Trump Peace Board: ट्रंप के Gaza पीस बोर्ड में कौन इन और कौन आउट? PM मोदी ने क्या फैसला लिया?- Video
Trump Peace Board: Davos Summit 2026 के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया भर में चल रहे संघर्षों को खत्म करने के मकसद से एक नई पहल शुरू की है, जिसका नाम है 'पीस बोर्ड' (Peace Board)। इसके लिए ट्रंप ने दर्जनों देशों के नेताओं को न्योता भेजा है। हालांकि, कई कूटनीतिज्ञों और देशों को डर है कि यह पहल कहीं संयुक्त राष्ट्र (UN) की भूमिका को कमजोर न कर दे। हालांकि इस बार इस बार कई बड़े देश ट्रंप के बर्ताव से उखड़े हुए हैं। इसलिए दुनिया के कई प्रभावशाली देशों के मुख्य चेहरों ने इस समिट से दूरी बनाए रखी। इस बार की दावोस समिट में भारत समेत रूस, चीन, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने इससे दूरी बनाए रखी।
यूरोपीय देश अलर्ट पर, विवादित देशों ने कहा हां
जहां अमेरिका के कुछ पुराने सहयोगी देश इस प्रस्ताव को लेकर सावधानी बरत रहे हैं, वहीं बेलारूस जैसे देश, जिनके अमेरिका से रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं, उन्होंने इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर लिया है। इसी वजह से यह पहल शुरू होते ही विवादों में घिर गई है।

गाजा युद्ध से निकली 'पीस बोर्ड' की सोच
डोनाल्ड ट्रंप ने सबसे पहले पिछले सितंबर में गाजा युद्ध खत्म करने की योजना के तहत 'पीस बोर्ड' का प्रस्ताव रखा था। बाद में इस योजना को सिर्फ गाजा तक सीमित न रखकर पूरी दुनिया के संघर्षों तक बढ़ा दिया गया।
ट्रंप होंगे पहले अध्यक्ष, चार्टर में क्या?
रॉयटर्स द्वारा देखे गए मसौदा चार्टर के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप खुद इस पीस बोर्ड के पहले अध्यक्ष होंगे। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य विश्व शांति को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का समाधान निकालना बताया गया है।
3 साल का कार्यकाल और 1 अरब डॉलर की शर्त
चार्टर के अनुसार, किसी भी सदस्य देश का कार्यकाल तीन साल का होगा। लेकिन अगर कोई देश 1 अरब डॉलर (लगभग 9.1 हजार करोड़ भारतीय रुपए) का भुगतान करता है, तो वह बोर्ड की स्थायी सदस्यता हासिल कर सकता है। इस शर्त को लेकर भी कई देशों में सवाल उठ रहे हैं।
व्हाइट हाउस ने किन बड़े नामों को किया शामिल
व्हाइट हाउस ने इस पहल के लिए कई बड़े और प्रभावशाली नामों को चुना है। इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर को संस्थापक कार्यकारी बोर्ड सदस्य बनाया गया है।
50 न्योते, 35 देशों की सहमति
एक वरिष्ठ व्हाइट हाउस अधिकारी के मुताबिक, कुल 50 देशों को न्योता भेजा गया, जिनमें से लगभग 35 देशों के नेताओं ने बोर्ड में शामिल होने पर सहमति दे दी है।
मिडिल ईस्ट के बड़े सहयोगी भी बोर्ड में शामिल
इस पहल में इज़राइल, सऊदी अरब, UAE, बहरीन, जॉर्डन, कतर और मिस्र जैसे अमेरिका के प्रमुख मिडिल ईस्ट सहयोगी देश शामिल हैं। यह दिखाता है कि ट्रंप की योजना को इस क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिल रहा है।
नाटो देश भी आए साथ, तुर्की और हंगरी ने कहा हां
नाटो के सदस्य तुर्की और हंगरी ने भी इस बोर्ड में शामिल होने पर सहमति दी है। इन दोनों देशों के राष्ट्रवादी नेताओं के ट्रंप से अच्छे व्यक्तिगत रिश्ते माने जाते हैं।
एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी समर्थन
मोरक्को, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, पैराग्वे और वियतनाम जैसे देशों ने भी न्योता स्वीकार किया है। इसके अलावा, आर्मेनिया और अजरबैजान, जिन्होंने पिछले अगस्त अमेरिका की मध्यस्थता से शांति समझौता किया था, वे भी इस बोर्ड का हिस्सा बनेंगे।
बेलारूस की एंट्री ने बढ़ाया विवाद
सबसे ज्यादा विवाद तब हुआ जब बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको ने ट्रंप का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। लुकाशेंको को उनके खराब मानवाधिकार रिकॉर्ड और यूक्रेन युद्ध में रूस का समर्थन करने के कारण पश्चिमी देशों ने लंबे समय तक अलग-थलग रखा था।
वॉशिंगटन और मिंस्क के रिश्तों में नरमी का संकेत
बेलारूस की स्वीकृति ऐसे समय आई है जब अमेरिका और बेलारूस के रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है। इसे दोनों देशों के बीच मेल-मिलाप की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
रूस और चीन की चुप्पी ने बढ़ाई बेचैनी
अब तक रूस और चीन ने इस बोर्ड में शामिल होने को लेकर कोई साफ प्रतिक्रिया नहीं दी है। दोनों ही देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और उन्हें डर है कि ऐसी किसी पहल से उनकी वैश्विक ताकत कमजोर हो सकती है।
रूस पर आरोप और चीन की रणनीतिक चुप्पी
रूस पर आरोप है कि वह यूक्रेन युद्ध रोकने की कोशिशों को कमजोर कर रहा है, जबकि ट्रंप ने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को लुभाने की कोशिश भी की है। वहीं चीन, जिसके ट्रंप से कई मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, हाल ही में अमेरिका के साथ व्यापार समझौता करने के बाद भी इस मुद्दे पर चुप है।
इटली और फ्रांस ने जताई नाराज़गी
इटली के अर्थव्यवस्था मंत्री जियानकार्लो जियोर्गेटी ने इस योजना को "समस्याग्रस्त" बताया। इटली के एक प्रमुख अखबार के मुताबिक, किसी विदेशी नेता के नेतृत्व वाले समूह में शामिल होना इटली के संविधान का उल्लंघन हो सकता है। फ्रांस ने भी बोर्ड में शामिल न होने का इरादा जताया, जिस पर ट्रंप ने फ्रांसीसी वाइन पर 200% टैरिफ लगाने की धमकी दे दी। साथ ही नॉर्वे और स्वीडन ने इस बोर्ड में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है।
कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान की सतर्कता
कनाडा ने कहा कि वह "सैद्धांतिक रूप से" सहमत है, लेकिन अभी बातचीत जारी है। ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने अब तक कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है। जर्मनी ने यह भी साफ किया कि चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ दावोस में होने वाले हस्ताक्षर समारोह में शामिल नहीं होंगे।
यूक्रेन की दुविधा और जेलेंस्की का बयान
यूक्रेन के राजनयिक अभी इस न्योते की जांच कर रहे हैं। राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने कहा कि चार साल के युद्ध के बाद रूस के साथ किसी भी बोर्ड में शामिल होना उनके लिए मुश्किल है। पोप लियो, जो पहले अमेरिकी पादरी हैं और ट्रंप की कुछ नीतियों की आलोचना भी कर चुके हैं, इस प्रस्ताव का मूल्यांकन कर रहे हैं।
UNSC ने सीमित मंजूरी दी
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने नवंबर में पीस बोर्ड को 2027 तक और सिर्फ गाजा के लिए सीमित मंजूरी दी थी। रूस और चीन ने मतदान से दूरी बनाते हुए कहा कि प्रस्ताव में गाजा के भविष्य में UN की भूमिका साफ नहीं थी।
गाजा में अस्थायी प्रशासन
इस प्रस्ताव के तहत पीस बोर्ड को गाजा में संक्रमणकालीन प्रशासन, पुनर्निर्माण के लिए फंड समन्वय और एक अस्थायी अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल तैनात करने की अनुमति दी गई है। बोर्ड को हर छह महीने में सुरक्षा परिषद को रिपोर्ट देनी होगी।
ट्रंप को मिले खास अधिकार
चार्टर के अनुसार, बोर्ड के अध्यक्ष के तौर पर ट्रंप को वीटो पावर, सदस्यों को हटाने जैसी व्यापक कार्यकारी शक्तियां दी गई हैं, हालांकि कुछ सीमाओं के साथ। बोर्ड अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत शांति निर्माण का काम करेगा।
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