रूस ने भारतीय मीडिया से जताई कड़ी नाराज़गी, कही कई बातें

रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़
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रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़

रूस इन दिनों भारतीय मीडिया से ख़ासा नाराज़ है. रूसी विदेश मंत्रालय ने भारतीय मीडिया में कज़ाख़स्तान और यूक्रेन की कवरेज को लेकर भारतीय मीडिया को आड़े हाथों लिया है.

रूस ने पहली आपत्ति सात जनवरी को कज़ाख़स्तान में अपने सैनिकों को भेजने को लेकर भारतीय मीडिया में जिस तरह से रिपोर्ट छपी, उस पर जताई. यह आपत्ति भारत स्थित रूसी दूतावास की तरफ़ से जताई गई है. रूस का कहना है कि भारतीय मीडिया कज़ाख़स्तान में रूसी सैनिकों के जाने को लेकर पूरा सच नहीं बता रहा है.

रूसी दूतावास की तरफ़ से जारी प्रेस नोट में लिखा गया है, ''कज़ाख़स्तान में जब हिंसा भड़की और वहां राजनीतिक अस्थिरता का संकट मंडराता हुआ दिखा, तब हमारी नज़र बनी हुई थी. कज़ाख़स्तान हमारा दोस्त मुल्क है और रूस के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी है. वहाँ भड़की हिंसा देश की सुरक्षा और अखंडता को बाधित करने की कोशिश थी. इसमें प्रशिक्षित और संगठित बाहरी समूहों का इस्तेमाल किया गया. कज़ाख़स्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव ने कलेक्टिव सिक्यॉरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन (सीएसटीओ) के तहत मदद मांगी. छह जनवरी को CSTO कलेक्टिव पीसकीपिंग फ़ोर्स भेजा गया.''

https://twitter.com/mfa_russia/status/1479906498893463556

रूस की आपत्ति क्या है

रूसी दूतावास ने लिखा है, ''CSTO के कलेक्टिव सिक्यॉरिटी काउंसिल 2022 के चेयरमैन आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान हैं और उन्होंने कज़ाख़स्तान में कलेक्टिव पीसकीपिंग फ़ोर्स भेजने को लेकर बयान जारी किया था. इस बयान में कहा गया था- बाहरी हस्तक्षेप के कारण कज़ाख़स्तान की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़तरे को देखते हुए कलेक्टिव सिक्यॉरिटी काउंसिल के अनुच्छेद चार के मुताबिक़ छोटी अवधि के लिए पीसकीपिंग फ़ोर्स भेजने का फ़ैसला किया गया है. इस फ़ोर्स को भेजने के पीछे कज़ाख़स्तान में स्थिरता लाना है.''

रूसी विदेश मंत्रालय ने भी भारतीय मीडिया में इस 'सच' को नहीं बताने पर आपत्ति जताई है. रूसी विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है, ''15 मई, 1992 को कलेक्टिव सिक्यॉरिटी ट्रीटी पर सहमति बनी थी और इसके अनुच्छेद चार के अनुसार, सदस्य देशों में स्थिरता कायम रखने और राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता पर बाहरी हमले को बचाने के लिए सदस्य देश के अनुरोध पर सैन्य और अन्य तरह की मदद भेजी जाएगी.''

''CSTO पीसकीपिंग फ़ोर्स की तैनाती तभी होगी जब सभी सदस्यों के बीच आम सहमति होगी. कज़ाख़स्तान के मामले में ऐसा ही हुआ है. 6 जनवरी को कज़ाख़स्तान में भेजे गए पीसकीपिंग फ़ोर्स में रूसी सैनिकों के अलावा आर्मीनिया, बेलारूस, कीर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के सैनिक भी शामिल हैं. सात जनवरी को कज़ाख़स्तान के अधिकारियों ने बयान जारी किया कि क़ानून-व्यवस्था बहाल कर दी गई है.''

https://twitter.com/RusEmbIndia/status/1479484492767109121

यूक्रेन पर रूस के तर्क

लेकिन रूस का ग़ुस्सा भारतीय मीडिया में कज़ाख़स्तान संकट में रूस की भूमिका पर कवरेज तक ही सीमित नहीं रहा. नौ जनवरी को रूसी विदेश मंत्रालय ने एक और बयान जारी किया. रूसी विदेश मंत्रालय ने इस बार यूक्रेन संकट पर भारतीय मीडिया की कवरेज की तीखी आलोचना की.

रूसी विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिखा है, ''भारतीय मीडिया में एक बार फिर से यूक्रेन संकट और रूस के रुख़ को लेकर पक्षपाती तस्वीर छपी है. भारतीय मीडिया में यूक्रेन के अधिकारियों का अपमानजनक बयान भी छपा है. हमारा मानना है कि भारतीय मीडिया में यूक्रेन संकट को लेकर छपी पक्षपाती सामग्री का भारत सरकार के आधिकारिक रुख़ से कोई लेना-देना नहीं है. साथ ही जाने-माने विशेषज्ञों की राय भी भारतीय मीडिया की कवरेज से अलग है. इन सबके बीच हम पूरे मामले पर तथ्यों को रख रहे हैं.''

रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा है, ''रूस किसी भी देश के लिए ख़तरा नहीं है. हम अधिकतम संयम बरतते हैं. ज़ाहिर है कि हमारा इरादा भाई समान यूक्रेन के लोगों से लड़ना नहीं है. हम इस विवाद का कोई सैन्य समाधान भी नहीं चाहते हैं. यह बात कई बार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और विदेश मंत्री सर्गेई लावरोफ़ ने दोहराई है. हम इस मामले में अंतरराष्ट्रीय समुदाय समेत भारत के लोगों को भी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि यूक्रेन की सरकार अपने ग़लत फ़ैसलों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है.''

रूसी राष्ट्रपति पुतिन
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रूसी राष्ट्रपति पुतिन

रूसी विदेश मंत्रालय ने लिखा है, ''दरअसल, यह यूक्रेन की सेना है जो पिछले आठ सालों से अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध कर रही है. 2001 में इन्होंने 1,923 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया. बेगुनाहों पर इन्होंने गोलीबारी की. यूक्रेन में रूसी भाषा बोलने वालों को लगातार वंचित किया गया. इन्हें स्कूलों और आम जनजीवन में रूसी भाषा का इस्तेमाल करने पर रोका गया.''

रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा है, '' हम देख रहे हैं कि यूक्रेन की सरकार अमेरिका और अन्य नेटों देशों से सैन्य मदद ले रही है. 2014 से अब तक अमेरिका ने यूक्रेन की सेना पर 2.5 अरब डॉलर का ख़र्च किया है. 2002 में 30 करोड़ डॉलर अलग से आवंटित किया गया. नेटो के सदस्य देश रूस के ख़िलाफ़ यूक्रेन में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं.''

''यूक्रेन में ये सैन्य ठिकाना बना रहे हैं और सैन्य अभ्यास भी कर रहे हैं. इस तरह के सात सैन्य अभ्यास यूक्रेन में हुए हैं. रूस पर आरोप लग रहा है कि यूक्रेन की सीमा पर हम सैनिकों की तैनाती कर रहे हैं. किसी भी संप्रभु देश के पास ये अधिकार होता है कि अपने क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती करे. हमने कोई भी अंतरराष्ट्रीय नियम का उल्लंघन नहीं किया है. हम अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी करने का अधिकार रखते हैं.''

अमेरिका और रूस
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अमेरिका और रूस

यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैनिक

यूक्रेन की सीमा पर रूस ने हज़ारों की संख्या में सैनिकों की तैनाती कर रखी है. अमेरिका का कहना है कि रूस यूक्रेन पर कभी भी हमला कर सकता है. हालांकि रूस इससे इनकार करता रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को चेतावनी दी है कि अगर यूक्रेन पर रूस ने हमला किया तो भारी क़ीमत चुकानी होगी.

यूक्रेन का विवाद चल ही रहा था कि कज़ाख़स्तान में हिंसा भड़क उठी और रूस ने वहाँ अपने सैनिकों को भेज दिया. अमेरिका ने इसे लेकर कड़ी आपत्ति जताई है. अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा है कि रूस एक बार जहां जाता है, वहाँ से आसानी से हटता नहीं है. यूक्रेन और कज़ाख़स्तान दोनों पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे हैं.

(कॉपी - रजनीश कुमार)

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