धरती पर बढ़ेंगी विनाशकारी आपदाएं, UN की रिपोर्ट ने बताया हर साल 560 मुसीबतें झेलेगी दुनिया!
रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में मौसम संबंधी प्राकृतिक मुसीबतें तो होंगी ही, साथ ही महामारी और रासायनिक दुर्घटनाओं जैसी खतरनाक आपदाएं भी बढ़ेंगी।
नई दिल्ली, 26 अप्रैल: जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जिसकी वजह से ना केवल देशों की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं, बल्कि मानव जीवन पर भी संकट मंडरा रहा है। इस बीच जलवायु परिवर्तन को लेकर आई यूनाइटेड नेशंस की एक नई रिपोर्ट ने और भी ज्यादा खतरनाक तस्वीर पेश की है। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर संकेत दिए गए हैं कि आने वाले साल धरती के लिए कई तरह की नई आफत लेकर आ सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर मौजूदा हालात इसी तरह बने रहते हैं तो दुनिया 2030 तक हर साल करीब 560 विनाशकारी आपदाएं झेलने की ओर बढ़ रही है। 2015 में ऐसी आपदाओं की संख्या हर साल करीब 400 थी।

रासायनिक दुर्घटनाओं जैसी खतरनाक आपदाएं भी होंगी
यूनाइटेड नेशंस की इस रिपोर्ट में जो सबसे ज्यादा चिंता वाली बात बताई गई है, वो ये है कि आने वाले वर्षों में धरती पर जो आपदाएं बढ़ेंगी, उनमें जंगलों में आग और बाढ़ जैसी मौसम संबंधी प्राकृतिक मुसीबतें तो होंगी ही, साथ ही महामारी और रासायनिक दुर्घटनाओं जैसी खतरनाक आपदाएं भी शामिल होंगी। रिपोर्ट में कहा गया है, 'जलवायु परिवर्तन की वजह से जलवायु संबंधी खतरों की संख्या, उनकी आवृत्ति, समय और गंभीरता लगातार बढ़ रही है। जबकि, 1970 से लेकर साल 2000 तक दुनिया में हर साल आने वाली मध्यम और बड़े स्तर की आपदाओं की संख्या केवल 90 से 100 थी।'

तीन गुना ज्यादा गंभीर हो सकते हैं लू के हालात
रिपोर्ट में बताया गया है, 'साल 2030 में गंभीर हीटवेव की संख्या साल 2001 के मुकाबले तीन गुना ज्यादा हो सकती है। वहीं, सूखे के हालात में भी करीब 30 फीसदी का इजाफा देखने को मिल सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से साल 2030 तक केवल प्राकृतिक आपदाओं का ही प्रकोप देखने को नहीं मिलेगा, बल्कि कोरोनो वायरस महामारी, आर्थिक मंदी और खाद्य संकट जैसी बड़ी मुसीबतें भी दुनिया को घेरेंगी।'

दुनिया के मौसम चक्र में आए भयानक तौर पर बदलाव
यूनाइटेड नेशंस की ये रिपोर्ट कहती है, 'जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया के मौसम चक्र में भयानक तौर पर बदलाव आए हैं। मानव जाति ने ऐसे फैसले लिए हैं, जिनका मुख्य मकसद बहुत ही छोटा है, लेकिन भविष्य में आने वाली आपदाओं के खतरे के रूप में बहुत बड़ा है। ये ऐसी आपदाएं हैं, जिन्हें लेकर कोई तैयारी नहीं कई गई और इन्हें ऐसे ही छोड़ दिया गया है। इन प्राकृतिक आपदाओं की आशंका, जिन देशों में ज्यादा है, वहां बढ़ती आबादी की वजह से मानव जीवन पर पड़ने वाला इनका प्रभाव भी गंभीर हुआ है।'

'पहले से ही आपदाओं की भारी कीमत चुका रही है दुनिया'
यूएन के डिजास्टर रिस्क रिडक्शन विभाग की प्रमुख अधिकारी मैमी मिजोतुरी ने इस रिपोर्ट को लेकर कहा, 'अगर हम जलवायु परिवर्तन के मौजूदा हालात को लेकर कोई बड़ा कदम नहीं उठाते हैं तो उस स्थिति में पहुंच जाएंगे, जहां से किसी भी आपदा से होने वाली तबाही को संभालना बहुत ज्यादा मुश्किल होगा। लोग इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि दुनिया पहले से ही आपदाओं की भारी कीमत चुका रही है। वर्तमान में प्राकृतिक आपदाओं पर होने वाले खर्च का करीब 90 फीसदी हिस्सा आपातकाली राहत के तौर पर ही इस्तेमाल रहा है। जबकि, पुनर्निर्माण पर केवल 6 फीसदी और रोकथाम पर महज 4 प्रतिशत खर्च हो रहा है।'
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'संभावित खतरे पर ज्यादा गंभीरता से काम करना होगा'
मैमी मिजोतुरी ने आगे बताया, 'साल 1990 तक प्राकृतिक आपदाओं से दुनिया को हर साल करीब 70 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, लेकिन अब ये नुकसान बढ़कर 170 बिलियन डॉलस से भी ज्यादा तक पहुंच चुका है।' वहीं, संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में इस रिपोर्ट को पेश करने वालीं यूएन की डिप्टी सेक्रेटरी-जनरल अमीना जे मोहम्मद ने आगाह करते हुए कहा, 'अपनी विकास योजनाओं में हमें इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि हम कैसे रहते हैं, कैसे निर्माण करते हैं और कैसे निवेश करते हैं...आपदाओं के संभावित खतरे पर ज्यादा गंभीरता से काम करना होगा।'












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