तीन हजार एटम बम वाले यूक्रेन को तीन दगाबाज देशों ने बना दिया ‘बेचारा’
नई दिल्ली, 26 फरवरी। धोखेबाज हैं अमेरिका, ब्रिटेन और रूस। वर्ना आज यूक्रेन में इतनी तबाही न होती। यूक्रेन के पास 1991 में 3 हजार एटम बम थे। वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति था। लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन और रूस ने यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी के नाम पर उसके परमाणु हथियार नष्ट करा दिये थे।

आज अगर यूक्रेन के पास एटम बम रहते तो रूस आक्रमण करने की हिम्मत न करता। आज के दौर में परमाणु हथियार इस्तेमाल के लिए नहीं बल्कि शक्ति संतुलन के लिए होते हैं। यूक्रेन कोई छोटा देश नहीं है। वह यूरोप का दूसरे सबसे बड़ा देश है।

3 हजार एटम बम थे यूक्रेन के पास
यूक्रेन के परमाणु हथियार नष्ट करने के लिए बुडापेस्ट मेमोरेंडम के नाम से एक अंतराष्ट्रीय संधि हुई थी। इस संधि में रूस, अमेरिका और बिटेन ने लिखित आश्वासन दिया था कि वे यूक्रेन की सम्प्रभुता का सम्मान करेंगे। यूक्रेन की राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ कभी बल प्रयोग नहीं किया जाएगा। इन तीन देशों के फरेबी समझौते में यूक्रेन फंस गया। आज जब रूस, यूक्रेन में बमबारी और जनसंहार कर रहा है तो कोई साथ नहीं दे रहा। रूस के हमले में यूक्रेन की राजधानी कीव मलबे में तब्दील हो रही और अमेरिका-ब्रिटेन केवल गीदड़भभकी दे रहे हैं। यूक्रेन के रक्षा मंत्री एनरी जाहोरोदेनुअक ने कहा भी है, आज बहुत अफसोस हो रहा है कि हमने परमाणु हथियार नष्ट कर दिये। सुरक्षा की गारंटी देने वाले देश आज कहां हैं ? ये सही है कि यूक्रेन के एटम बम तत्कालीन सोवियंत संघ के थे क्योंकि वह उसका गणराज्य था। लेकिन सोवियंत संघ के पतन के बाद 1991 में जब यूक्रेन स्वतंत्र देश बना तो ये परमाणु हथियार उसके अधीन आ गये थे। यूक्रेन तीसरी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति वाला देश बन गया था। इस बात से रूस के साथ साथ अमेरिका और ब्रिटेन भी चिंतित हो गये। ब्रिटेन को ईर्ष्या होने लगी कि यूक्रेन के पास उससे अधिक परमाणु हथियार हैं। अमेरिका भी चाहता था कि यूक्रेन परमाणु शक्ति वाला देश न रहे। रूस भी इसी फिराक में था। आज जब यूक्रेन संकट में है तो उसे बचाने वाला कोई नहीं ?

रूस की तानाशाही
रूस शुरू से यूक्रेन पर अत्याचार करता रहा है। स्टालिन के जमाने से। 2014 में रूस ने यूक्रेन के गणराज्य क्रीमिया पर हमला कर उस पर कब्जा जमा लिया था। अमेरिका और ब्रिटेन तब भी यूक्रेन की रक्षा के लिए खड़ा नहीं हुए थे। आज भी वे सिर्फ बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं, रूस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। लेकिन बातों से क्या होता है ? ऐसे प्रतिबंधों की रूस ने कभी परवाह नहीं की। यूक्रेन के मौजूदा संकट के कई कारण हैं। लेकिन सबसे बड़ी वजह है यूक्रेन का नाटो संगठन में शामिल होने का फैसला। पुतिन कभी नहीं चाहते कि उनकी सीमा पर पश्चिमी शक्तियां इकट्ठा हो जाएं। जिस नाटो को यूक्रेन मददगार समझ रहा था वह भी अभी सोच विचार में फंसा है। वह अभी तक केवल हथियार देने ही बात कर रहा है।

यूक्रेन की जांबाजी, अमेरिका की बुजदिली
शनिवार को रूसी आक्रमण के तीन दिन हो गये। यूक्रेन में इस समय राष्ट्रवाद की भावन चरम पर है। आम लोग भी अपने देश को बचाने के लिए हथियारों के साथ सड़कों पर निकल गये हैं। यूक्रेन के देशवासी अपने राष्ट्रपति जेलेंस्की के फैसले से बहुत खुश हैं। अमेरिका ने जेलेंस्की को प्रस्ताव दिया था कि अगर वह देश छोड़ना चाहें तो उनकी मदद की जा सकती है। लेकिन उन्होंने अमेरिका को झाड़ पिला दी कि अगर मदद करना चाहते हैं तो हमें हथियार, बम और मिसाइल भेजिए। मैं कीव में आखिसी सांस तक जमा रहूंगा। यूक्रेन के लोग अपने राष्ट्रपति की इस बहादुरी पर गर्व कर रहे हैं। अमेरिका की बुजदिली वाले प्रस्ताव के खिलाफ उनमें बहुत गुस्सा है। अपने देश के सम्मान को बचाने के लिए आम नागरिक गलियों में छिप कर रुसी सैनिकों पर गोलीबारी कर हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंस्की ने आखिरी दम तक लड़ने का एलान किया है। यूक्रेन की सेना उस तस्वीर को सोशल मीडिया पर डाल कर आम लोगों का हौसला बढ़ा रही है जिसमें 3500 रूसी सैनिकों को मृत दिखाया गया है।

अगर यूक्रेन हारा तो यूरोप भी संकट में फंसेगा
यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की सैनिकों के साथ एक बंकर में जमे हुए हैं। रूस का दावा है कि उसने यूक्रेन के 211 सैनिक पोस्ट और 17 कमांड सेंटर नष्ट कर दिये हैं। 198 यूक्रेनी सैनिक भी मारे गये हैं। दूसरी तरफ यूक्रेन का दावा है कि उसने रूस के 3500 सैनिक मार गिराये हैं। रूस के 102 टैंक और 15 तोप भी नष्ट किये गये हैं। ऐसा नहीं है कि खतरा केवल यूक्रेन के लिए है। अगर रूस, यूक्रेन पर कब्जा करता है तो पूरा यूरोप संकट में फंस जाएगा। पुतिन ने नाटो के मुद्दे पर फिनलैंड और स्वीडन को भी अंजाम भुगतने की धमकी दी है। पुतिन अभी तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने परमाणु हथियार इस्तेमाल करने की भी धमकी दी है। अगर तत्काल युद्धविराम नहीं हुआ तो इसका नतीजा बहुत भयंकर होने वाला है।
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