चीन में बिजली गुल और UK में तेल के लिए हाहाकार, भारत में क्या होने वाला है ? जानिए
नई दिल्ली, 30 सितंबर: दुनिया के दो बड़े देश इस हफ्ते बहुत बड़ी ऊर्जा संकट से गुजर रहे हैं। चीन में कोयले के उत्पादन की कमी से बिजली संकट छा गया है तो ब्रिटेन में पेट्रोल-डीजल की अप्रत्याशित किल्लत देखने को मिल रही है। एक्सपर्ट मानते हैं कि इस संकट के पीछे काफी हद तक कोरोना महामारी एक वजह है। लेकिन, अकेले यही एक कारण नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि जानकार मानते हैं कि आने वाले दिनों में दुनिया के बाकी हिस्सों को भी ऊर्जा संकट से गुजरना पड़ सकता है, जिसके लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। इसमें सबसे पहला नाम अमेरिका का ही लिया जा रहा है, जहां ठंड में ऊर्जा की डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।

चीन में बिजली गुल और यूके में तेल के लिए हाहाकार
चीन अप्रत्याशित बिलजी संकट झेलने को मजबूर हुआ है। उत्तरी चीन में लाखों लोगों को बिजली कटौती झेलनी पड़ी है, फैक्ट्रियां बंद पड़ गईं और पावर सप्लाई बंद होने से फैक्ट्रियों में लगे वेंटिलेटर जैसे उपकरण ठप पड़ गए जिसके चलते मजदूरों के शरीर में कार्बन मोनोऑक्साइड चला गया और उन्हें अस्पताल पहुंचाने की नौबत आ गई। उधर यूनाइटेड किंग्डम अभूतपूर्व तेल संकट से गुजर रहा है और पेट्रोल पंपों पर 'सॉरी आउट ऑफ यूज' के बोर्ड लटक रहे हैं और नैचुलर गैस के दाम आसमान छूने लगे हैं। पूरे यूरोप में तेल की कीमतों में रिकॉर्ड इजाफा दर्ज किया जा रहा है। यही नहीं अमेरिका में ठंड शुरू होने से पहले ही गैस और कोयला उत्पादकों के पास डिमांड काफी बढ़ चुकी है। सवाल है कि इस वैश्विक ऊर्जा संकट की वजह क्या है और यह कितना बुरा तक हो सता है?

'हम इसे पुरानी अर्थव्यवस्था का बदला कहते हैं.....'
पहला तर्क तो यह दिया जा रहा है कि कोरोना महामारी की वजह से ऊर्जा की मांग कम हो जाने के बाद अचानक से डिमांड बढ़ने से सप्लाई चेन का संतुलन बिगड़ गया है। एक्सपर्ट की राय में एक हद तक इस तर्क में दम है। क्योंकि, जलवायु परिवर्तन पर काफी हो-हल्ला के बावजूद अभी भी दुनिया जीवाश्म ईंधन या परंपरागत ऊर्जा पर ही ज्यादा निर्भर है। जैसे कि तेल, कोयला और गैस। लेकिन, जानकार मानते हैं कि पिछले 5-10 वर्षों में कई निवेशकों ने जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक जोर होने के चलते नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों पर बहुत ज्यादा निवेश किया है, लेकिन इस चक्कर में परंपरागत ईंधन पर निवेश में कमी रह गई है और विश्लेषकों के मुताबिक मौजूदा संकट के पीछे यह बहुत बड़ा कारण है। गोल्डमैन सैच ग्रुप के कमोडिटीज रिसर्च के ग्लोबल हेड जेफ करी ने ब्लूमबर्ग टीवी से कहा है, 'हम इसे पुरानी अर्थव्यवस्था का बदला कहते हैं.....'

चीन में कोयल की कमी के चलते बिजली संकट
तेल की कीमतें अभी तीन साल के उच्चतम स्तर पर करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहा है। यूरोप में कोयला,गैस और पानी की किल्लत की वजह से ऊर्जा के दाम आसमान छू रहे हैं। उधर चीन के पास तत्काल उपयोग लायक पर्याप्त कोयले का अभाव है, जिससे परंपरागत ईंधनों की कीमते बढ़ रही हैं। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मुताबिक चीन अकेले पूरी दुनिया से ज्यादा कोयले का इस्तेमाल करता है। ड्रैगन दुनिया का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक भी है, लेकिन सप्लाई की कमी के चलते उसे बिजली संकट की दौड़ से गुजरना पड़ा है, जिससे फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप पड़ गया।

चीन में बिजली की कीमत बढ़ाने पर विचार
चीन के ऊर्जा संकट के पीछे कई फैक्टर ने काम किया है। वहां बिजली की कीमतें नियंत्रित हैं। इसकी वजह से जब कोयले की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर भी पहुंच गईं तो भी कंपनियां अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं या फैक्ट्रियों से नहीं वसूल सकती थीं। इसका मतलब है कि कई कंपनियों को घाटा हो रहा है और वह डिमांड पूरा करने के लिए कोयले का उत्पादन बढ़ाने से कतरा रही हैं। ब्लूमबर्ग न्यूज के मुताबिक चीन के नेशनल डेवलपमंट एंड रिफॉर्म कमीशन ने कंपनियों को डिमांड और सप्लाई के आधार पर कीमतें बढ़ाने की इजाजत दी है, लेकिन यह साफ नहीं है कि वह कितनी कीमतें बढ़ा सकती हैं। जानकारी के मुताबिक चीन सरकार जनता और फैक्ट्रियों के लिए भी इसी तरह की योजना पर यानी बिजली के दाम बढ़ाने पर विचार कर रही है।

यूके में 90 फीसदी पेट्रोल पंप सूखे
इसी तरह यूके के मौजूदा पेट्रोल के दाम को लें तो अनलेडेड पेट्रोल करीब 1.83 डॉलर प्रति लीटर के आसपास और डीजल 1.86 डॉलर के करीब है। ये कीमतें अप्रैल 2012 के रिकॉर्ड स्तर के लगभग पास पहुंच चुकी हैं। सिर्फ ज्यादा दाम ही परेशानी की वजह नहीं है, लोग घबराहट में ज्यादा पेट्रोल खरीद रहे हैं, नतीजा इस हफ्ते 90 फीसदी पेट्रोल पंप में टंकी खाली हो गईं। जानकारों के मुताबिक संकट की इस स्थिति को ब्रेक्जिट और गंभीर बना रहा है। क्योंकि, इसके चलते लॉरी ड्राइवरों की कमी है और पेट्रोल पंपों पर तेलों की सप्लाई करने में दिक्कत आ रही है। अब ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन ने 10,000 विदेशी लॉरी ड्राइवरों को तात्कालिक वीजा देने की बात कही है, लेकिन यह भी शायद पर्याप्त नहीं है। बहरहाल, ब्रिटिश सरकार ने सेना को ट्रक चलाने के लिए अलर्ट रहने को कहा है।

भारत और दुनिया में आगे क्या होगा ?
अमेरिका खुद भी सर्दियों में यह संकट झेल सकता है। ऊपर से महामारी के दौरान सबकुछ ठप पड़े रहने से और मजदूरों की कमी से वहां भी ऑयल सेक्टर पहले से ही दबाव में चल रहा है। कंपनियां कह रही हैं कि उन्हें या तो कुशल कामगार नहीं मिल पा रहे हैं और मिल रहे हैं तो उनकी मांग के मुताबिक वह उन्हें ऑफर करने की स्थिति में वे नहीं हैं। यानी अमेरिका भी तत्काल उत्पादन नहीं बढ़ा सकता कि दुनिया के दूसरे देशों को भी थोड़ा-बहुत पूर्ति की जा सके। इसलिए दुनिया में हर जगह लोगों को महंगी ऊर्जा के लिए मन बनाकर रखना होगा। हां, भारत जैसे देश में सरकार से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वह अपनी ओर से हर संभव कोशिश करे, ताकि आम उपभोक्ताओं पर ज्यादा मार न पड़े। और जहां तक ग्रीन एनर्जी की बात है तो यह भविष्य पर निर्भर है कि इस संकट से उस दिशा में तेजी से काम होता है या फिर दुनिया और ढीली पड़ जाती है।












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