भगवान बुद्ध पर आया 'रहम' ? दुर्लभ खजाना पाने के लिए चीन को तेल लगाने में जुटा तालिबान
काबुल, 27 मार्च: अफगानिस्तान के तालिबान शासक अब अपने देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए उस दुर्लभ प्राकृतिक खजाने को निकालने की उम्मीदों में बैठे हैं, जो जमीन के सैकड़ों मीटर भीतर गड़े हुए हैं और इसके लिए उन्हें चीन पर बहुत ज्यादा भरोसा है। अफगानिस्तान के जिस इलाके में दुनिया का सबसे विशाल तांबा भंडार मौजूद है, उसी इलाके में भगवान बुद्ध की ध्यान की मुद्राओं वाली हजारों साल पुरानी मूर्तियां और बाकी पुरातत्व महत्त्व की चीजें भी में गुफाओं में पड़ी हुई हैं। आज जिस तरह से तालिबान के आतंकी उस चट्टानी पहाड़ियों की रक्षा कर रहे हैं, एक समय ऐसा भी था जब यही माना जाता कि वे अफगानिस्तान से भगवान बुद्ध का अस्तित्व पूरी तरह से मिटाकर ही दम लेना चाहते हैं।

भगवान बुद्ध पर आया तालिबान को 'रहम' ?
करीब दो दशक पहले जब अफगानिस्तान पर कट्टर तालिबानियों का कब्जा हुआ था, तब इसने मुल्क के दूसरे इलाकों में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को तबाह कर दिया था। उन घटनाओं की हिंसक यादें आज भी विश्व के दिलों-दिमाग में दफन हैं। तब अहिंसा के प्रतीक के प्रति अपनी इस इस हिंसक प्रवृत्ति के पीछे वे इस्लाम में बुतपरस्ती पर रोक की दलील देते थे। लेकिन, आज वही तालिबान राजधानी काबुल से कुछ किलोमीटर दूर देश के मेस अयनक घाटी में मौजूद तांबे की खान के पास बचे उसी भगवान बुद्ध से जुड़े अवशेषओं को संरक्षित करके रखने की कोशिश कर रहे हैं। एसोसिएट प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस जगह के सिक्योरिटी चीफ हकुमुल्ला मुबारिज ने कहा है कि उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें चीन से अरबों का निवेश चाहिए। उसने कहा, 'उनकी रक्षा करना हमारे लिए और चीनियों के लिए बहुत ही जरूरी है।'

मेस अयनक घाटी में दबा पड़ा है दुर्लभ खजाना
तालिबान के इस 'हृदय परिवर्तन' के पीछे वहां की जमीन के नीचे दबे अनुमानित 1 ट्रिलियन डॉलर के तांबे का दुर्लभ खजाना है, जो हिंसा और युद्ध में तबाह हो चुके मुल्क के लिए अंतिम उम्मीद नजर आ रही है। अमेरिका के जाने के बाद अफगानिस्तान के इस विशाल खजाने पर चीन ही नहीं, ईरान, रूस और तुर्की जैसे देशों की भी नजरें अटकी हुई हैं। लेकिन, इनमें चीन की स्थिति हर लिहाज से सबसे ज्यादा सशक्त है। तालिबान शासन में मेस अयनक घाटी में विशाल खनन प्रोजेक्ट शुरू करने वाला चीन सबसे बड़ी शक्ति है। दरअसल, हामिद करजई के सरकार के दौरान ही, चीन की एक कंपनी एमसीसी के साथ अफगानिस्तान ने मेस अनयक से उच्च-श्रेणी के तांबा खनन का 30 साल का करार किया था। शोध से पता चला है कि उस इलाके में 12 मिलियन टन खनिज संपदा दबी पड़ी है। लेकिन, लगातार हिंसा की वजह से 2014 में यह काम अटक गया था और चाइनीज कंपनी के स्टाफ भाग गए थे।

मौके का भरपूर फायदा उठाना चाहता है ड्रैगन
अब, अफगानिस्तान तालिबान के कब्जे में है, अमेरिकी सैनिक जा चुके हैं। मुल्क कई तरह की अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों से बेहाल है। ऐसे में तालिबानियों के खनन और पेट्रोलियम मंत्री शहाबुद्दीन दिलावर ने अपने स्टाफ से कहा है कि वह फिर से चीनी कंपनी को बुलाकर खनन शुरू करने को कहें। उन्होंने चीनियों से 2008 के करार में अपनी तरफ से कोई बदलाव नहीं करने का भी वादा किया है। आने वाले दिनों में चीन की टेक्निकल टीम भी पहुंचने वाली है। उनके सामने गुफाओं में दबी-पड़ी उन कलाकृतियों के बिना किसी नुकसान के शिफ्ट करने की भी चुनौती है। वैसे अब चीन की कंपनी शर्तों में थोड़ी और रियात की भी कोशिशों में जुट चुकी है। इस संबंध में तालिबान के विदेशी संबंध मंत्रालय के प्रमुख जैद रशीदी ने कहा भी है, 'चीनी कंपनियां मौजूदा हालात को अपने लिए माकूल मान रही हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगियों की बहुत ज्यादा कमी है और सरकार की ओर से बहुत ज्यादा सपोर्ट मिल रहा है।'

अफगानिस्तान के सामने बदहाली से उबरने का एकमात्र रास्ता
तालिबानी तेल लगाने पर तुले हुए हैं, चीन की पैंतरेबाज सरकार इसे अच्छी तरह से महसूस कर रही है। अफगानिस्तान में चीन के राजदूत ने कहा है कि बातचीत चल रही है, लेकिन इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। लेकिन, सच्चाई ये है कि दुर्लभ खनिज पर कब्जा करना चीन की वैश्विक रणनीति का एक अहम हिस्सा है। मेस अयनक के ठेके से तालिबान को सालाना 25 से 30 करोड़ डॉलर राजस्व मिलने की संभावना है, जिसमें 17% का इजाफा हुआ है। सरकारी और कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक इसके अलावा फीस के रूप में भी 80 करोड़ डॉलर प्राप्त होंगे। भूख से तड़पते अफगानिस्तान के लिए तालिबान को इससे ज्यादा इंतजार किस बात की हो सकती है।

मेस अयनक क्या है ?
मेस अयनक 2,000 साल पुराना बौद्ध शहर है, जिसे अब अफगानिस्तान के आर्थिक इंजन बनाने की संभावना तलाशी जा रही है। यह काबुल से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यहां की पहाड़ियों के नीचे रेतीली मिट्टी में बौद्ध इतिहास भी छिपा है। लेकिन, साथ ही साथ यह तांबे के लिए इतना समृद्ध है कि सुबह की धूप में हरे रंग में चमकते दिखाई पड़ते हैं। लेकिन, इसका खतरनाक आधुनिक इतिहास अब हजारों साल पुराने पुरातत्व की खोज और खनिजों से भरी खदानों से मुल्क के विकास के दोराहे पर खड़ा है। इस खजाने की खोज 1960 की दशक में फ्रांस के एक जियोलॉजिस्ट ने की थी। इस जगह के बारे में मान्यता है कि यह इस सदी की शुरुआती वर्षों में सिल्क रूट (व्यापार मार्क) का एक महत्वपूर्ण स्थान था। 1970 के दशक के अंत में जब यहां सोवियत संघ ने हमला किया तो रूसियों ने यहां के पहाड़ों के पास तांबे का पता लगाने के लिए सुरेंगें खोद डालीं। उसके निशान आज भी मौजूद हैं। बाद में इसका अल-कायदा के आतंकियों ने खूब इस्तेमाल किया और 2001 में कम से कम एक बार अमेरिकी बमबारी का भी शिकार बना। बाद में लुटेरे यहां के कई अनमोल पुरावशेष लूट ले गए। फिर भी आर्कियोलॉजिस्ट ने यहां पर पुरातत्व महत्त्व की अनेक चीजों की खोज की हैं।

क्या तालिबान का हो गया हृदय परिवर्तन ?
बदले हालातों में अब तालिबान ही इस स्थान की संरक्षण की बात कह रहा है। वह ओपन-पिट माइनिंग से भी इनकार कर रहा है, जिससे यह साइट पूरी तरह से तबाह हो सकती है। खनन के लिए बाकी विकल्पों पर भी चर्चा हो रही है। यहां से निकाले जाने वाले अवशेषों को मुख्य रूप से काबुल संग्राहलय में सहेजकर रखे जाने की संभावना है। दिलावर ने कहा है, 'हमने पहले ही कुछ कलाकृतियों को राजधानी भेज दिया है और हम बाकियों को भी वहां पहुंचाने पर काम कर रहे हैं, जिससे कि खनन का काम शुरू किया जा से। '












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