The Kashmir Files: एक फिल्म ने कैसे खोल दी पाकिस्तान की धूर्तता और अमेरिका के दोमुंहा रवैये की पोल
काठमांडू में ‘जमात-ए-इस्लामी’ की बैठक में, कश्मीर में ‘जिहादी जंग’ चला रहे जिहाद समर्थक तमाम प्रतिभागियों की बैठक में जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई गई थी...
नई दिल्ली, मार्च 16: पाकिस्तानी पत्रकार आरिफ जमाल ने अपनी पुस्तक "शैडो वॉर: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ जिहाद इन कश्मीर" में 14 जनवरी, 1990 को काठमांडू में जमात-ए-इस्लामी के सभी गुटों की एक गुप्त बैठक के बारे में लिखा है, जिसमें बढ़ती जिहादी में इन संगठनों की भूमिका पर चर्चा की गई है। लेकिन, इस किताब में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गये हैं बताया गया है, कि कैसे कश्मीर में लगातार होती रही हत्याओं पर पाकिस्तान धुर्तता करता रहा, जबकि अमेरिका, दोमुंहा रवैया अपनाता रहा।

कश्मीर में कैसे शुरू हुआ जिहाद?
नेपाल की राजधानी काठमांडू में 'जमात-ए-इस्लामी' की बैठक में, कश्मीर में 'जिहादी जंग' चला रहे जिहाद समर्थक तमाम प्रतिभागियों की बैठक में जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई गई थी और जमात के संस्थापक नेता ने कश्मीर में प्रत्यक्ष भागीदारी का विरोध किया था, क्योंकि इन्हें डर इस बात का था, कि प्रत्यक्ष भूमिका निभाने पर इनका संगठन सीधे तौर पर भारतीय सुरक्षा बलों के निशाने पर आ जाएगी। लेकिन, इसी बैठक में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी अचानक प्रकट हुआ और उसने कश्मीर में खुले तौर पर जिहाद का समर्थन करने के लिए एक भावुक अपील कर दी। जमाल लिखते हैं कि, इस निर्णायक बैठक के बाद सभी गुटों ने कश्मीर में जिहाद का समर्थन कर दिया।

द कश्मीर फाइल्स ने खोली हकीकत
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई समर्थिक आतंकवादी और जिहादी कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों का सफाया कर रहे थे, जिसे अब पीरियड डॉक्यूमेंट्री फिल्म "कश्मीर फाइल्स" द्वारा सामने लाया गया है। जमाल की किताब से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि, अमेरिका से मिले अकूत पैसे, हथियारों का जखीरा और अफगानिस्तान में पाकिस्तान आधारित अफगान मुजाहिदीन की जीत, जिसके कारण 1989 में अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत सेना की अपमानजनक वापसी हुई थी, उनकी वजह से आईएसआई ने कश्मीर में जिहादियों के माध्यम से अपने कश्मीर एजेंडे को आगे बढ़ाया। आईएसआई के पासा पैसों की कोई कमी नहीं थी, क्योंकि अमेरिका ने अपना खजाना पाकिस्तान के लिए खोल रखा था और भारत की लाख अपील के बाद भी अमेरिका 'चुप' रहा। ये अमेरिका का भारत को लेकर 'डबल' गेम था।

अमेरिका का भारत के खिलाफ ‘डबल गेम’
अफगानिस्तान युद्ध में सोवियत संघ को हराने के लिए अमेरिका हर हद पार कर रहा था और अमेरिकी खजाने से पाकिस्तान के ऊपर रुपयों की बारिश हो रही थी। जिसका खुलासा साल 2022 में उस वक्त हुआ है, जब पाकिस्तान के तानाशाह रहे जिया उल हक का पसंदीदा और तत्कालीन आईएसआई चीफ अख्तर अब्दुर रहमान खान को अमेरिका की तरफ से अवैध तरीकों से 30 लाख अमेरिकी डॉलर ट्रांसफर किए गये थे। अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिका की हार के बाद अब जाकर खुलासा हुआ है, कि तत्कानील आईएसआई चीफ अख्तर अब्दुर रहमान खान के तीन बेटों के नाम पर स्विस बैंक में अकाउंट में पैसे जमा थे। हालांकि, साल 1988 में एक विमान दुर्घटना में जनरल खान और जिहादी तानाशाह जनरल जिया उल हक की मौत हो गई थी। तत्कालीन आईएसआई चीफ अख्तर अब्दुर रहमान खान ही वो शख्स था, जिसने कश्मीर घाटी में जिहाद शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसे बाद में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के शासनकाल में भी आगे बढ़ाया गया।

कश्मीरी पंडितों की हत्या का पैटर्न
आतंकवादियों द्वारा कश्मीरी पंडितों की हत्याओं के पैटर्न के एक अध्ययन से पता चलता है कि, 1990 में घाटी में जिहादी आतंकवाद की शुरुआत के साथ निशाना बनाकर भी हमले किए गये। हालांकि, इसके ठीक बात कश्मीर में होने वाली हत्याओं में अचानक से गिरावट आ गई, लेकिन इसके पीछे ये बात नहीं थी, कि उनकी आत्मा में परिवर्तन आ गया था, बल्कि इसलिए, क्योंकि, जिहादियों ने अपने रणनीतिक लक्ष्य को हासिल कर लिया था और घाटी में भीषण नरसंहार को कामयाब बना दिया था। हजारों कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया गया और पूरी दुनिया खामोश तमाशा देखती रही।

बीजेपी नेता की हत्या के साथ शुरूआत
14 सितंबर 1989 को बीजेपी नेता टीका लाल टपलू की हत्या के साथ कश्मीर घाटी मं हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ था और फिर 2 महीने में ही कम से कम 254 कश्मीरी पंडितों की हत्याएं कर दी गईं। साल 1990 में 136 कश्मीरी पंडित, साल 1991 में 18 कश्मीरी पंडित 1992 में 6 कश्मीरी पंडित, 1993 में 10 कश्मीरी पंडित, 1994 में 4 कश्मीरी पंडित, 1995 में 2 कश्मीरी पंडित, 1997 में 7 लोग, 1998 में 26 हिंदू, 2000 में 6 हिंदू, 2001 में 2 हिंदू, 2002 में 1 हत्या, 2003 में 25 हत्याएं, 2004 में एक हत्या, 2020 में एक हत्या और 2021 में तीन बीजेपी नेताओं की हत्या की गई। 1989 से 2021 तक, कुल 254 छोटे कश्मीरी पंडित समुदाय को गोलियों से भून दिया गया। और मारे गये ये लोग आम कश्मीरी पंडित नहीं, बल्कि सरपंच से लेकर अलग अलग पदों पर थे।

दहशत फैलाने के लिए हत्याएं
1990 में बड़ी संख्या में हत्याएं मुख्य रूप से सभी कश्मीरी पंडितों के दिलों में दहशत फैलाने के लिए की गई थीं, कि घाटी में रहना या फिर वापसी करना, उनके लिए कोई विकल्प नहीं था। यह 1998 में वंधमा गांव हत्याकांड और 2003 में नदीमर्ग नरसंहार के साथ और भी ज्यादा साफ तौर पर स्पष्ट हो गया, जहां पाकिस्तान से प्रशिक्षित जिहादियों ने कश्मीरी हिंदुओं को लाइन में खड़ा किया और फिर एक एक कर सभी की गोली मारकर हत्या कर दी। इन जिहादियों ने साफ संदेश दिया... घाटी में वापस मत लौटो। आरटीआई जवाब में श्रीनगर जिला पुलिस ने अपने कहा है कि, पिछले तीन दशकों में 89 कश्मीरी पंडित मारे गए और 1635 गैर-कश्मीरी पंडितों की हत्या की गई। ये आंकड़ा सिर्फ श्रीनगर जिले से संबंधित है, सिर्फ एक जिले से, पूरे कश्मीर से नहीं। कश्मीर पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी के अनुसार, जिस तरीके से और जिस मंशा से घाटी में पंडितों और मुसलमानों को मारा गया, उसमें काफी अंतर है।

जिहादी एजेंडे को स्थापित करने के लिए नरसंहार
कश्मीर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि "कश्मीर घाटी में किया गया नरसंहार मुख्य तौर पर 'निजाम-ए-मुस्तफा' को स्थापित करने के लिए भयावह जिहादी एजेंडे के साथ किया गया था। जबकि, घाटी मे जो बहुसंख्यक समुदाय (मुस्लिम) के लोग मारे गये थे, उनमें से ज्यादातर कानून और व्यवस्था के साथ साथ संपत्ति के विवाद की वजह से मारे गये। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि, इसके अलावा बड़ी संख्या में कश्मीर के लोग, संदिग्ध आतंकियों की मुखबिरी करने, महिलाओं, आंतकी कमांडरों के फरमानों को मानने से इनकार करने और व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से भी काफी संख्या में लोगों को निशाना बनाया गया। लेकिन, घाटी के कश्मीरी पंडितों का सबसे बड़ा दर्द ये रहा, कि कश्मीरी पंडितों ने ना सिर्फ अपनी जान गंवाई, बल्कि घर, चूल्हा और संपत्ति भी गंवाई। लेकिन, बहुसंख्यक आबादी के जो मारे गये, उनके परिवार अभी भी कश्मीर में ही हैं। जमाल की किताब में सैयद अली शाह गिलानी की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें घाटी में सभी बहुमत वाले नेताओं को जिहादियों द्वारा निशाना बनाए जाने का जिक्र किया गया है, जिसमें पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है।

अमेरिका का डबल गेम
हालांकि 1990 के दशक में कश्मीर में सांप्रदायिक एकता को नष्ट करने के लिए पाकिस्तानी सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, लेकिन, उस वक्त वॉशिंगटन और इस्लामाबाद में काफी गहरी दोस्ती हुआ करती थी। अमेरिका 1 अक्टूबर 2001 को जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर किए गये हमले तक कश्मीर में आतंकवाद को पहचानने में विफल रहा। पूरे 1990 के दशक में, जब भारी संख्या में कश्मीरी पंडित मारे जारे रहे थे, उनका नरसंहार किया जा रहा था, उस वक्त अमेरिका की सरकार, अमेरिका की मीडिया, पश्चिमी देशो क मीडिया, दुनिया के तमाम मानवाधिकार संगठन...सब खामोश था। लेकिन, जब पहली बार 13 सितंबर 2001 को पहली बार अमेरिका पर हमला हुआ, तो अमेरिका को आतंकवाद के बारे में पता चला और फिर अमेरिका के लिए आतंकवाद की परिभाषा बदल गई।












Click it and Unblock the Notifications