नेपाली पीएम शेर बहादुर देउबा के भारत दौरे के बाद अब क्यों उठ रहे हैं सवाल

नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने हाल ही में भारत का तीन दिन का दौरा किया था. इस दौरान उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की और कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए.

questions arising now after Nepalese PM Sher Bahadur Deubas visit to India

हालांकि, भारत के दौरे के दौरान प्रधानमंत्री देउबा की बीजेपी प्रमुख से शिष्टाचार मुलाक़ात और सीमा विवाद पर संयुक्त बयान न जारी करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं. नेपाल और भारत में ये भी कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री देउबा ने ऐसा करके प्रोटोकॉल तोड़ा है.

इन मुद्दों को करीब से देखने वाले कुछ पूर्व राजनयिकों का कहना है कि इनका अर्थ सामान्य नहीं है.

हालांकि कुछ लोगों ने कहा है कि कूटनीति में विशेष परिस्थितियों में शिष्टाचार के नियमों को तोड़ना स्वाभाविक है और नेताओं को संदेह करने का मौका नहीं देना चाहिए.

बीजेपी मुख्यालय जाने पर उठते सवाल

नेपाल की सरकार के प्रमुख के रूप में दिल्ली की अपनी आधिकारिक यात्रा के पहले दिन ही देउबा भारत की केंद्र सरकार में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय जा पहुंचे. इस दौरान देउबा ने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाक़ात की.

इस मुलाक़ात के बाद देउबा पर राजनयिक गरिमा को गिराने का आरोप लगने लगा जिसके बाद नेपाल के विदेश मंत्री उनके बचाव में आए.

देउबा के बीजेपी कार्यालय के दौरे पर सफ़ाई देते हुए विदेश मंत्री नारायण खड़का ने कहा कि देउबा बीजेपी कार्यालय प्रधानमंत्री नहीं बल्कि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से गए थे.

नेपाल के पूर्व राजदूत मोहन कृष्ण श्रेष्ठ कहते हैं कि देउबा की बीजेपी कार्यालय की यात्रा पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर ही हो सकती है क्योंकि वो देश के प्रधानमंत्री भी हैं.

श्रेष्ठ ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि भारत के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता से मुलाक़ात नहीं की. वो कहते हैं, "किसी देश की यात्रा के दौरान विपक्ष के नेता से मुलाक़ात करना एक नियमित प्रक्रिया है. अगर वो विपक्ष के नेता से मुलाक़ात करते तो यह बहुत संयमित होता."

"लेकिन मुझे यह नहीं मालूम है कि प्रधानमंत्री बीजेपी के कार्यालय में अपने आधिकारिक दौरे की हैसियत से गए थे या नहीं. सरकार के प्रमुख का प्रोटोकॉल बहुत ऊंचा होता है."

नेपाली कांग्रेस के नेता और भारत में नेपाल के राजदूत रहे दीप कुमार उपाध्याय कहते हैं कि यह दौरा भले ही प्रोटोकॉल से अलग रहा हो लेकिन नेपाल-भारत के संबंध में अगर इस मुलाक़ात से लोगों को कुछ राहत मिलती है तो फिर नतीजे पर भी गौर करना चाहिए.

बातचीत के नोट लेते वक़्त कोई नहीं था

देउबा और मोदी के बीच द्विपक्षीय बातचीत के दौरान पीएम मोदी के पीछे एक महिला अधिकारी नोट बनाती नज़र आ रही हैं जबकि देउबा के साथ कोई नहीं है और वो अकेले बैठे हैं.

इस तस्वीर के सामने आने के बाद इस पर भी काफ़ी सवाल खड़े किए जा रहे हैं. कई लोगों का कहना है कि द्विपक्षीय वार्ता के दौरान यह नेपाल के गंभीर न होने को दिखाता है.

भारत में नेपाल के राजदूत रह चुके नेपाली कांग्रेस नेता दीप कुमार उपाध्याय कहते हैं कि इस दौरान 'देश की कमज़ोरी' देखी गई. उनका कहना था कि हाल ही में ऐसा कई बार देखा गया है.

उनका मानना है कि द्विपक्षीय मुद्दों पर भारत के मुक़ाबले नेपाल का ध्यान अधिक केंद्रित रहा होगा. वो कहते हैं कि हर नई बातचीत के दौरान और सरकार के 'संस्थागत ज्ञान' के लिए बातचीत के नोट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं.

उन्होंने कहा, "विदेश नीति, सुरक्षा नीति को परिभाषित करना और नियमों का पालन करना, विदेश मंत्रालय को महत्व देना नेपाल में नहीं देखा जाता है."

उपाध्याय कहते हैं कि इस तरह की परिस्थिति द्विपक्षीय वार्ता में दूसरे पक्ष को गंभीरता से नहीं लेने की समस्या को दिखाता है.

संयुक्त बयान क्यों नहीं आया?

देउबा की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने सीमा विवाद पर कोई संयुक्त बयान जारी नहीं किया.

हालांकि यह माना जा रहा है कि देउबा ने सीमा विवाद का मुद्दा उठाया था, जिस पर नेपाल में कई लोगों ने दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन संयुक्त संवाददाता सम्मेलन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में कुछ नहीं कहा था.

विदेश मंत्री खड़का ने संवाददाताओं से कहा था कि सीमा मामलों पर उनका संबोधन एक 'स्थापित तंत्र' के ज़रिए होगा.

कुछ राजनयिकों का कहना है कि सीमा विवाद पर संयुक्त बयान आपसी विश्वास को दर्शाता है.

पूर्व विदेश मंत्री भेष बहादुर थापा ने कहा कि संयुक्त बयान के न होने का मतलब यह नहीं था कि कुछ भी नहीं हुआ था या कुछ भी छिपा नहीं था.

उनका कहना है, "क्या चर्चा हुई, क्या सहमति हुई, क्या विवादित हुआ या किस पर रोक लगा दी गई, यह सभी मुद्दे विदेश मंत्री के बयान तक ही सीमित हैं."

हालांकि, उन्होंने कहा कि सार्वजनिक तौर पर यह सूचना जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि बातचीत केवल सद्भाव के स्तर पर हुई थी.

(ये कहानी बीबीसी नेपाली से ली गई है)

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