आर्कटिक के वातावरण में ठोस एरोसॉल मिला, बादल बनने और पर्यावरण पर होने वाला प्रभाव जानिए
मिशिगन (अमेरिका), 29 मार्च: अमेरिका के एक विश्वविद्यालयों ने आर्कटिक महासागगर के वातावरण में ऐसे ठोस एयरोसॉल का पता लगाया है, जिसे शायद अबतक तरल मान लिया जाता था। शोधकर्ताओं के मुताबिक इस अनुसंधान का दूरगामी प्रभाव होगा और भविष्य के पर्यावरण मॉडल तैयार करने में भी मदद मिलेगी। गौरतलब है कि आर्कटिक के वातावरण में दुनिया में सबसे ज्यादा तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे में यहां से प्राप्त जानकारी की मदद से प्रकृति की उथल-पुथल से धरती की दूसरी जगहों के संरक्षण में सहायता मिल सकती है।

ठोस एयरोसॉल बनने की प्रक्रिया तेज होने का अनुमान
अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से जुड़े वैज्ञानिकों के एक नए शोध से पता चला है कि आर्कटिक महासागर में सॉलिड एयरोसॉल कैसे बादल बनने की प्रक्रिया को बदल सकते हैं। शोध में यह भी बता चला है कि दुनिया के सबसे ठंडा महासागर का बर्फ जैसे-जैसे पिघल रहा है, शोधकर्ताओं को लगता है कि समुद्री उत्सर्जन और आमोनिया (पक्षी के चलते) की वजह से ऐसे खास कण ज्यादा तेजी से बनेंगे, जिसकी वजह से बादलों के निर्माण और फिर पर्यावरण पर भी उसका असर पड़ेगा। यह शोध 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकैडमी ऑफ साइंसेज' जर्नल में प्रकाशित हुई है।

आर्कटिक के वातावरण में ठोस एरोसॉल मिला
इस रिसर्च में जुटे यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के एयरोसॉल के वैज्ञानिकों ने जब आर्कटिक के वातावरण से जमा किए गए एयरोसॉल की पड़ताल की तब वह यह जानकर हैरान रह गए कि एयरोसॉलाइज्ड आमोनियम सल्फेट के कण, सामान्य तरल एयरोसॉल की तरह नहीं दिखते थे। एयरोसॉल वैज्ञानिक एंड्र्यू ऑल्ट के साथ काम करते हुए रशेल किरप्स ने पाया कि जिस आमोनियम सल्फेट के कणों को तरल होना चाहिए था, वे वास्तव में सॉलिड फॉर्म में थे। गौरतलब है कि आर्कटिक महासागर दुनिया का सबसे छोटा और उथला होने के साथ-साथ सबसे ठंडा महासागर भी है।

भविष्य के लिए तैयार हो सकेंगे पर्यावरण मॉडल
वैज्ञानिक समझ गए कि ये सॉलिड एयरोसॉल अपनी विशेषताओं की वजह से वर्तमान और भविष्य में आर्कटिक और बाकी जगहों पर भी पर्यावरण के मॉडल का अनुमान लगाने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। रसायन, पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर प्रैट ने कहा,'आर्कटिक दुनिया में किसी भी जगह से सबसे तेजी से गर्म हो रहा है। खुले जल से जितना ज्यादा वातावरण में उत्सर्जन होगा, इस तरह के कण और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे।' उनके मुताबिक यह शोध इतना अहम है, क्योंकि, आर्कटिक वातावरण के मॉडल की सटीकता परखने के लिए हमारे पास बहुत कम जानकारियां हैं। उनका कहना है कि 'ऐसे कणों के बारे में हमने किताबों में भी कुछ नहीं देखा है, न आर्कटिक में या दुनिया में ही कहीं भी।'

आर्कटिक वातावरण दुनिया में सबसे तेजी से बदल रहा है
शोध में जो एयरोसॉल पाए गए हैं, वे 400 नैनोमीटर तक के हैं यानी इंसान के एक बाल के व्यास से भी 300 गुना छोटा। केमिस्ट्री के एसोसिएट प्रोफेसर ऑल्ट का कहना है कि आर्कटिक के एयरोसॉल को आमतौर पर तरल मान लिया जाता, लेकिन यह सॉलिड है। जब वातावरण की सापेक्षिक आर्द्रता 80% तक पहुंच जाती है, तब एक नम दिन में यह कण तरल हो जाता है। प्रैट ने कहा है कि 'हमें उन मॉडलों में वास्तविकता को समझने की जरूरत है जो बादलों और वातावरण को तैयार करते हैं, जो कि आर्कटिक वातावरण के ऊर्जा बजट को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह जगह कहीं और के मुकाबले काफी तेजी से बदल रहा है।' (तस्वीरें- प्रतीकात्मक)
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