिक इंजन भी तैयार कर डाला। इस इंजन को 640 सेकेंड तक टेस्ट किया गया था।












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