हमास को आतंकी संगठन क्यों नहीं मानता संयुक्त राष्ट्र? UN की मदद का ऐसे उठाता है गलत फायदा
तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप अर्दोआन ने इजराइल पर हमला करने वाले फिलिस्तीनी संगठन हमास का बचाव करते हुए कहा था कि ये आतंकी संगठन नहीं है बल्कि एक आजादी की जंग लड़ने वाले मुजाहिदीन हैं।
तुर्की नेता के इस बयान पर यूरोपीय देशों के नेताओं ने आपत्ति जताई थी। इटली में उप प्रधान मंत्री, माटेओ साल्विनी ने भी एर्दोगन की टिप्पणियों को 'गंभीर और घृणित' बताया। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि तुर्की के नेता ने हमास को लेकर जो भी टिप्पणी की वह संयुक्त राष्ट्र के स्टैंड से कुछ भी अलग नहीं है।

इजराइल हमास और हिज्बुल्लाह को आतंकी संगठन मानता है। अमेरिका जिसका संयुक्त राष्ट्र पर सबसे अधिक प्रभाव है वह भी हमास और हेजबुल्ला को आतंकी संगठन मानते हैं। लेकिन तुर्की और बाकी देशों की तरह संयुक्त राष्ट्र भी हमास और हिज्बुल्लाह जैसे संगठनों को आतंकी संगठन नहीं मानता है।
यूरोपियन यूनियन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान, ब्रिटेन और पराग्वे भी हमास को आतंकी संगठन मानते हैं। इतना ही नहीं, अरब लीग, अर्जेंटिना, बहरीन, कोलंबिया, जर्मनी, होंडुरस, मलेशिया, सउदी अरब और यूएई भी हमास को आतंकी ही मानते हैं, लेकिन पूरी दुनिया में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से बना संगठन संयुक्त राष्ट्र हमास और हिज्बुल्लाह जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों को आतंकी संगठन नहीं मानता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र द्वारा हमास और हिज्बुल्लाह जैसे आतंकी गतिविधियां चलाने वाले संगठनों को आतंकी करार न दिए जाने की वजह से इन्हें इसका खूब फायदा मिलता है। जहां भी संयुक्त राष्ट्र की योजनाएं चलाई जाती हैं, इसका फायदा इन आतंकी संगठनों को मिलता है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रदान की गई वे संसाधन जिन्हें आम लोगों के इस्तेमाल के लिए भेजा जाता है, वे हमास तक पहुंच जाते हैं। इनसे वह हथियार खरीदकर अमेरिका के दोस्तों पर हमला करता है।
यूनाइटेड नेशंस की एक संस्था है UNRWA यानी कि यूनाइटेड नेशंस रिलीफ एंड वर्क्स एजेंसी फॉर पेलेस्टीन रिफ्यूजी इन द नियर ईस्ट। इस संस्था का मकसद फलस्तीनी शरणार्थियों की मदद करना है।
UNRWA को यूनाइटेड नेशंस के बजट से पैसे मिलते हैं। इस पैसे से ही ये एजेंसी फिलिस्तीन में शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत और तमाम दूसरे कार्यक्रम करती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2021 में ही इस संस्था को यूनाइडेट नेशंस के सदस्य देशों से करीब 15 मिलियन डॉलर की रकम मिली थी।
संयुक्त राष्ट्र को पैसे देने वालों में अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, जापान, ब्रिटेन, स्विटजरलैंड, नॉर्वे, कनाडा जैसे देश शामिल हैं। ये सभी देश पैसे देते हैं ताकि फिलिस्तीनी शरणार्थियों की मदद हो सके लेकिन इस पैसे का गलत इस्तेमाल हो रहा है।
ये पैसे गाजा पट्टी में राहत-बचाव के लिए पहुंचते हैं लेकिन चूंकि वहां पर हमास का कब्जा है, ऐसे में वह इन पैसों को अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अमेरिका या इजराइल जैसे देश इस बात से बिल्कुल अंजान हैं।
उन्हें ये बात भली-भांति पता है, तभी तो अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार और संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिकी राजदूत रहीं निक्की हेली भी बार बार संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील करती रहीं हैं कि हमास को आतंकी संगठन की लिस्ट में शामिल किया जाए।
भारत में भी इजराइल के राजदूत नाओर गिलोन ने कहा है कि अब समय आ गया है कि भारत फिलिस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास को आतंकवादी संगठन घोषित करे। बुधवार को मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत, इजराइल का करीबी दोस्त है और उसे दुनिया में अहम की आवाज के तौर पर जाना जाता है। भारत दशकों से आतंकवाद का भुक्तभोगी रहा है और इसके बारे में उसका अपना नज़रिया है।
राजदूत ने कहा कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश इस वक्त इजराइल के साथ हैं और मुझे लगता है, अब समय आ गया है कि भारत आधिकारिक तौर पर हमास को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दे। यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ये काम पहले ही कर चुके हैं।
नाओर गिलोन ने ये भी कहा कि उन्होंने हमास को आतंकवाद संगठन घोषित करने से संबंधित मुद्दे पर "भारत में संबंधित अधिकारियों" से बात की है।
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