पाकिस्तान का दोस्त तेजी से बना रहा 5th जेनरेशन विमान, भारत में कब तक चलेगा डिजाइन पर काम? क्यों पिछड़ रहे हम?
Turkey's 5th-Gen KAAN Fighter Program: पाकिस्तान के दोस्त तुर्की के पांचवीं पीढ़ी के विमान, "KAAN" ने फरवरी 2024 में अपनी पहली उड़ान भरी थी और अब इस फाइटर जेट के निर्माण के लिए तुर्की में प्रोडक्शन काफी तेज रफ्तार से हो रहा है।
साल 2010 में तुर्की के डिफेंस इंडस्ट्री एग्जक्यूटिव कमिटी (SSIK) ने तय किया था, कि उसे स्वदेशी फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट का डिजाइन, निर्माण, मैन्युफैक्चर करना है, ताकि वो अपने बेड़े से अमेरिकी F-16 फाइटर जेट को हटा सके और अब तुर्की अपनी मंजिल पर पहुंच चुका है।

कैसे शानदार प्रदर्शन कर रहा है तुर्की?
KAAN फाइटर जेट के निर्माण को तुर्की के लिए शानदार उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि टर्किश एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (TAI) की स्थापना 50 साल पहले 1973 में हुई थी और अब उसने फिफ्थ जेनरेशन फाइटर जेट का निर्माम कर लिया है।
तुर्की के Anka-3 स्टील्थ मानव रहित लड़ाकू हवाई वाहन (UCAV) के प्रोटोटाइप ने 28 दिसंबर 2023 को अपनी पहली उड़ान भरी। इससे पहले, TAI ने लाइसेंस के तहत बड़ी संख्या में जनरल डायनेमिक्स F-16 फाइटिंग फाल्कन जेट, CN-235 हल्का परिवहन/समुद्री गश्ती/निगरानी विमान और CASA/IPTN का उत्पादन किया था।
TAI को यूएवी को अलग अलग तरह के ड्रोन हथियार बनाने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा, तुर्की की एक निजी कंपनी भी दूर से नियंत्रित बायरकटार टीबी2 मध्यम-ऊंचाई वाले मानव रहित लड़ाकू हवाई वाहन (UCAV) का निर्माण करती है, जिसका सीरिया, लीबिया, अजरबैजान और यूक्रेन में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया है।
कैसा है तुर्की का रक्षा और एयरोस्पेस इंडस्ट्री?
तुर्की की पहली एयरक्राफ्ट फैक्ट्री, जिसका नाम टर्किश एयरक्राफ्ट और इंजन लिमिटेड है, उसकी स्थापना 1925 में की गई थी और TAI की स्थापना 1973 में अंकारा में हुई थी, और यह विमान, हेलीकॉप्टर, उपग्रह और यूएवी बनाती है।
इसमें 54.49% की मुख्य हिस्सेदारी तुर्की सशस्त्र बल फाउंडेशन के पास है, जबकि 45.45% रक्षा उद्योगों के अवर सचिवालय के पास है। इसमें लगभग 17,000 कर्मचारी काम करते हैं। ऐसा अनुमान है, कि इस साल अंत तक तुर्की की डिफेंस इंडस्ट्री का आकार 15.27 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।
इसके अलावा, एक और दिलचस्प बात ये है, कि स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानि SIPRI की 100 हथियार कंपनियों की लिस्ट में तुर्की की चार कंपनियां एसेलसन (60वें), बायकर (76वें), तुर्की एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (82वें), और रोकेटसन (100वें) को स्थान दिया गया है।
भारतीय एयरोस्पेस इंडस्ट्री कैसा है?
भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की स्थापना दिसंबर 1940 में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट के रूप में की गई थी और इसे इसका वर्तमान नाम 1964 में मिला। फिलहाल इसके पास 71.65% सरकारी स्वामित्व, 24,500 कर्मचारी, 2023 में 3.6 अरब डॉलर का राजस्व है और यह SIPRI की लिस्ट में 41वां नंबर पर आया है।
SIPRI की सौ हथियार कंपनियों की लिस्ट में दूसरी भारतीय एयरोस्पेस कंपनियों में बीईएल (63वां) है। जबकि, मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (89वें) पर हैं। दिलचस्प बात यह है, कि भारत की जीडीपी तुर्की से तीन गुना ज्यादा है, और वैश्विक सैन्य शक्ति के मुकाबले में जहां भारत चौथे नंबर पर है, वहीं तुर्की आठवें और इसकी सैन्य शक्ति वैश्विक स्तर पर तुर्की के 8वें स्थान की तुलना में चौथे स्थान पर है।

तुर्की का Kaan 5th जेनरेशन फाइटर जेट कैसा है?
तुर्की के KAAN 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ ट्विन-इंजन मल्टीरोल/एयर सुपीरियरिटी फाइटर ने 21 फरवरी 2024 को अपनी पहली उड़ान भरी थी और पूरी संभावना है, कि साल 2030 तक ये फाइटर जेट तुर्की की वायुसेना में शामिल हो जाएगा।
तुर्की ने अपनी इस 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट को बेचने की भी योजना बनाई है और पाकिस्तान ने इसको लेकर दिलचस्पी भी दिखाई है। 2011 में, तुर्की सरकार ने इस प्रोजेक्ट पर विचार के लिए 20 मिलियन डॉलर का फंड जारी किया था, जिसके बाद 2015 तक TAI ने तीन संभावित एयरफ्रेम कॉन्फ़िगरेशन जारी किए।
इन संभावित कॉन्फ़िगरेशन का नाम FX-1, FX-5 और FX-16 था।
FX-1 डबल इंजन वाले लॉकहीड मार्टिन F-22 के समान था। एफएक्स-5 कुछ हद तक एफ-16 कॉन्फ़िगरेशन जैसा था, जबकि एफएक्स-6 सिंगल-इंजन कैनार्ड-डेल्टा साब जेएएस 39 ग्रिपेन जैसा था। जिसके बाद 2015 में ट्विन-इंजन कॉन्फ़िगरेशन का फैसला लिया गया। दिसंबर 2015 में, तुर्की ने घोषणा की, उसने फाइटर जेट के डिजाइन में मदद के लिए यूनाइटेड किंगडम के बीएई सिस्टम्स को चुना है।
फिर इसके डिजाइन और डेवलपमेंट के लिए अगस्त 2016 में दस्तखत किए गये और टीएआई ने इसके लिए 1.18 अरब डॉलर का भुगतान तुर्की ने किया। इसके साथ ही, विमान के इंजन के लिए जनरल इलेक्ट्रिक, यूरोजेट और स्नेकमा को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया गया था, इस शर्त के साथ कि इंजन का बुनियादी ढांचा तुर्की में विकसित किया जाए और उत्पादन भी घरेलू रखा जाएगा
साल 2022 में जनरल इलेक्ट्रिक ने तुर्की को फाइटर जेट के इंजनों की डिलीवरी शुरू कर दी।
तुर्की का प्लान है, कि उसके पहले फाइटर जेट, जिसे अभी Block-0 कहा जा रहा है, उसका प्रोडक्शन 2025 में शुरू हो जाए और 2026 में वो ट्रायल शुरू कर दे। इसके अलावा, तुर्की की ब्लॉक-1 कॉन्फ़िगरेशन को 2029 तक विकसित करने की योजना है। और अगला लक्ष्य 2028 में तुर्की वायु सेना को बीस ब्लॉक-1 विमान देने का है, फिर 2029 तक हर महीने दो विमानों की डिलीवरी का लक्ष्य रखा गया है।
ऐसी संभावना है, कि इस फाइटर जेट की कीमत करीब 100 मिलियन डॉलर तक हो सकती है।
तुर्की से भारत को सीखने की जरूरत?
जियो-पॉलिटिक्स में तुर्की काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है और यह यूरोप और पश्चिम एशिया, दोनों का हिस्सा है। तुर्की नाटो का सदस्य है लेकिन रूस के साथ भी सौहार्दपूर्ण संबंध रखता है।
इसका अपने पड़ोसियों, ग्रीस और सीरिया के साथ टकराव है और यह रूसी मिसाइल प्रणालियों के साथ साथ यूरोपीय फाइटर जेट की टेक्नोलॉजी भी हासिल करता रहा है। नाटो में होने से इसको जबरदस्त फायदा हुआ है और इसे फाइटर जेट्स की टेक्नोलॉजी मिली है।
लेकिन, अमेरिका ने तुर्की को को एफ-35 फाइटर जेट्स की बिक्री इस बहाने से रोक दी, कि उसने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदे और अमेरिका के इस फैसले ने तुर्की को हिला कर रख दिया। क्योंकि, तुर्की अपने आपको सबसे शक्तिशाली इस्लामिक राष्ट्र के तौर पर दिखाना चाहता है। और इसलीए तुर्की ने अपने हथियारों के प्रोडक्शन को काफी तेजी से बढ़ाया है।
लिहाजा भारत को मानवरहित प्लेटफार्मों में तुर्की की सफलताओं से सीखना होगा। हेलीकॉप्टर और परिवहन विमान में भी वे हमसे काफी आगे हैं। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू कार्यक्रम में तुर्की स्पष्ट रूप से बहुत आगे है।
भारत के AMCA को अभी भी रक्षा विभाग से मंजूरी मिलना बाकी है, भले ही क्रिटिकल डिज़ाइन रिव्यू (सीडीआर) पूरा हो चुका हो। AMCA की चुनौतियां तुर्की के ही KAAN के समान होंगी, जिनमें स्टील्थ और एयरो-इंजन शामिल हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारी-भरकम लागत की वजह से अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।
फिलहाल ऐसा लग रहा है, कि तुर्की अपने हथियार इंडस्ट्री को काफी तेजी से आगे बढ़ा रहा है, जबकि भारत को अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था का लाभ हासिल है। हालांकि, भारत के डीआरडीओ और एचएएल में नौकरशाही थोड़ी ज्यादा है, बावजूद वे काफी बड़े बन चुके हैं।
भारत राडार और मिसाइलों में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। भारत को AMCA पर आगे छलांग लगाने की जरूरत है। भारत को शायद विदेशी सहायता लेने के लिए और ज्यादा खुलना होगा। हमें टास्क-फोर्स दृष्टिकोण का उपयोग करके एयरो-इंजन परियोजना के साथ एएमसीए परियोजना को चलाने की जरूरत है। हमें इस परियोजना का नेतृत्व करने के लिए "मेट्रोमैन" श्रीधरन के समान ही नेतृत्व की जरूरत है या फिर इन दोनों विभागों को सीधे पीएमओ के अधीन लाना होगा, ताकि काम में रफ्तार शामिल हो।














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