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Spy Satellite Race: सैटेलाइट रेस में चीन से काफी पिछड़ा भारत, Yaogan से कैसे दुनिया को स्कैन कर रहा ड्रैगन?

Spy Satellite Race: भविष्य की लड़ाई सैटेलाइट्स से ही लड़ी जानी है, क्योंकि अंतरिक्ष से तय होने वाला है, कि किसके पास कितनी शक्ति है और फिलहाल इस रेस में चीन भारत के मुकाबले कम से कम एक दशक आगे निकल गया है। इस वक्त अंतरिक्ष में आपके पास कितनी ताकत है, इसका रणनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है।

अंतरिक्ष से खुफिया (Intelligence), निगरानी (Surveillance) और टोही (Reconnaissance) IRS सैटेलाइट्स जमीन पर किसी देश की सेना की क्या तैयारियां हैं, उसकी जासूसी कर रही हैं। ये सैटेलाइट्स करीब 500 किलोमीटर की ऊंचाई से धरती की परिक्रमा करते हैं और सैन्य गतिविधियों जैसे कि सैन्य टुकड़ियों की आवाजाही और मिसाइल टेस्ट के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

Spy Satellite Race

IRS सैटेलाइट की रेस में कैसे पिछड़ा भारत? (IRS Satellite Race)

युद्ध की स्थिति में ये जानकारियां अमूल्य साबित होती हैं, जिससे दुश्मनों के संसाधनों, हथियार भंडार पर सटीक निशाना लगाया जा सकता है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध में टोही सैटेलाइट्स काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। और भारत और चीन के बीच लगातार तनाव की स्थिति में भी IRS सैटेलाइट्स की भूमिका काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

  • हाल ही में सैटेलाइट तस्वीरों ने भारत-चीन सीमा पर लगातार बदल रहे हालात और सैनिकों की आवाजाही की तस्वीरें भेजी हैं।
  • मई 2024 के अंत में, सैटेलाइट तस्वीरों से ही पता चला था, कि ने तिब्बत में भारतीय सीमा के पास चीन ने J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमानों की तैनाती किया है।
  • इसके अलावा, जुलाई की शुरुआत में सैटेलाइट तस्वीरें सामने आईं थीं, जिनमें चीन को लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास पैंगोंग त्सो झील के किनारे हथियारों और अन्य सैन्य संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए भूमिगत बंकर बनाते हुए दिखाया गया।

वहीं, पिछले साल जुलाई के अंत तक, सैटेलाइट इमेजरी ने पैंगोंग झील के पार एक रणनीतिक पुल के पूरा होने का खुलासा किया था। यह बुनियादी ढांचा, चीन को सैनिकों और उपकरणों को जुटाने में लगने वाले समय को काफी कम कर देता है, जिससे भारत में चिंता बढ़ गई है। हालांकि ये सैटेलाइट तस्वीरें अमेरिका स्थित निजी कंपनियों की तरफ से जारी की गई थीं, लेकिन वे जासूसी उपग्रहों की महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करने की क्षमता और रक्षा योजना में उनकी बढ़ती भूमिका को उजागर करती हैं।

भारत से कितना आगे निकल चुका है चीन?

मिलिंद कलश्रेष्ठ के मुताबिक, अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने के लिए प्रक्षेपण वाहनों के मामले में भारत, चीन के बराबर है। लेकिन जब मानव अंतरिक्ष उड़ान की बात आती है, तो भारत अभी भी काफी पीछे है। इसके अलावा,

  • भारत के उपग्रहों की संख्या चीन की तुलना में काफी कम है। अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी की 2022 की रिपोर्ट में बताया गया है, कि दुनिया की लगभग आधी खुफिया, निगरानी और टोही (IRS) प्रणाली चीनी सेना संचालित करती हैं। यानि, चीन क्या इरादा रखता है, बहुत आसानी से समझा जा सकता है।
  • ये सैटेलाइट्स, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) को कोरिया, ताइवान, हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में रणनीतिक स्थानों की निगरानी करने के काबिल बनाते हैं।
  • वहीं, लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) के लेटेस्ट आंकड़ों से पता चलता है, कि भारत के 26 की तुलना में चीन कम से कम 245 रक्षा और जासूसी उपग्रह संचालित करता है।
  • खास तौर पर, चीन के पास 92 IRS उपग्रह और 81 इलेक्ट्रॉनिक खुफिया और सिग्नल डिटेक्शन के लिए डिजाइन किए गए हैं। इसके विपरीत, भारत के पास सिर्फ 15 IRS उपग्रह और इलेक्ट्रॉनिक खुफिया कार्यों के लिए सिर्फ एक सैटेलाइट है।

यानि, भारत के मुकाबले अंतरिक्ष से निगरानी करने में चीन काफी आगे है।

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चीन के पास ज्यादा संख्या में IRS सैटेलाइट, भारत के लिए कितना खतरनाक?

चीन का सैटेलाइट प्रोग्राम, खास तौर से इसकी याओगन सीरिज (Yaogan series), इसके वैश्विक जासूसी कोशिशों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 2006 में अपनी स्थापना के बाद से, चीन ने 140 से ज्यादा याओगन सर्विलांस सैटेलाइट्स लॉन्च किया है, जिसमें लेटेस्ट याओगन-42 शामिल है।

आधिकारिक तौर पर, इन उपग्रहों को वैज्ञानिक प्रयोगों, जमीनी सर्वेक्षणों, फसल उपज पूर्वानुमानों और आपदा निगरानी के लिए उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना ​​है, कि याओगन प्रोग्राम के पीछे असली इरादा सैन्य है, जिसका उद्देश्य वैश्विक निगरानी है। एक्सेस हब - स्पेस, डिफेंस और सिक्योरिटी के संस्थापक ओमकार निकम ने यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया है, कि "चीन के पास कम्युनिकेशन और पृथ्वी अवलोकन, दोनों क्षेत्रों में सैन्य उपग्रहों का एक सुस्थापित सेट है। टोही उपग्रहों की तियानहुई और याओगन श्रृंखला नवीनतम हैं, जिनका उपयोग मुख्य रूप से खुफिया उद्देश्यों के लिए किया जाता है।"

चीन विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में लगातार और लगभग वास्तविक समय की निगरानी के लिए क्षमताओं को हासिल करने को प्राथमिकता देता है। यह रणनीतिक ध्यान चीन के संभावित सुरक्षा खतरों के आकलन से प्रेरित है।

यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट में सामरिक एवं अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र (CSIS) में एयरोस्पेस सुरक्षा परियोजना के उप निदेशक क्लेटन स्वॉप ने कहा, कि याओगन उपग्रह चीन को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कार के आकार की वस्तुओं का भी पता लगाने और उन पर नजर रखने की अभूतपूर्व क्षमता प्रदान कर सकता है।

स्वॉप ने कहा, कि याओगन उपग्रहों की बढ़ी हुई क्षमताएं चीन को भारतीय और प्रशांत महासागरों में संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगियों की नौसेना बलों को पहले से कहीं अधिक सटीकता के साथ ट्रैक करने में सक्षम बनाती हैं। स्वॉप ने कहा, कि इन उपग्रहों के बेहतर रिज़ॉल्यूशन से चीन न केवल बड़े जहाजों, बल्कि लड़ाकू जेट और बमवर्षक जैसे विमानों सहित छोटी वस्तुओं की भी निगरानी कर सकता है। जबकि, पांचवी पीढ़ी के फाइटर जेट्स में लगाए गये स्टील्थ तकनीक, रडार से विमानों का पता लगाना मुश्किल बना सकती है, यह ऑप्टिकल सेंसर के खिलाफ कम प्रभावी है। यह सीमा तब स्पष्ट हुई, जब 2021 में एक Google मैप्स उपयोगकर्ता ने मिसौरी के ऊपर एक B-2 स्टील्थ बॉम्बर देखा।

भारत की अंतरिक्ष से जासूसी करने की क्षमता कितनी है?

भारत की उपग्रह क्षमताओं में RISAT (रडार इमेजिंग सैटेलाइट) सीरिज शामिल है, जिसका पहला उपग्रह 2009 में लॉन्च किया गया था। आधिकारिक तौर पर, RISAT का मकसद प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी करना और पृथ्वी का निरीक्षण करना था। लेकिन इसकी प्राथमिक भूमिका सीमा पर घुसपैठ का पता लगाना है।

चीन की तरह, भारत भी अपने उपग्रहों का उपयोग सार्वजनिक और संवेदनशील दोनों उद्देश्यों के लिए करने की बात करता है, लेकन भारत भी अपनी सैटेलाइट्स की क्षमताओं के पूरे दायरे को गुप्त रखता है। भारत ने अपने सशस्त्र बलों के लिए मुख्य रूप से वैज्ञानिक उपग्रहों के डेटा पर भरोसा किया है।

  • 2022 तक भारत सरकार ने प्रत्येक सैन्य शाखा के लिए अपने पहले समर्पित कम्युनिकेशन सैटेलाइट्स को मंजूरी नहीं दी थी।
  • अक्टूबर 2024 में, पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की सुरक्षा पर कैबिनेट समिति (CCS) ने अंतरिक्ष-आधारित निगरानी (SBS-III) कार्यक्रम के तीसरे चरण को मंजूरी दी, जिसमें 52 जासूसी उपग्रहों को निचली-पृथ्वी और भूस्थिर कक्षाओं में लॉन्च करना शामिल है।
  • ये 52 जासूसी उपग्रह अगले पांच वर्षों में लॉन्च किए जाएंगे और भारत की 'आसमान में आंख' के रूप में काम करेंगे। हालांकि, इन महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद, भारत को "खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) उद्देश्यों के लिए अपने अंतरिक्ष प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।"

निकम ने इस बात पर भी जोर दिया, कि ध्रुव स्पेस, सैटश्योर, पिक्सल और पियरसाइट स्पेस जैसी निजी कंपनियों की भागीदारी सैन्य उपग्रह क्षेत्र में भारत के लिए एक आशाजनक भविष्य का संकेत देती है। लिहाजा, रेस में भले ही हम पीछे हैं, लेकिन हम लगातार आगे बढ़ रहे हैं और हमारा मकसक चीन को पीछे छोडना है।

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