Hormuz को लेकर आर-पार के मूड में पुतिन! रूसी राजदूत ने UN में किया तेहरान का खुला समर्थन
Hormuz Crisis: रूस और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकी ने दुनिया भर की भू-राजनीति में हलचल मचा दी है। संयुक्त राष्ट्र में रूसी राजदूत वसीली नेबेंजिया ने स्पष्ट किया है कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर ईरान का पूरा नियंत्रण है और वह अपनी सुरक्षा के लिए यहां जहाजों की आवाजाही रोक सकता है।
रूस का यह कदम अमेरिका, पश्चिम और भारत जैसे देशों के लिए बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि दुनिया का 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। रूस ने पश्चिमी देशों पर समुद्री डकैती का आरोप लगाते हुए ईरान के फैसले को जायज ठहराया है।

रूस ने क्यों दिया ईरान का साथ?
रूस ने संयुक्त राष्ट्र में खुलकर ईरान का पक्ष लेते हुए कहा कि हमला होने की स्थिति में किसी भी देश को अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा करने का अधिकार है। रूसी राजदूत ने पश्चिमी देशों की तुलना उन समुद्री लुटेरों से की जो अपनी मनमानी को 'कानून' का नाम देते हैं। रूस का मानना है कि ईरान पर बेवजह दबाव बनाया जा रहा है, जबकि वह सिर्फ अपनी सीमाओं की रक्षा कर रहा है। रूस का यह समर्थन सीधे तौर पर अमेरिका को चुनौती देने जैसा है।
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होर्मुज स्ट्रेट का महत्व और संकट
'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है। दुनिया की कुल तेल और गैस सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा यहीं से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा इस रास्ते को ब्लॉक करने से वैश्विक बाजार में ऊर्जा का संकट खड़ा हो गया है। अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने इस रास्ते को अपनी ढाल बना लिया है, जिससे भारत और चीन जैसे तेल आयातक देशों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
ईरान का नया प्रस्ताव और पाकिस्तान की भूमिका
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के जरिए अमेरिका के सामने एक समझौता पेश किया है। ईरान इस जलमार्ग को खोलने के लिए तैयार है, लेकिन उसकी कुछ कड़ी शर्तें हैं। ईरान चाहता है कि अमेरिका उसके बंदरगाहों की नाकेबंदी खत्म करे, मध्य-पूर्व में जारी युद्ध को रोके और परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी चर्चाओं को फिलहाल टाल दे। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ईरान की इन शर्तों से संतुष्ट नहीं है और स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है।
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वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका असर
होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। अगर रूस और ईरान की यह जुगलबंदी लंबे समय तक जारी रहती है, तो पश्चिमी देशों के लिए सप्लाई चेन को सुचारू रखना नामुमकिन हो जाएगा। भारत जैसे देशों के लिए यह दोहरा झटका है, क्योंकि उसे न केवल महंगे तेल की मार झेलनी होगी, बल्कि इस क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव से अपने व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित निकालना भी एक बड़ी चुनौती होगी।












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