BRICS में नहीं होंगे शामिल, भारत आने पर सस्पेंस... रूस से बाहर निकलने में क्यों डर रहे हैं राष्ट्रपति पुतिन?
Vladimir Putin Analysis: एक वक्त हुआ करता था, जब अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की शान हुआ करते थे और उनके आसपास मीडिया और वैश्विक नेताओं का जमावड़ा लगा रहता था, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद कई वैश्विक नेता मॉस्को गये हैं, लेकिन रूसी राष्ट्रपति ने अपने देश से बाहर निकलना बंद कर दिया है।
वैश्विक नेताओं ने व्लादिमीर पुतिन को हमले रोकने के लिए काफी मनाया, लेकिन सारी कोशिशें नाकाम रहीं और अब रूसी राष्ट्रपति ने अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों से दूरी बना ली है। यह उस व्यक्ति के लिए मामूली बात नहीं है, जो 11 टाइम जोन में फैले अपने देश पर शासन करता हो।

रूसी राष्ट्रपति के लिए बीजिंग, मध्य एशिया और ईरान जैसे ही कुछ देश बचे हैं, जहां उनके लिए रेड कार्पेट बिछाया गया है। निश्चित तौर पर इनके अलावा, रूसी राष्ट्रपति के लिए बेलारूस बचा है, जिनके राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको, हर वक्त रूस के साथ खड़े हैं और जिन्होंने रूसी राष्ट्रपति की मेजबानी की है।
अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों से पुतिन ने बनाई दूरी
व्लादिमीर पुतिन इस सप्ताह एक प्रमुख वैश्विक मंच, जोहान्सबर्ग में आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शारीरिक तौर पर अनुपस्थित रहेंगे। उनका कोई शो नहीं होना, जो रूस के दुनिया से हो रहे अलगाव और पुतिन के सिकुड़ते क्षितिज के बारे में बहुत कुछ बताता है।
ब्रिक्स आर्थिक ब्लॉक के अन्य सदस्यों के नेताओं, दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, चीन के नेता शी जिनपिंग, ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ लूला दा सिल्वा और भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, सभी के वहां मौजूद रहने की उम्मीद है।
लेकिन पिछले महीने, रामफोसा के कार्यालय ने कहा, कि पुतिन "आपसी सहमति से" भाग नहीं ले रहे हैं। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव, व्लादिमिर पुतिन की जगह लेंगे, हालांकि रूसी राज्य मीडिया ने कहा है कि पुतिन वीडियो लिंक के माध्यम से कार्यक्रम में जुड़ेंगे।
क्या इससे सचमुच कोई फ़र्क पड़ता है, कि पुतिन अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग नहीं ले रहे हैं? एक्सपर्ट्स का कहना है, कि निश्चित तौर पर फर्क पड़ता है, क्योंकि आप एक देश के प्रतिनिधि हैं।
खासकर ब्रिक्स, जो एक "बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था" मंच है और पुतिन जिसके कट्टर समर्थक हैं, और जिसे पुतिन अमेरिका और यूरोप के लिए प्रतिकार के तौर पर देखते हैं, जिन्होंने यूक्रेन युद्ध के लिए पुतिन की आलोचना की है।
तो फिर पुतिन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं?
एक्सपर्ट्स का कहना है, कि इंटरनेशनल कोर्ट से पुतिन के खिलाफ जो गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है, वो महत्वहीन है और वो कोई मुद्दा नहीं है।
हालांकि, इंटरनेशनल कोर्ट के वारंट ने दक्षिण अफ्रीका को मुश्किल में डाल दिया। हेग कोर्ट का एक सदस्य होने के नाते, दक्षिण अफ्रीका आईसीसी द्वारा दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को गिरफ्तार करने के लिए बाध्य है।
लेकिन, क्या ये कोई सोच सकता है, कि व्लादिमीर पुतिन को जोहान्सबर्ग में सड़क पर गिरफ्तार कर लिया जाएगा। क्योंकि, इससे पहले भी साल 2015 में सूडान के राष्ट्रपति उमर अल-बशीर, जिनके ऊपर नरसंहार जैसे आरोपों में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था, वो दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे और वहां से कार्यक्रम में सम्मेलन होकर बेखौफ होकर बाहर निकले, जबकि इंटरनेशल कोर्ट ने दक्षिण अफ्रीका से सूडानी राष्ट्रपति को गिरफ्तार करने की अपील की थी।
बेशक, क्रेमलिन इस बात पर अड़ा हुआ है, कि पुतिन आईसीसी वारंट के कारण ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से हिस्सा नहीं ले रहे हैं।

लेकिन क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने एक गोपनीय हलफनामे में रामफोसा द्वारा किए गए दावों का खंडन किया है, कि रूस पुतिन की गिरफ्तारी को "युद्ध की घोषणा" के रूप में देखेगा।
वहीं, राज्य समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, पुतिन ने स्वयं 29 जुलाई को पत्रकारों से कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ब्रिक्स में उनकी मौजूदगी "इस वक्त रूस में मेरी उपस्थिति से ज्यादा महत्वपूर्ण है"।
मकसद चाहे जो भी हो, शिखर सम्मेलन में पुतिन का ना आना, मॉस्को के लिए अच्छा नहीं है। क्योंकि, अगले महीने भारत में जी-20 शिखर सम्मेलन भी होना है और अभी तक साफ नहीं है, कि व्लादिमीर पुतिन भारत आएंगे या नहीं, क्योंकि भारत को लेकर रूस का ये बहाना भी नहीं चलेगा, कि पुतिन के खिलाफ अरेस्ट वारंट है।
क्योंकि, भारत अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट का सदस्य नहीं है और भारत, पुतिन को गिरफ्तार करने के लिए बाध्य भी नहीं है।












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