संकट में आई श्रीलंका की ‘निरंकुश’ राजपक्षे सरकार, पेश होगा अविश्वास प्रस्ताव, परिवार राज होगा खत्म?
श्रीलंका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब देश की मुद्रा, डॉलर के मुकाबले 300 को पार कर गया है और ये बताता है, कि देश की आर्थिक स्थिति काफी ज्यादा खराब हो चुकी है।
कोलंबो, अप्रैल 09: पाकिस्तान की सत्ता में पिछले दो दशकों से वर्चस्व स्थापित करने वाली राजपक्षे सरकार अब संकट में आ चुकी है और देश को 'बर्बादी' के मुहाने पर खड़े करने वाली राजपक्षे सरकार की बहुत जल्द सत्ता से विदाई हो सकती है और इसके साथ ही सवाल उठ रहे हैं, कि क्या राजपक्षे परिवार का वर्चस्व श्रीलंका में खत्म होगा और श्रीलंका, जो एक परिवार के इशारे पर चलता रहा है, क्या परिवारवार खत्म होगा?

खतरे में राजपक्षे सरकार
श्रीलंका की मुख्य विपक्षी पार्टी समागी जन बालवेगया (एसजेबी) ने घोषणा की है, कि, श्रीलंका सरकार आर्थिक संकट से प्रतिकूल रूप से प्रभावित द्वीप राष्ट्र के लोगों को तत्काल राहत प्रदान करने में विफल रही है और पार्टी राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएगी। एसजेबी ने कहा कि, "हमने श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया है क्योंकि वह आर्थिक नीतियों के संबंध में देश को संबोधित करने में विफल रहे हैं। हमने सभी विपक्षी नेताओं के साथ एक बैठक बुलाई है और जल्द ही इस पर अंतिम निर्णय लेंगे।" श्रीलंका में विपक्ष के नेता साजिथ प्रेमदासा ने एएनआई को राजपक्षे सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की पुष्टि की है।

श्रीलंका में हो शक्ति-विभाजन
इसके अलावा, श्रीलंका में आने वाले वक्त में परिवारवाद हमेशा खत्म हो, और कोई पार्टी निरंकुश ना बने, इसके लिए उन्होंने कहा कि, विपक्षी सांसदों ने यह भी चर्चा की है, कि कार्यकारी अध्यक्षता का अंत होना चाहिए और कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच श्रीलंका में शक्ति का विभाजन होना चाहिए। इससे पहले, विपक्षी नेता साजिथ प्रेमदासा ने कहा था कि, श्रीलंका को 'सर्वशक्तिमान कार्यकारी अध्यक्ष पद' को समाप्त करना चाहिए और न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच शक्ति का संतुलन होना चाहिए, ताकि तानाशाही के रास्ते पर कोई भी शख्स देश को ना लेकर जा पाए। मुख्य विपक्षी पार्टी ने कहा कि, उसकी कोशिश संसद को और ज्यादा से ज्यादा अधिकार देकर संसद को मजबूत करने की है।

कार्यकारी अध्यक्ष पद हो खत्म
मुख्य विपक्षी पार्टी के सांसद प्रेमदासा ने संसद में एक नई चुनावी प्रणाली शुरू करने की आवश्यकता के बारे में याद दिलाते हुए मंगलवार को संसद में जोरदार शब्दों में कहा कि, "लगभग 20 वर्षों तक हर नेता ने कार्यकारी अध्यक्ष पद को खत्म करने का वादा किया, लेकिन उन्होंने केवल इसे मजबूत करने का काम किया।" आपको बता दें कि, साल 1978 में श्रीलंका में राष्ट्रपति प्रणाली की शुरुआत के बाद से, हर चुनाव जो हुआ वह राष्ट्रपति पद को खत्म करने के वादे पर लड़ा गया। हालांकि, एक बार चुने जाने के बाद सभी राष्ट्रपतियों ने चुनावी वादे को नज़रअंदाज़ कर दिया। श्रीलंका में राष्ट्रपति के पास अपार शक्तियां होती हैं और राष्ट्रपति पद पर काबिज होने वाला शख्स अपनी मर्जी से शासन चलाता है और बड़ी आसानी से संविधान तक में संशोधन कर देता है।

सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी
इस बीच, श्रीलंकाई नागरिक लगातार देश में राजपक्षे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे से इस्तीफा देने की मांग कर रहे हैं। वहीं, सहयोगी पार्टियों के समर्थन वापस लेने के बाद श्रीलंका की सरकार अल्पमत में आ गई है, लेकिन अल्पमत सरकार होने के बाद भी श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। वहीं, श्रीलंका भोजन और ईंधन की भारी कमी के साथ एक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है जिससे द्वीप राष्ट्र में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हो रहे हैं। COVID-19 महामारी की शुरुआत के बाद से अर्थव्यवस्था भरभराकर गिर चुकी है और देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब करीब खत्म हो चुका है।

देश में विदेशी मुद्रा भंडार खत्म
वहीं, श्रीलंका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब देश की मुद्रा, डॉलर के मुकाबले 300 को पार कर गया है और ये बताता है, कि देश की आर्थिक स्थिति काफी ज्यादा खराब हो चुकी है। देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह से खत्म हो चुका है और अब सरकार के अल्पमत में आने के बाद स्थिति और भी ज्यादा खराब हो चुकी है। इससे पहले राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे ने देश की तमाम विपक्षी पार्टियों को सरकार में शामिल होने का न्योता दिया था और मिलकर इस संकट से बाहर निकलने की अपील की थी, लेकिन विपक्ष ने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया था।












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