अफगानिस्तान में पाकिस्तान के सारे सपने टूटे, तालिबान को गुलाम बनाने में हुआ नाकाम, जानें कैसे बिगड़े संबंध?
Taliban-Pakistan Tie: 15 सालों तक पहाड़ों और गुफाओं में रहने के बाद 15 अगस्त 2021 को काबुल फतह करने वाले तालिबान को लेकर पाकिस्तान को उम्मीद थी, कि तालिबान के नेता उसके गुलाम बनकर रहेंगे और अफगानिस्तान, पाकिस्तान के लिए बैकयार्ड बन जाएगा, लेकिन दो सालों के तालिबान शासन के बाद पाकिस्तान का ये सपना टूट गया है।
इस साल 15 अगस्त को जब तालिबान ने काबुल पर नियंत्रण के दो साल पूरे होने को लेकर जश्न मनाया, तो इन दो सालों में उनके लंबे समय के सहयोगी और पड़ोसी पाकिस्तान के साथ उनके रिश्ते तेजी से खराब होते दिख रहे हैं।

अलजजीरा के मुताबिक, अफगानिस्तान की सीमा से लगे पाकिस्तान के कबायली इलाके में सिलसिलेवार घातक हमलों के लिए इस्लामाबाद, काबुल को जिम्मेदार ठहरा रहा है। नवीनतम हमला, जुलाई के अंत में बाजौर जिले में एक आत्मघाती बम विस्फोट था, जिसमें 54 से अधिक लोग मारे गए थे और इस हमले की जिम्मेदारी ISIS के सहयोगी ISIS-खुरासान प्रांत में ने ली थी।
तालिबान-पाकिस्तान में क्यों बिगड़े संबंध?
शीर्ष पाकिस्तानी अधिकारियों ने सत्तारूढ़ तालिबान प्रशासन पर अफगानिस्तान में आतंकियों को पनाह देने और उन्हें सीमा पार आतंकवाद फैलाने से रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया।
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने एक कार्यक्रम में कहा, कि "हम अपनी रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कार्य करेंगे। यदि अफगान अधिकारी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो हमारे पास अफगानिस्तान की सीमा के अदंर कार्रवाई करने का विकल्प होगा, लेकिन ये पहला विकल्प नहीं।"
वहीं, बाजौर हमले के ठीक एक हफ्ते बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर ने भी पाकिस्तानी धरती पर हमले करने में "अफगान नागरिकों की संलिप्तता" की निंदा की और इसे "क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए हानिकारक" बताया।
उन्होंने बताया कि अफगान धरती से होने वाले हमले तालिबान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच 2020 के दोहा शांति समझौते का "उल्लंघन" है, जिसके तहत तालिबान ने दूसरे सशस्त्र समूहों को अपने क्षेत्र में काम करने की अनुमति नहीं देने का वादा किया था।
पाकिस्तान के आरोपों को नकारता तालिबान
हालांकि, बाजौर विस्फोट की निंदा करने वाले तालिबान प्रशासन ने पाकिस्तानी आरोपों का खंडन करना जारी रखा है।
तालिबान प्रशासन के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने पिछले सप्ताह जारी एक बयान में कहा था, कि "पाकिस्तान में हालिया घटना के बाद, अधिकारियों ने अपने देश की सुरक्षा को मजबूत करने के बजाय एक बार फिर अफगानों को दोषी ठहराया है।"
जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा, कि "अफगानिस्तान के इस्लामी अमीरात ने एक बार फिर इस बात पर जोर दिया है, कि वह पाकिस्तान पर किसी भी हमले के पक्ष में नहीं है, और हम किसी को भी पाकिस्तान के खिलाफ अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देंगे। लेकिन, पाकिस्तान के क्षेत्र के अंदर हमलों को रोकना और नियंत्रित करना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है।"
शब्दों का ये जंग, दोनों देशों के बीच तेजी से बिगड़ते संबंधों को दर्शाता है, क्योंकि पाकिस्तान को अपने सैन्य और पुलिसकर्मियों के साथ-साथ आम जनता पर बढ़ते हमलों का सामना करना पड़ रहा है।
सांप पालने की सजा भुगत रहा पाकिस्तान
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत, जिसमें बाजौर भी शामिल है, वहां अकेले इस साल, यानि 2023 में 300 से ज्यादा हमले किए गये हैं, जिनमें से ज्यादातर हमलों की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने ली है, जिसे पाकिस्तान तालिबान के नाम से जाना जाता है।
टीटीपी की स्थापना 2007 में हुई थी, और यह वैचारिक रूप से अफगान तालिबान के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन तालिबान का कहना है, कि टीटीपी का उससे कोई संबंध नहीं है। टीटीपी, पाकिस्तान में वही इस्लामिक शासन लागू करना चाहता है, जैसा शासन अब अफगानिस्तान में है, जबकि पाकिस्तान में शरिया के कुछ ही कानून लागू हैं।
पूर्व पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर साद मुहम्मद, जिन्होंने अफगानिस्तान में रक्षा अताशे के रूप में भी काम किया है, उन्होंने कहा, कि पिछले कुछ वर्षों में 90 प्रतिशत से ज्यादा हमले टीटीपी से जुड़े थे।
लेकिन, जैसा की तालिबान ने हमलों में अपनी भूमिका से बार-बार इनकार किया है, ब्रिगेडियर साद मुहम्मद ने कहा, कि वह दोनों पड़ोसियों को "निकट भविष्य" में दोस्त बनते नहीं देख रहे हैं, क्योंकि दोनों के बीच लगातार आरोप-प्रत्यारोप चल रहा है।
अलजजीरा की एक रिपोर्ट में उन्होंने कहा, कि "ज्यादा से ज्यादा ये हो सकता है, कि दोनों देश अपने संबंधों को मैनेज करता हे, लेकिन इससे आगे कुछ नहीं होने वाला है।"
उच्च-स्तरीय बातचीत
पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर ध्यान केंद्रित करने वाली आतंकवाद विरोधी विद्वान अमीरा जादून ने कहा, कि बाजौर हमले से दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ेगा।
संयुक्त राज्य अमेरिका में क्लेम्सन विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर जादून ने कहा, कि पाकिस्तान को उम्मीद थी, कि तालिबान सरकार टीटीपी पर कार्रवाई करेगी, लेकिन तालिबान निर्णायक रूप से कार्रवाई करने में विफल रहा है। उन्होंने कहा, कि इस्लामिक स्टेट ने पाकिस्तान के जनजातीय सीमा क्षेत्रों में ताकत हासिल करना जारी रखा है, जबकि अफगानिस्तान में अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहा है, जिससे इस धारणा को बल मिला कि पाकिस्तान विरोधी लड़ाकों को, अफगानिस्तान में पनाह मिल सकती है।
उन्होंने कहा, कि इस वजह से तालिबान को लेकर पाकिस्तान की निराशा बढ़ती ही जा रही है।
प्रोफेसर जादून ने कहा, कि बिलावल भुट्टो की हालिया टिप्पणी, पाकिस्तान के फ्रस्ट्रेशन को दिखाता है और शायद पाकिस्तान ये सोचता है, कि इस धमकी के बाद तालिबान शायद उसकी चेतावनी को गंभीरता से लेगा।
इसके अलावा, तत्कालीन रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने फरवरी में बातचीत के लिए काबुल की यात्रा की, इसके बाद मई में अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने इस्लामाबाद का दौरा किया था।
लेकिन इन चर्चाओं से हिंसा कम नहीं हुई है। टीटीपी ने अकेले जुलाई महीने में 90 से ज्यादा हमले किए हैं। जादून ने कहा, कि टीटीपी ने समूहों के ऐतिहासिक संबंधों, साझा पृष्ठभूमि और कुछ तालिबान सदस्यों के बीच उनके प्रति सहानुभूति के कारण, अफगान तालिबान के लिए एक विशेष दुविधा पैदा की है।
इस बीच, पाकिस्तान क्षेत्रीय सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ फिर से जुड़ने की कोशिश करता दिख रहा है। यूनाइटेड स्टेट्स सेंट्रल कमांड का नेतृत्व करने वाले जनरल माइकल एरिक कुरिला ने सात महीने में दक्षिण एशियाई देश की अपनी दूसरी यात्रा के दौरान पिछले महीने पाकिस्तान के सेना प्रमुख से मुलाकात की।
पाकिस्तानी सेना के एक बयान के अनुसार, अधिकारियों ने "क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति और रक्षा सहयोग" से संबंधित मामलों पर चर्चा की। लेकिन, ये सिर्फ कहने वाली बातें और हकीकत ये है, कि तालिबान और पाकिस्तान के बीच के संबंध खराब हो गये हैं और फिलहाल इस संबंध में सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है।
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