Trump Tariff War: ट्रंप के टैरिफ को जिनपिंग का करारा जवाब, पीछे खिसकने लगे अमेरिका के कदम!
Trump Tariff War: साल 2018 में OTT प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम पर आई क्राइम थ्रिलर सीरीज मिर्जापुर के पहले सीजन के एक एपिसोड में कालीन भैया अपने साझेदारों की बैठक ले रहे थे. इसी दौरान कालीन भैया, मुन्ना त्रिपाठी को मिर्जापुर की गद्दी का अगला वारिस बताते हुए व्यापार से जुड़ा एक फैसला लेने के लिए कहते हैं. मुन्ना भैया ने फैसला लिया सो लिया, साथ में ये भी कह दिया कि मिर्जापुर की गद्दी पर बैठने वाला कभी भी नियम बदल सकता है. माने 'माय लाइफ-माय रूल्स' वाली चाल चल दी. ऐसा ही कुछ इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय राजनीति या यूं कहें कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी देखने को मिल रहा है. जहां गद्दी के नए-नए वारिस बने अमेरिका के मुन्ना भैया उर्फ डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ से जुड़ी पॉलिसीज ला रहे हैं. जिस़से केवल भारत ही नहीं बल्कि रूस, चीन, यूरोपियन यूनियन समेत तमाम विकसित देशों के शेयर मार्केट तेजी से नीचे गिरने लगे. इन्हीं में से एक है चीन. जिसने अमेरिका के इस टैरिफ युद्ध में कुछ वैसी ही भूमिका निभाई है, जैसी की मिर्जापुर सीरीज में गुड्डू भैया का किरदार था. मतलब जो मु्न्ना भैया का फैसला होगा उससे गुड्डू पंडित एक दम उल्टा ही चलेगा. लिहाजा मुन्ना और गुड्डू यानी कि डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग में रस्सा-कसी शुरू हो गई. ट्रंप ने यूं तो कई देशों पर ऊट-पटांग तरीके से टैरिफ की बरसात कर दी, जिनमें से ज्यादातर देश ट्रंप के सामने घुटने टेकते भी नजर आए या फिर डिस्काउंट देने जैसी बातें करने लगे. लेकिन चीन उन चंद देशों में से रहा जिसने 'टिट फॉर टैट' वाली थ्योरी अपनाते हुए डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ वाले हमले का जवाब टैरिफ से ही दिया है.
'लिबरेशन-डे' का ऐलान और लाल हुआ शेयर मार्केट
2 अप्रैल 2025, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक टैरिफ़ों की नई लहर का ऐलान करते हुए इसे 'लिबरल-डे' बता दिया. ट्रंप का ये फैसला उनके दूसरे कार्यकाल की उस आर्थिक नीति की झलक था जिसमें 'America First' को केंद्र में रखकर पूरी दुनिया के व्यापार अमेरिकी हितों के मुताबिक़ ढालने की तैयारी थी.
टैरिफ पॉलिसी का ऐलान बाज़ार बंद होने के बाद किया गया लिहाजा वो शाम जैसे-तैसे कट गई लेकिन अगली सुबह वैश्विक शेयर बाज़ारों के ग्राफ सुर्ख लाल थे. S&P इंडेक्स 500 अंकों के साथ औंधे मुंह गिरा, जो कि कोरोना के दौरान जून 2020 के बाद सबसे बड़ी गिरावट थी. मित्र देश हो, कॉम्टीटर हो या एक दम कट्टर दुश्मन, ट्रंप ने किसी को नहीं बख्शा सब पर टैरिफ लगाए.
Trump Tariff War को ठंडा कर के ही मानेंगे शी जिनपिंग
चीन ने ट्रंप के टैरिफ का जवाब टैरिफ से दिया. जिसका असर अब डोनाल्ड ट्रंप पर होता दिख रहा है. ट्रंप बार-बार नए टैरिफ के ग्राफ लेकर आते, लेकिन चीन भी अमेरिका पर एक बाद एक नए तरीके के टैरिफ लगाता रहा. जिसके बाद ट्रंप और उनके आर्थिक सलाहकार पीटर नवारो अपने ऐलानों से पीछे हटते दिख रहे हैं. 10 अप्रैल को ट्रंप ने चीन पर लगने वाले टैरिफ को एक बार फिर बढ़ाया, जिसके बाद ये कुल 145 प्रतिशत हो गया. जवाब में चीन ने भी अमेरिका पर लगने वाले टैरिफ को बढ़ाकर 125 फीसदी कर दिया. ये तीसरा मौका था जब चीन ने अमेरिका को टैरिफ का जवाब टैरिफ से दिया. हालांकि अमेरिका पर जब चीन ने दूसरी बार टैरिफ लगाया था, उसी दौरान ही ट्रंप की केबिनेट में कई लोग ट्रंप की टैरिफ नीति पर सवाल खड़े करते हुए कहने लगे थे कि अगर ऐसा ही चला तो अमेरिका कहीं वैश्विक बाजार में अकेला ना पड़ जाए और बाकी देश अपने लिए दूसरे मार्केट तलाश लें. दूसरी तरफ अमेरिका समेत पूरे विश्व के शेयर मार्केट में मचे हाहाकार से ट्रंप पर पहले से ही सवाल उठ रहे थे. लिहाजा ट्रंप ने भले ही कहा ना हो लेकिन मान लिया कि अब पीछे हटने का वक्त आ चुका है. दरअसल रॉयटर्स में छपी खबर के मुताबिक ट्रंप ने 10 प्रतिशत के बेस लाइन टैरिफ को छोड़कर जिन देशों पर जो भी टैरिफ थोपे थे सभी में 90 दिनों की छूट की घोषणा कर दी, हालांकि इसमें चीन को कोई राहत नहीं दी. ट्रंप की इस घोषणा का असर आने वाले दिनों में शेयर बाजारों में दिख सकता है और जो व्यापार बेपटरी हो चुका है वो भी ठीक-ठाक पटरी पर लौट सकता है. इसकी शुरुआत अमेरिकी शेयर बाजार होने भी लगी है.

Tariff War में चीन के पलटवार के लिए तैयार नहीं थे ट्रंप?
दोनों तरफ से टैरिफ-टैरिफ खेलने के बाद दोनों देश 'ट्रेड बफ' वाले मोड में दिख रहे हैं. भारी-भरकर टैरिफ के बाद व्यापार हो सकता है लेकिन मुनाफा नाम मात्र का होगा. लिहाजा सिर्फ इमरजेंसी में काम आने वाली चीजों का ही व्यापार हो रहा है और बाकी व्यापार अभी दोनों देशों के बीच ठप है. दूसरी तरफ अमेरिका में जो चीन से आने वाली वस्तुएं रोज-मर्रा के काम की थीं जैसे कि- मेडीकल इक्विपमेंट्स, लीथियम आयन बैटरी, हीटर आदि, उनका आयात न होने से अमेरिका में उन वस्तुओं की कमी दिखने लगी है और दाम भी आसमान छू रहे हैं. टैरिफ लगाते वक्त शायद डोनाल्ड ट्रंप ने भी नहीं सोचा होगा कि यदि 'ट्रेड बफ' जैसी स्थिति बनती है तो क्या अमेरिका के पास उतनी क्षमता है कि चीन में बनने वाली चीजों अगले दिन से अमेरिका में बनाना शुरू किया जाए और उनकी सप्लाई भी हो सके. इसका जवाब है नहीं. अमेरिका दुनिया का सबसे ज्यादा सामान आयात करने वाला देश है जबकि चीन सबको सामान बेचने में टॉप पर है. साथ ही ये दोनों देश एक-दूसरे को सबसे ज्यादा सामान भी बेचते-खरीदते हैं. 2024 में दोनों देशों के बीच का ट्रेड 582.4 बिलियन डॉलर का था. जिसमें चीन बेचता ज्यादा जबकि खरीदता कम है. 2024 में चीन ने 438.9 बिलियन डॉलर का सामान अमेरिका को चिपकाया, जबकि अमेरिका मात्र 143.5 बिलियन डॉलर का माल ही चीन के मार्केट में बेच सका. ऐसे में दोनों देशों के बीच ट्रेड रुकने से चीन के सामने अपने सामान को बेचने के लिए नया बाजार तलाशने की चुनौती जरूर थी लेकिन अमेरिका के सामने उससे भी बड़ी चुनौती थी कि जो सामान वह चीन से खरीदता रहा है उसे तत्काल प्रभाव से अपने यहां बनवाए, जो कि असंभव के बराबर है. उदाहरण के लिए एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, डेल, एनवीडिया जैसी कंपनियों के वर्क स्ट्रक्चर को समझ लेते हैं. कहने को ये कंपनियां अमेरिकी हैं लेकिन इनके ज्यादातर प्रोडक्ट्स को चीन बनाता है. आईफोन का लेटेस्ट वर्जन आईफोन-16 कहने को थो अमेरिकन सेलफोन है लेकिन इसका 80 प्रतिशत प्रोडक्शन चीन में होता है जबकि बकाया का 20 प्रतिशत भारत के तमिलनाडु में. बाकी अमेरिकी कंपनियों का भी यही हाल है, या तो वे बहुत कम प्रोडक्शन करती हैं, या शुरुआत में प्रोडक्शन किया हो बाद में चीन से करवाना शुरू कर दिया हो या फिर कुछ हिस्सा अमेरिका में बनाया जबकि ज्यादातर चीन में. कुल मिलाकर अमेरिकी कंपनियों के आगे बढ़ने में चीन का योगदान बहुत है और अमेरिका अभी कई मामलों में चीन पर निर्भर है.
अमेरिकी अखबारों में घिरने लगे डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी बिजनेस अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने 9 अप्रैल को अपनी एक खबर से सनसनी मचा दी. जिसमें लिखा था Why we don't have a made-in-America I-Phone? यानि हमारे पास अमेरिका में बना आई फोन क्यों नहीं है? इस एक खबर ने बता दिया कि मैन्युफैक्चरिंग के मामले में अमेरिका न सिर्फ चीन बल्कि कुछ मामलों में भारत पर भी डिपेंडेंट है. अमेरिकी जनता में अब एक सवाल है कि 'मेड इन चाइना आईफोन' पर टैरिफ लगा तो दिया है लेकिन 'मेड इन अमेरिका आईफोन' आएगा कब? दूसरी तरफ जितना सस्ता, ज्यादा और स्किल्ड वर्क फोर्स चीन और फिर भारत के पास है क्या अमेरिका के पास उतना है?
चीन ने को लपेटने चले ट्रंप खुद लपेटे में आए?
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने अपने हाल ही में दिए गए बयान में कहा कि 'अमेरिका अपनी गलतियां सुधार ले'. जिससे साफ हो गया कि ट्रंप जितना मर्जी टैरिफ लगा लें चीन उसका जवाब टैरिफ से ही देगा. कई अमेरिकी कंपनियों ने अब डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीतियों पर ही सवाल उठा दिए हैं. कई कंपनियों ने अपने ऑफीशियल स्टेटमेंट में कहा है कि इस टैरिफ वॉर में उन्हें जबरदस्त नुकसान हो रहा है. ट्रंप के कैंपेन में उनके करीबी रहे और Hedge Fund Manager के फाउंडर 'बिल एकमैन' ने टैरिफ पॉलिसी की आलोचना करते हुए कहा कि चीन को भी तीन महीने की छूट वाले प्लान में शामिल करना चाहिए. इसके बाद जब 12 अप्रैल को जब ट्रंप अपने नए टैरिफ खाका के साथ मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने स्मार्ट फोन, लैपटॉप समेत कई दूसरे गैजेट्स को भी इस लिस्ट में रखा जिसमें चीन में बने प्रोडक्ट्स भी होंगे. साथ ही ट्रंप ने कहा कि भले ही ये फैसला 12 अप्रैल को लिया गया हो लेकिन लागू 5 अप्रैल 2025 से ही होगा. ट्रंप ने टैरिफ के नाम पर जो अंधा-धुंध फैसले लिए उन पर कुछ देर के लिए ही सही पर डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कदम वापस लिए हैं. जिसके बाद कई अमेरिकी कंपनियों ने राहत की सांस ली. 13 अप्रैल की सुबह जब बाजार खुला तो एप्पल के शेयर्स में भी उछाल था. कई आर्थिक पंडितो ने ये भी बताया कि आने वाले दिनों में बाजार की स्थिति और बेहतर हो सकती है. लेकिन अभी ये कहना कि डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति फेल हो गई है, जल्दबाजी होगी.
इस खबर को पढ़ने के बाद आपकी क्या राय है? क्या भारत को भी चीन की तरह टैरिफ का जवाब टैरिफ से देना चाहिए? या फिर चीन और अमेरिका के इस द्वंद में माहौल ठंडा होने का इंतजार करना चाहिए?
आप हमें अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं.
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