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Tarique Rahman July Charter: शपथ लेते ही तानाशाही पर उतरे तारिक रहमान, जनमत संग्रह खारिज! फिर होगा तख्तापलट?

Tarique Rahman July Charter Rejection: बांग्लादेश में तारिक रहमान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही लोकतंत्र के भविष्य पर काले बादल मंडराने लगे हैं। 17 फरवरी, 2026 को सत्ता की कमान संभालते ही बीएनपी (BNP) प्रमुख ने जनता के उस जनादेश को सीधी चुनौती दी है, जिसके लिए जुलाई 2024 में छात्रों ने खून बहाया था। 'जुलाई चार्टर' पर हुए जनमत संग्रह में 50% से अधिक नागरिकों ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया था, लेकिन तारिक रहमान और उनके सांसदों ने इस चार्टर के तहत शपथ लेने से साफ इनकार कर दिया।

सत्ता में आते ही जनमत को ठुकराने और सुधारों को खारिज करने के इस अड़ियल रुख को विशेषज्ञों ने "चुनी हुई तानाशाही" की आहट बताया है। बहुमत के अहंकार में जनता के सबसे बड़े फैसले को दरकिनार करना बांग्लादेश को फिर से उसी अंधेरे और तख्तापलट की ओर धकेल सकता है, जिससे वह अभी उभरा था।

Tarique Rahman July Charter Rejection

Bangladesh July Charter: 'जुलाई चार्टर' क्या है

जुलाई चार्टर डॉ. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार द्वारा तैयार किया गया एक सुधार ढांचा था, जिसे जनमत संग्रह के जरिए भारी जनसमर्थन मिला था। इसका मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री की शक्तियों पर लगाम लगाना था। इसमें प्रावधान था कि कोई भी व्यक्ति 10 साल से अधिक समय तक पीएम नहीं रह सकता और पीएम पद पर रहते हुए वह पार्टी का अध्यक्ष नहीं रह पाएगा। तारिक रहमान, जो बीएनपी के सर्वेसर्वा हैं, इन सुधारों को अपनी निजी राजनीतिक शक्ति के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं। इसीलिए, शपथ लेते ही उन्होंने इन 'Procedural Guardrails' को मानने से इनकार कर दिया।

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Tarique Rahman Bangladesh PM: जमात-ए-इस्लामी का साथ और गहराता संकट

हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथी दल जमात-ए-इस्लामी ने भी इस मामले में बीएनपी का साथ दिया है। जमात के नायब अमीर ने स्पष्ट कर दिया कि उनके सांसद भी संवैधानिक सुधार परिषद का हिस्सा नहीं बनेंगे। दो बड़ी ताकतों का यह गठजोड़ संकेत दे रहा है कि बांग्लादेश में पुरानी राजनीति का दौर वापस लौट रहा है, जहां संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर व्यक्तिगत और दलीय हितों को रखा जाता है। जनता के फैसले को "खराब" बताकर खारिज करना लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संकेत है, जो विपक्ष और नागरिक समाज को फिर से सड़क पर उतरने के लिए मजबूर कर सकता है।

'जुलाई चार्टर' में किन बदलावों की बात

डॉ. मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार द्वारा प्रस्तावित और जनमत संग्रह द्वारा समर्थित 'जुलाई चार्टर' का मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश को भविष्य की किसी भी तानाशाही से बचाना और सत्ता का विकेंद्रीकरण करना था।

  • कार्यकाल की सीमा: कोई भी व्यक्ति बांग्लादेश में एक बार में या कुल मिलाकर 10 साल से अधिक समय तक प्रधानमंत्री नहीं रह सकता (Two-term limit)।
  • दोहरे पद पर रोक: प्रधानमंत्री पद पर आसीन व्यक्ति अपनी राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष नहीं रह सकता। उसे पार्टी की कमान छोड़नी होगी ताकि सत्ता का केंद्रीकरण न हो।
  • द्विसदनीय संसद (Bicameral Parliament): मौजूदा संसद के साथ-साथ भारत की राज्यसभा की तर्ज पर 100 सीटों वाला एक 'उच्च सदन' बनाने का प्रस्ताव।
  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता: जजों की नियुक्ति का अधिकार प्रधानमंत्री के पास न होकर एक स्वतंत्र कॉलेजियम के पास होगा, जिसमें केवल सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज शामिल होंगे।
  • विपक्ष की भागीदारी: संसद के उपसभापति (Deputy Speaker) और महत्वपूर्ण संसदीय समितियों के प्रमुख का पद विपक्ष के सदस्यों को दिया जाएगा।
  • महिलाओं का प्रतिनिधित्व: राष्ट्रीय संसद में महिलाओं की भागीदारी और सीटों के आरक्षण को बढ़ाने का विशेष प्रावधान।
  • चुनाव प्रणाली में सुधार: एक निष्पक्ष और शक्तिशाली केयरटेकर सरकार (Caretaker Government) की स्थायी वापसी, जो चुनाव के समय निष्पक्षता सुनिश्चित करे।
  • प्रशासनिक जवाबदेही: भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए 'लोकपाल' (Ombudsman) जैसी संस्थाओं को संवैधानिक शक्ति देना।

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क्या फिर होगा तख्तापलट?

इतिहास गवाह है कि जब भी बांग्लादेश में जनता की आकांक्षाओं को दबाया गया है, उसका अंत हिंसक विद्रोह या तख्तापलट में हुआ है। अगस्त 2024 में छात्रों ने जो क्रांति की थी, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि 'सिस्टम' बदलने के लिए थी। यदि तारिक रहमान सरकार जनमत संग्रह के जरिए पारित सुधारों को लागू नहीं करती है, तो छात्र संगठन और नागरिक समाज इसे "जुलाई क्रांति के साथ विश्वासघात" मानेंगे। ढाका की सड़कों पर फिर से उठने वाला असंतोष इस नई सरकार की स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

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