घर में रहें, बुर्का पहनें, मर्दों को संतुष्ट करें...अफगानिस्तान में महिलाएं अब सिर्फ सेक्स करने की ‘चीज’ हैं!

तालिबान के मजहबी मंत्रालय के कार्यवाहक मंत्री खालिद हनफ़ी ने कहा कि, 'हम चाहते हैं कि हमारी बहनें गरिमा और सुरक्षा के साथ रहें’।

काबुल, मई 08: अफगानिस्तान की गलियों में जगह-जगह पोस्टर्स लगे हैं, कि औरतों के लिए बिना बुर्का पहने घर से बाहर निकलना मना है। पोस्टर में शर्त लिखा गया है, कि बुर्के में आंख में ढंकी होनी चाहिए, अन्यथा आपको इस्लामिक कानून के हिसाब से सजा मिलेगी। कुछ और पोस्टर्स लगे हैं, जिनमें लिखा है, कि महिलाओं का गाड़ी चलाना गुनाह है, तो कुछ पोस्टर्स में लिखा है, बच्चियां घर में रहें, उन्हें अब पढ़ाई-लिखाई की जरूरत नहीं है। तो फिर अफगानिस्तान की महिलाएं क्या करेंगी? एक बहुत ही साधारण सा सवाल सामान्य मन में उभरता है, लेकिन इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के लिए ये सवाल कोई मायने नहीं रखते।

महिलाओं के लिए नये फरमान

महिलाओं के लिए नये फरमान

पिछले साल 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने दुनिया को बताया था, कि अफगानिस्तान का नाम बदल दिया गया है और नया नाम है, 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान', और उसी वक्त आभास हो गया था, कि इस देश में महिलाओं के साथ क्या सलूक किए जाने वाले हैं। अब तालिबान के मजहबी मंत्रालय ने अपने नियंत्रण वाले अफगानिस्तान के ज्यादातर हिस्सों में पोस्टर्स चिपकाएं हैं, जिनमें महिला ओं के लिए बुर्का पहनना अनिवार्य बताया गया है। पोस्टर्स में साफ संदेश लिखा है, कि बुर्के में सिर से लेकर पैर तक ढंका होना चाहिए, क्योंकि इस्लामिक कानून यही कहता है। मौजूदा वक्त में अफगानिस्तान के सर्वोच्च नेता और तालिबान प्रमुख हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने शनिवार को काबुल में एक समारोह के दौरान ये फरमान जारी किया है और फरमान नहीं मानने पर उस औरत के साथ उसके घरवाले भी इस्लामिक कानून के मुताबिक गुनहगार माने जाएंगे और सजा के भागीदार होंगे।

..तो फिर महिलाएं क्या करेंगी?

..तो फिर महिलाएं क्या करेंगी?

पिछले साल काबुल पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने दुनिया से वादा किया था, कि महिलाओं के मौलिक अधिकारों का सम्मान किया जाएगा, लेकिन इस्लामिक संगठन ने सबसे पहले अपने वादे को तोड़ा और अफगानिस्तान में महिलाओं से तमाम अधिकार छीन लिए गये हैं। यानि, अफगानिस्तान में फिर से 1990 का दौर शुरू हो चुका है, जब तालिबान पहली बार सत्ता पर काबिज हुआ था और महिलाओं के तमाम अधिकार छीन लिए गये थे, जिसमें उनका घर से बाहर निकलना भी शामिल था और आठ साल की उम्र के बाद काम करने या शिक्षा प्राप्त करने पर रोक शामिल थी।

डॉक्टर से नहीं दिखा सकती महिलाएं

डॉक्टर से नहीं दिखा सकती महिलाएं

तालिबान ने पिछली बार भी कठोर शरिया कानून लागू किया था और इस बार भी अफगानिस्तान में कठोर शरिया कानून लागू कर दिया गया है और तालिबान के पिछले शासन में महिलाओं को पुरुष डॉक्टर से इलाज कराने की इजाजत नहीं थी। और चूंकी अफगानिस्तान में महिला डॉक्टर्स की संख्या काफी ज्यादा कम थी, लिहाजा महिलाओं का इलाज बंद हो गया था, भले ही वो किसी दर्द से तड़पती ही क्यों ना रहें। मेल डॉक्टरों को तालिबान का आदेश था, कि वो महिलाओं का इलाज नहीं कर सकते हैं, लिहाजा, जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने महिलाओं का इलाज बंद कर दिया था। इस नियम का उल्लंघन करने वालों के लिए सार्वजनिक सजा का प्रावधान किया गया था। अगर किसी महिला ने नेल पॉलिश लगा लिया है, तो फिर उसके अंगूठे के पोर को काट दिया जाता था। यानि, महिलाएं किसी भी तरह का फैशन नहीं कर सकती थीं, अन्यथा या तो उन्हें कैद कर लिया जाता था, या फिर उन्हें सार्वजनिक सभा में पत्थरों से मारा जाता था। इस बार भी अफगानिस्तान में वही कानून लागू किया गया है, तो सवाल यही हैं, कि महिलाएं फिर करेंगी क्या?

पढ़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध

पढ़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध

तालिबान ने पिछले महीने महिलाओं की पढ़ाई पर फैसला लिया और 8 साल की उम्र से ज्यादा की बच्चियों की पढ़ाई-लिखाई पर पाबंदी लगा दी है। यानि, अफगानिस्तान में महिलाओं की शिक्षा बंद। इसी तालिबान ने पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए 'महिलाएं संपत्ति नहीं हैं' का फरमान जारी किया था, लेकिन 4 महीने बाद ही तालिबान अपनी औकात पर आ चुका है। इसी साल मार्च में तालिबान ने अचानक फैसला लेते हुए लड़कियों के माध्यमिक विद्यालयों और हाईस्कूल में पढ़ाई पर पाबंदी लगा दी थी। जबकि, महिलाओं के यात्रा करने पर पिछले साल ही पाबंदियां लगाई गईं थीं, जिसमें कहा गया था कि, महिलाओं को पुरुष रिश्तेदार के बिना 45 मील से ज्यादा की यात्रा करने की अनुमति नहीं है। यानि, महिलाएं पूरी तरह से पुरूष की मर्जी पर निर्भर रहें।

फिल्मों, टीवी में काम पर प्रतिबंध

फिल्मों, टीवी में काम पर प्रतिबंध

अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार ने महिलाओं के किसी भी तरह से फिल्मों, टीवी सीरियल्स या किसी भी तरह के नाटक में पुरूषों के साथ काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यानि, महिलाएं सिर्फ उसी सीरियल या फिल्म में काम कर सकती हैं, जिसमें ना कोई पुरूष कलाकार हो, ना ही क्रू मेंबर्स में कोई पुरूष हो। यानि, महिलाओं से कोई भी क्रिएटिव काम करने की आजादी छीन ली गई है। तो फिर महिलाओं के पास घर में रहकर पेट भरने और मर्जों की मर्जी से सेक्स करने के अलावा कोई और विकल्प कहां बचता है, क्योंकि तालिबान राज में पुरूषों को सेक्स करने की पूरी आजादी है, नाबालिग लड़कियों के साथ भी।

क्या अफगान करेंगे फैसले का बहिष्कार?

क्या अफगान करेंगे फैसले का बहिष्कार?

तालिबान के नये नियम काफी कठोर हैं और फैसला नहीं मानने पर कठोर सजा का फरमान है। लेकिन, क्या सारे अफगान तालिबान के इस फैसले से सहमत हैं? अफगानिस्तान की आबादी 4 करोड़ की है, जिनमें से 70 प्रतिशत लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और ये 70% जनता तालिबान का विरोध नहीं करने वाली है। डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में शहरी इलाकों में रहने वाले 15% अफगान पुरूषों का मानना है, कि महिलाओं को शादी करने के बाद भी काम करने की इजाजत मिलनी चाहिए। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने साल 2019 में एक स्टडी रिपोर्ट जारी किया था, जिसे यूनाइटेड नेशंस वूमन एंड प्रोमुंडो ने जारी किया था। जिसमें 2 तिहाई अफगान लोगों ने शिकायत करते हुए कहा था, कि अफगानिस्तान में महिलाओं के पास 'काफी ज्यादा अधिकार' हैं। यानि, अफगानिस्तान के लोगों की भी यही मानसिकता है, जिनके लिए महिलाएं सिर्फ सेक्स करने का सामान भर हैं, बच्चे पैदा करने की मशीन भर हैं। इसीलिए तो अभी भी जब परिवार भूख से मरने लगता है, तो सबसे पहले 5 साल की या 7 साल की बेटी को 50 साल या 60 साल के मर्द के साथ ब्याह दिया जाता है।

नियम नहीं मानने पर सजा

नियम नहीं मानने पर सजा

अफगानिस्तान में हर दिन से ऐसे हालात नहीं थे और साल 1964 में अफगानिस्तान में महिलाओं को पुरूषों के समान ही अधिकार हासिल थे, लेकिन धीरे धीरे इस्लाम की नई परिभाषाएं बनाईं गईं और महिलाओं के अधिकार ही छीने जाने लगे। और इस बार भी अफगान महिलाओं के लिए सजा की घोषणा की गई है, अगर वो तालिबान की नियमों का उल्लंघन करती हैं। तालिबान का यह कदम 1996 और 2001 के बीच पिछले कट्टर शासन के दौरान लगाए गए समान प्रतिबंधों को उजागर करता है। तालिबान के फरमान में कहा गया है कि, यदि कोई महिला अपना चेहरा नहीं ढकती है, तो उसके पिता या निकटतम पुरुष रिश्तेदार को पहली बार चेतावनी दी जाएगी और दूसरी बार उन्हें जेल भेज दिया जाएगा और उनकी नौकरी छीन ली जाएगी। लेकिन, अगर तीसरी बार भी नियमों का उल्लंघन किया जाता है, तो उन्हें कोड़े मारे जाएंगे। फरमान में कहा गया है कि, आदर्श तौर पर चेहरा ढंकने के लिए नीला बुर्का है, जो केवल आंखों को एक जाल के माध्यम से दिखाता है। तालिबान के मजहबी मंत्रालय के कार्यवाहक मंत्री खालिद हनफ़ी ने कहा कि, 'हम चाहते हैं कि हमारी बहनें गरिमा और सुरक्षा के साथ रहें'।

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