भारत से पंगा लेना ब्रिटेन को पड़ेगा महंगा, खालिस्तानियों पर नहीं की कार्रवाई तो मोदी सरकार सिखाएगी सबक!
भारत ने बार बार खालिस्तानियों को लेकर ब्रिटेन को अलर्ट भेजा है, लेकिन अब वक्त ब्रिटेन की व्यवस्था को सबक सिखाने का आ गया है। भारत से पंगा लेकर ब्रिटेन अपनी अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाएगा।

UK indian high commission: रविवार को खालिस्तानी अलगाववादियों ने लंदन स्थिति भारतीय उच्चायोग पर खालिस्तानी झंडा लगाने की कोशिश की और पूरी तरह से साफ हो गया, कि ब्रिटिश सरकार लंदन में इंडियन कमीशन की सुरक्षा करने में नाकाम रही है। यानि, ब्रिटिश सरकार की उदासीनता उस वक्त भारत और यूके के बीच तनाव के बीज हो सकता है, जब खुद ब्रिटेन आर्थिक सुस्ती से जूझ रहा है और अब लंदन को मोदी सरकार की 'गर्मी' बर्दाश्त करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। हाई कमीशन पर खालिस्तानी झंडा लगाने की कोशिश करने वालों को मोदी सरकार कभी माफ नहीं करेगी, ये तो तय है, लेकिन ब्रिटिश सरकार को अब इसका अंजाम भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
खालिस्तानियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं?
मोदी सरकार चाहती है कि ब्रिटिश सरकार अपराधियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई करे, लिहाजा रिटेन में भारतीयों की सुरक्षा चिंताओं के प्रति यूके सरकार को उत्तरदायी और जवाबदेह बनाने के लिए सरकार के उच्चतम स्तरों पर गंभीर चर्चा चल रही है। रविवार को खालिस्तान का झंडा लगाने वाले शख्स की पहचान ब्रिटेन की नागरिकता की कोशिश करने वाले अवतार सिंह खांडा के तौर पर की गई है, जिसके पिता कुलवंत सिंह खुकराना खालिस्तान लिबरेशन फोर्स का आतंकवादी था और गुरमीत सिंह बुकानवाला के माध्यम से धन की आपूर्ति कर रहा था। यह अवतार सिंह खांडा ही था, जिसने ब्रिटेन में कट्टरपंथी सिख छात्रों को रविवार के विरोध प्रदर्शन के लिए संगठित किया था। लिहाजा, अवतार सिंह खांडा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है। लेकिन, असल सवाल ये हैं, कि क्या यूके की सरकार ऐसे तत्वों पर कार्रवाई करेगी, क्योंकि इतिहास तो कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

खालिस्तानियों को शह देता ब्रिटिश व्यवस्था!
साल 2019 में मोदी सरकार के खिलाफ भारत में सीएए आंदोलन चलाया गया और उस वक्त भी लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर प्रदर्शन किया गया, लेकिन उस वक्त से ही ब्रिटिश व्यवस्था खालिस्तानी अलगावलवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर उदासीन रही है, जबकि भारत सरकार की तरफ से बार बार यूके सरकार को खालिस्तानियों को लेकर अलर्ट भेजा गया है, लेकिन ब्रिटेन सरकार ने शायद ही कोई ठोस प्रतिक्रिया दी है। लिहाजा, ब्रिटेन में रहने वाले खालिस्तानियों का मनोबल बढ़ा है। वहीं, ब्रिटिश व्यवस्था ने मोदी सरकार, खासकर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अविश्वास बढ़ाने के लिए ही काम किया है, जिसमें बीबीसी का वो डॉक्यूमेंट्री शामिल है, जिसमें पीएम मोदी की गलत छवि पेश की गई है, जबकि भारतीय सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री मोदी की गुजरात दंगों में किसी भी तरह की संलिप्तता को लेकर क्लीनचिट दे चुका है।
भारत सरकार का धैर्य दे रहा है जवाब
मोदी सरकार फिलहाल लंदन की घटना को लेकर शांत दिख रही है, लेकिन ये तूफान से पहले की खामोशी हो सकती है। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ से काफी कड़ी प्रतिक्रिया दी गई है और ब्रिटेन के अंदर भी कई ब्रिटिश सांसदों ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कल देर शाम ब्रिटिश दूत को अपने दफ्तर में तलब किया और ब्रिटिश राजनयिक को दंगा अधिनियम पढ़कर सुनाया। मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी बात यह है, कि ब्रिटेन में स्थित अल्पसंख्यक सिख चरमपंथियों से खतरे के बावजूद भारतीय दूतावास और उसके कर्मचारियों की सुरक्षा में कमी है। मोदी सरकार यह भी देख रही है, कि ऋषि सुनक सरकार 22 मार्च को यूके में एक प्रतिबंधित "सिख फॉर जस्टिस" के एक कार्यक्रम को लेकर क्या एक्शन लेती है। ब्रिटेन में अभी तक वांटेड चरमपंथी गुरपतवंत सिंह पन्नू के नेतृत्व वाले उसके संगठन एसएफजे को फलने-फूलने दिया गया है। जबकि, भारतीय खुफिया तंत्र ने लगातार ब्रिटेन को इस बात के सबूत सौंपे हैं, कि ब्रिटेन के गुरुद्वारे भारत विरोधी काम करने के लिए धन इकट्ठा करने का काम करते हैं, बावजूद इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है।

मोदी सरकार ने दिया था अलर्ट
ब्रिटेन की सरकार पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि सिख चरमपंथियों के इस हरक को लेकर मोदी सरकार ने ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी MI-5 को पहले ही अलर्ट कर दिया था। लिहाजा, ऐसा लगता है, कि ब्रिटिश व्यवस्था, न कि वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व, सिख अलगाववादी समूहों के प्रति सहानुभूति रखती है और भारतीय सुरक्षा हितों के प्रति पूरी तरह से उदासीन है। जबकि भारत में ब्रिटिश उच्चायोग और उसके राजनयिकों को मोदी सरकार पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान की जाती है, लेकिन यूके सरकार ऐसा करने में नाकाम रही है। लेकिन, अब पानी सिर के ऊपर निकल चुका है और भारतीय उच्चायोग पर खालिस्तानियों के हमले के बाद अब ब्रिटेन को मोदी सरकार के गुस्से को भुगतना पड़ सकता है। ब्रिटिश सरकार जल्द ही महसूस करेगी, कि भारत का मतलब व्यापार है, और वह अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए सब कुछ करेगी। भारत और ब्रिटेन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर बातचीत चल रही है, जिसपर इस घटना का असर पड़ सकता है, जबकि ब्रिटिश व्यापारिक एक्सपर्ट लगातार कह रहे हैं, कि भारत से व्यापारिक रिश्ते को मजबूत करना, ब्रिटेन के लिहाज से काफी जरूरी है।

ब्रिटेन के लिए भारत क्यों है जरूरी?
यूक्रेन संकट की वजह से उत्पन्न ऊर्जा संकट ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित किया है, जिससे ब्रिटेन के घरेलू उपभोक्ता के सामने जीवन-यापन का संकट तक पैदा हो गया। इसके साथ ही कोविड संकट और ब्रेक्सिट ने ब्रिटेन की समस्याओं में इजाफा ही किया, जब साल 2016 में यूरोपीय संघ से ब्रिटेन बाहर आ गया था (जिसे ब्रेक्सिट कहा जाता है), लिहाजा अब ब्रिटेन को एक ऐसे बाजार की तलाश है, जहां वो एक्सपोर्ट बढ़ा सके और जिसके लिए अपने दरवाजे खोल सके। इकोनॉमिक एक्सपर्ट के मुताबिक, आर्थिक संकट में फंसने के बाद सामान्य ब्रिटिश परिवारों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च करने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जो किसी भी समृद्ध अर्थव्यवस्था का निर्माण करते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, ब्रिटिश सरकार के लिए जरूरी है, कि वो एक ऐसी योजना के साथ आगे बढ़े, जिससे देश की अर्थव्यवस्था में स्थिरता आए।
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भारत के साथ FTA अहम क्यों?
ब्रिटेन की व्यापार विशेषज्ञ डॉ अन्ना वैलेरो ने कहा कि, वो भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को पॉजिटिव मानती हैं, जिसको लेकर बातचीत फिर तेज हो गई है। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत,इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है जो इस तरह के एक फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट के आकर्षण को जोड़ता है। उन्होंने कहा कि, "भारत के साथ एफटीए से ब्रिटेन के निर्यात में तेजी से इजाफा होगा, जिससे यूके व्यापार की स्थिति मजबूत कर पाएगा। इसके साथ ही व्यापार मार्गों में विविधता आएगी, जिससे सप्लाई चेन और ज्यादा लचीला बनेगा, लिहाजा देश के पॉलिटिकल सिस्टम के लिए चीजें कम असुरक्षित होंगी। उनका मानना है, कि देश के मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को पुनर्जीवित करने की जरूरत है और भारत के साथ ट्रेड डील इसके लिए काफी अहम होगा। लेकिन, खालिस्तानियों को लेकर उदासीनता ऋषि सुनक सरकार पर भारी पड़ सकती है, क्योंकि मोदी सरकार इस मुद्दे पर शांत नहीं बैठने वाली है।












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