तिब्बत पर अमेरिका ने घेरा तो चीन को आई वाजपेयी के साथ हुए समझौते की याद
नई दिल्ली। China in Tibet: तिब्बत के मुद्दे पर अमेरिका के सक्रिय होने के बाद अब चीन को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ 2003 में हुए समझौते की याद आई है। चौतरफा घिरे ने चीन ने भारत को 2003 में हुए समझौते की याद दिलाई है जिसमें भारत ने स्वायत्तशासी तिब्बत को कम्युनिष्ट चीन का अंग स्वीकार किया था।

अमेरिकी कांग्रेस में पास हुआ है बिल
चीन के दूतावास ने एक बयान जारी कर हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस में पास किए गए तिब्बती नीति और समर्थन कानून (Tibetan Policy and Support Act) की निंदा की है। अमेरिकी कांग्रेस से इस से पास इस बिल पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर कर दिए हैं जिसके बाद अब यह कानून बन चुका है।
इस कानून में तिब्बती लोगों को अपना आध्यात्मिक लीडर (अगला दलाई लामा) चुनने के अधिकार का समर्थन किया गया है। इसके मुताबिक अगले दलाई लामा के पुनर्जन्म का निर्णय और चयन वर्तमान दलाई लामा, तिब्बती बौद्ध नेताओं और तिब्बती लोगों के ऊपर है।
अमेरिका का यह नया कानून तिब्बत की निर्वासित संसद (Tibetan Parliament-in-Exile) और तिब्बत की निर्वासित सरकार (Tibetan Government-in-Exile) को मान्यता देता है। यहां ये जानना जरूरी है कि तिब्बत की निर्वासित सरकार और तिब्बत की निर्वासित संसद जिसे आम तौर पर केंद्रीय तिब्बती प्रशासन कहा जाता है भारत से अपना काम करती है।

भारत की मीडिया को चीन ने फिर दी नसीहत
यही वजह है कि भारत स्थित चीन दूतावास ने इस पर बयान जारी किया है। दूतावास के प्रवक्ता जी रोंग ने कहा "पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना और भारत गणराज्य के बीच 2003 में संबंधों और व्यापक सहयोग के लिए घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें भारत यह स्वीकार करता है कि Xizang (तिब्बत) स्वायत्त क्षेत्र पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा है। तिब्बतियों को भारत में चीन के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं है।"
इस घोषणापत्र पर वाजपेयी की 22 से 27 जून 2003 की बीजिंग यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे जो उन्होंने अपने चीनी समकक्ष वेन जियाबाओ के बुलावे पर की थी।
चीनी दूतावास ने कहा कि भारत में मीडिया को चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से संबंधित मुद्दों पर एक उद्देश्यपूर्ण और निष्पक्ष रुख अपनाना चाहिए और Xizang (तिब्बत) से संबंधित मुद्दों की "अत्यधिक संवेदनशील" प्रकृति को समझना चाहिए। इसमें कहा गया कि मीडिया को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास को देखना चाहिए। उसे अपनी दृष्टि भारत-चीन के द्विपक्षीय रिश्तों को सुधारने की तरफ होनी चाहए न कि तिब्बत कार्ड को खेलते हुए इसे और भड़काने की कोशिश करनी चाहिए। चीन इससे पहले ताइवान के मुद्दे पर भी भारत की मीडिया को नसीहत दे चुका है।
तिब्बत एक्ट (TPSA) 2020 को कांग्रेस ने पिछले सप्ताह ही पास किया था जिसका तिब्बती समुदाय के लोगों ने बहुत उत्साह के साथ स्वागत किया था। खास तौर पर इसमें अमेरिका ने दलाई लामा के उत्तराधिकारी चुनने के लिए तिब्बती लोगों के अधिकार का समर्थन किया है। दलाई लामा का चयन तिब्बती लोगों के लिए बहुत ही भावनात्मक मुद्दा है।

चीन कर रहा भारत को साधने की कोशिश
वर्तमान 14वें दलाई लामा 1959 में चुपके से भागकर भारत पहुंचे थे और तब से भारत में ही रह रहे हैं। इसके पहले 1950-51 में चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। दलाई लामा तब से ही तिब्बत की स्वायत्तता के लिए चल रही लड़ाई के प्रतीक हैं। यही वजह है चीन उनसे चिढ़ा रहता है और किसी भी देश के उनके दौरे का विरोध करता है। चीन भारत में उन्हें आने-जाने पर भी आपत्ति जाहिर करता है। खास तौर पर अरुणाचल प्रदेश में जहां पर दलाई लामा के बहुत सारे अनुयायी रहते हैं। लेकिन 86 साल के हो चुके दलाई लामा के बाद इस आंदोलन के चेहरे को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
वहीं दिल्ली ने अभी तक अमेरिका कांग्रेस से पास कानून को लेकर अपनी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन चीन उसके पहले ही सक्रिय हो गया है। भारत को वाजपेयी-जियाबाओ के बीच हुए समझौते की याद दिलाना चीन की उसी कोशिश का हिस्सा है कि भारत इस मुद्दे पर अपना स्टैंड न बदले। ताकि पहले से ही परेशान चीन को और मुश्किल न हो।
वहीं बॉर्डर पर चीन के आक्रामक रुख के चलते भारत की नरेंद्र मोदी सरकार पर चीन को लेकर दबाव बढ़ रहा है कि भारत चीन को लेकर अपनी नीति का पुनरावलोकन करे और तिब्बत में हो रहे मानवाधिकार के उल्लंघन पर आवाज उठानी चाहिए।












Click it and Unblock the Notifications