China-Russia के वीटो पावर ने Iran के खिलाफ Trump के मनसूबों को कैसे किया फेल? न्यूयॉर्क से बड़ा अपडेट
UN Security Council Big Update Over US-Iran War: अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान की जंग 28 फरवरी 2026 से शुरू होकर अब 38वें दिन को पार कर चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को धमकी दे रहे हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य खोलो, वरना आज रात एक पूरी सभ्यता नष्ट हो जाएगी, जिसे फिर कभी जीवित नहीं किया जा सकेगा। ट्रंप का 48 घंटे का अल्टीमेटम रात 8 बजे (अमेरिकी समय, भारत में बुधवार सुबह) खत्म होने की कगार पर है। ईरान का जवाब भी साफ है कि ऐसा जवाब देंगे कि सदियों तक याद रहेगा।
इसी बीच न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने वैश्विक राजनय का मैदान संभाला। बहरीन द्वारा लाया गया प्रस्ताव 'होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाला' रूस और चीन के वीटो पावर की दीवार से टकराकर विफल हो गया। आइए विस्तार से समझते हैं कि UNSC क्या है, और कैसे चीन-रूस ने अपने वीटो से ट्रंप के अरमानों का गला घोंटा? भारत का रोल भी समझें...

UN Security Council (UNSC) पहले समझते हैं, आखिर है क्या?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग है। इसका मुख्य काम अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना है। अगर दुनिया में कहीं युद्ध, आतंकवाद या संकट हो तो UNSC ही फैसला करता है, जैसे प्रतिबंध लगाना, शांति सेना भेजना या सैन्य कार्रवाई की अनुमति देना। इसकी स्थापना 1945 में हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया यह अंग भविष्य में बड़े युद्ध रोकने के लिए था। इसका हेडक्वार्टर न्यूयॉर्क में United Nations Headquarters है।
कैसे करता है काम?
- 1. Resolution पास करना: सदस्य देश प्रस्ताव पास करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून जैसा प्रभाव रखते हैं।
- 2. Peacekeeping Operations: युद्ध क्षेत्रों में शांति सैनिक भेजना।
- 3. Sanctions : किसी देश पर आर्थिक या राजनयिक प्रतिबंध।
- 4. Military Action: जरूरत पड़े तो सैन्य कार्रवाई की मंजूरी।
सबसे खास बात: 5 स्थायी सदस्यों (P5) के पास वीटो पावर है। अगर इनमें से कोई एक 'ना' कह दे तो प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।
UNSC के 15 सदस्य कौन-कौन?
- 5 स्थायी (Permanent Members - P5): अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन (इन्हीं के पास वीटो)।
- 10 अस्थायी (Non-Permanent Members): हर 2 साल पर UN General Assembly चुने जाते हैं (2025-26 के उदाहरण: भारत, जापान, ब्राजील, UAE आदि)।
अब समझें प्रस्ताव क्या था? कैसे रूस-चीन ने ट्रंप को फेल किया?
बहरीन (अप्रैल 2026 में UNSC की प्रेसिडेंसी संभाल रहा था) ने गल्फ देशों UAE, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, जॉर्डन के साथ मिलकर प्रस्ताव लाया। शुरू में इसमें अनुच्छेद 7 (Chapter VII) शामिल था, जो UN चार्टर के तहत बल प्रयोग (Use of Force) की अनुमति देता। मतलब, होर्मुज को खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई की छूट।
रूस और चीन ने इसका घोर विरोध किया। उनका कहना था कि यह 'ईरान की निंदा' वाला और बहुत कठोर प्रस्ताव है। लंबी डिप्लोमेसी के बाद भाषा नरम की गई। अंतिम ड्राफ्ट में बल प्रयोग हटा दिया गया। अब इसमें कहा गया था कि होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग में वाणिज्यिक नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संबंधित देश रक्षात्मक तरीके से समन्वय करें। बहरीन की उम्मीद थी कि रूस-चीन अब कम से कम मतदान से दूर रहेंगे या प्रस्ताव पास होने देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
वोट का ब्रेकडाउन समझें: 11-2-2
परिषद के 15 सदस्यों में:
- पक्ष में 11 वोट: अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और ज्यादातर अस्थायी सदस्यों ने समर्थन किया।
- विरोध में 2 वीटो: रूस और चीन (दोनों स्थायी सदस्य)।
- 2 अनुपस्थित: पाकिस्तान और कोलंबिया।
न्यूनतम 9 वोट तो मिल गए, लेकिन वीटो की वजह से प्रस्ताव रद्द हो गया।
बहरीन और गल्फ देशों की निराशा
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल जयानी ने UNSC में गल्फ देशों की ओर से बयान पढ़ा। उन्होंने कहा कि हम खेद व्यक्त करते हैं कि प्रस्ताव अपनाया नहीं गया। परिषद एक अवैध आचरण के संबंध में अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही, जिसके लिए बिना देरी के निर्णायक कार्रवाई जरूरी थी। उन्होंने होर्मुज को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी देश द्वारा अवरुद्ध न किए जाने वाला मार्ग बताया। उनका कहना था कि यह प्रस्ताव स्थायी समाधान की दिशा में एक कदम होता, लेकिन UNSC अपनी भूमिका नहीं निभा पाई।
रूस-चीन का फुल सपोर्ट ईरान को: क्यों?
रूस और चीन ने साफ कहा कि प्रस्ताव ईरान के खिलाफ बहुत कठोर था।
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रूस: ईरान के साथ लंबे समय से सैन्य और ऊर्जा साझेदारी।
- चीन: ईरान से तेल आयात करता है और "एकतरफा" कार्रवाई का विरोधी।
दोनों ने वीटो से स्पष्ट संदेश दिया कि जरूरत पड़े तो ईरान का समर्थन करेंगे। इससे UNSC में गहरे मतभेद साफ हो गए।
भारत का रोल: बैलेंसिंग एक्ट और राष्ट्रीय हित
भारत UNSC का स्थायी सदस्य नहीं, लेकिन वैश्विक मुद्दों पर उसकी आवाज अहम है। इस प्रस्ताव में भारत ने सक्रिय रूप से बैलेंस्ड पोजीशन अपनाया। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। उसका 80% से ज्यादा कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। अगर यह रास्ता बंद रहा तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, महंगाई बढ़ सकती है और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
भारत ने हमेशा नौवहन की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की सुरक्षा का समर्थन किया है। लेकिन साथ ही वह ईरान के साथ पुराने संबंध भी नहीं तोड़ना चाहता। भारत ने प्रस्ताव पर समर्थन जताया (11 वोटों में शामिल), लेकिन सार्वजनिक रूप से शांतिपूर्ण समाधान और डायलॉग की अपील की।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत स्थिति पर नजर रखे हुए है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करता है। भारत का रोल 'निरीक्षक' से ज्यादा 'स्टेकहोल्डर' का रहा है। क्योंकि होर्मुज उसकी ऊर्जा सुरक्षा से सीधा जुड़ा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह घटना?
होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के 20-25% तेल गुजरता है। ईरान-US संघर्ष में इसे बंद करने से वैश्विक तेल कीमतें बढ़ गई हैं। UNSC का यह वीटो दिखाता है कि बड़े शक्तिशाली देश अभी भी ईरान को 'बैक' कर रहे हैं। बहुपक्षीय संस्थाएं (जैसे UN) बड़े संकट में अक्सर लाचार साबित होती हैं। गल्फ देश अब अमेरिका या नाटो जैसे गठबंधनों पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं। यह नई शीत युद्ध की झलक है। रूस-चीन ने अमेरिका की एकतरफा कार्रवाई को स्वीकार नहीं किया।
यह वीटो सिर्फ एक प्रस्ताव की असफलता नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की नई हकीकत है। ट्रंप के 'एक रात में सभ्यता खत्म' वाले मनसूबे UNSC में रूस-चीन के वीटो से फेल हो गए। बहरीन और गल्फ देशों की निराशा जायज है, लेकिन वास्तविकता यह है कि UNSC अभी भी 1945 की सोच पर चल रहा है। भारत के लिए यह चुनौती और अवसर दोनों है। चुनौती ऊर्जा सुरक्षा की और अवसर अपनी डिप्लोमेसी को मजबूत करके सभी पक्षों के बीच विश्वसनीय मध्यस्थ बनने का। अभी स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण है। होर्मुज खुलता है या नहीं, यह अगले कुछ दिनों में तय होगा।
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