इकोनॉमी, स्ट्रैटजी और डिफेंस... भारत और अमेरिका के बीच होने वाले समझौते गेमचेंजर कैसे साबित होंगे?
Indo-US ties: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका के राजकीय यात्रा पर रवाना हो चुके हैं और 21 जून की रात करीब डेढ़ बजे वो न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर उतरेंगे। प्रधानमंत्री मोदी को भेजे गये आधिकारिक न्योते में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस यात्रा का मकसद द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने और लोकतंत्र से लोकतंत्र का मिलान बताया था।
इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी कांग्रेस की एक संयुक्त बैठक को दूसरी बार संबोधित करेंगे और ये एक ऐसा सम्मान है, जो पीएम मोदी से पहले विंस्टन चर्चिल, नेल्सन मंडेला और इज़राइल के प्रधानमंत्रियों बेंजामिन नेतन्याहू और यित्ज़ाक राबिन सहित कुछ ही नेताओं को दिया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले 8 जून 2016 को कांग्रेस की संयुक्त बैठक को संबोधित किया था।
दोनों देशों के बीच आर्थिक जुड़ाव
भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के केंद्र में आर्थिक जुड़ाव काफी गहरा रहा है और द्विपक्षीय संबंधों को "वैश्विक रणनीतिक साझेदारी" तक बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों का संकल्प है। जबकि संबंध साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर हितों के मिलान से स्थापित है।
भारत और अमेरिका के बीच के आज के संबंधों को देखें, तो ये आश्चर्यजनक लगता है, क्योंकि सिर्फ 25 साल पहले भारत पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए थे।
लेकिन, अब प्रधानमंत्री मोदी की राजकीय यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब दोनों देशों के बीच व्यापार का मूल्य रिकॉर्ड 191 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिससे अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है। भारत के लिए, अमेरिका के साथ व्यापार स्थिति का अनुकूल संतुलन सुकून देने वाला है, यह देखते हुए कि भारत के ज्यादातर अन्य प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के साथ भारत का व्यापार समीकरण का प्रतिकूल संतुलन है। अमेरिका के लिए भारत, नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
अमेरिकी कंपनियों ने भारत में विनिर्माण से लेकर दूरसंचार और उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर एयरोस्पेस तक के क्षेत्रों में लगभग 60 अरब डॉलर का निवेश किया है। और भारतीय कंपनियों ने आईटी, फार्मास्यूटिकल्स और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अमेरिका में 40 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल (यूएसआईबीसी) के वार्षिक भारत विचार शिखर सम्मेलन के अपने संबोधन में भी इसका जिक्र किया है।
भारत के निवेश से अमेरिका में 4 लाख 25 हजार नई नौकरियों का सृजन हुआ है।
फरवरी में, एयर इंडिया ने 200 से ज्यादा बोइंग विमानों की खरीद की घोषणा की थी, जो एक ऐतिहासिक सौदा है और जिसके बारे में राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा था, कि "44 राज्यों में दस लाख से ज्यादा नौकरियां अमेरिका में उत्पन्न होंगी।" माना जा रहा है, कि चुनावी अभियान में बाइडेन इसका फायदा उठा सकते हैं।
वहीं, यूएसआईबीसी कार्यक्रम में, ब्लिंकन ने कहा, कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने "राष्ट्रपति बाइडेन के 21 वीं शताब्दी के 'परिभाषित संबंध' को और मजबूत किया है।"

भारत-अमेरिका में स्ट्रैटजिक संबंध
भारत और अमेरिका के बीच के संबंधों में बनी मजबूती का व्यापक आधार रणनीतिक है, जिसमें दोनों साझेदार चीन पर नज़र रखते हुए आपसी जुड़ाव को बढ़ा रहे हैं। इस सहयोग के केंद्र में रणनीतिक निर्भरता को कम करते हुए विश्वसनीय देशों के साथ आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और उन्हें मजबूत करने पर जोर देना है।
दोनों देशों की सरकारें विभिन्न स्तरों पर 50 से ज्यादा द्विपक्षीय वार्ता तंत्रों को आगे बढ़ा रही हैं।
-- भारत और अमेरिका रणनीतिक ग्रुप QUAD का हिस्सा हैं। साल 2004 के हिंद महासागर सूनामी के बाद क्वाड एक व्यापक साझेदारी के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन चार देशों का या संगठन अब अपनी रणनीतिक महत्व के लिए जाना जाता है। भारत और अमेरिका के अलावा इसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। इसका मकसद मुख्य तौर पर इंडो-पैसिफिक में चीन की आक्रामकता को काउंटर करना है और हिंद महासागर, प्रशांत महासागर में एक आजाद नेविगेशन की स्थापना करना है।
-- QUAD के अलावा भारत, अमेरिका के साथ I2U2 में भी जुड़ा हुआ है, जिसमें इन दोनों के अलावा संयुक्त अरब अमीरात और इजराय हैं। इसे खाड़ी देशों का क्वाड कहा जाता है। इसका लक्ष्य जल, ऊर्जा, परिवहन, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा में संयुक्त निवेश और नई पहल पर केंद्रित है।
-- इसी साल जनवरी में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और अमेरिकी एनएसए जैक सुलिवन ने महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर एक नई यूएस-भारत पहल शुरू की। जिसे iCET कहा जाता है। दोनों देशों के बीच किया गया ये एक ऐतिहासिक समझौता है, जिससे भारत को अमेरिका ने आधुनिक टेक्नोलॉजी देने का डील किया है। वहीं, इसी साल मार्च में अमेरिका की वाणिज्य सचिव जीना रायमोंडो की यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने निजी क्षेत्र के सहयोग के माध्यम से सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला को अधिक लचीला बनाने के लिए एक साझेदारी स्थापित की है।
इसके तहत दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग एग्रीमेंट किया गया है, जिससे नई दिल्ली को तीन मुख्य फायदे होने वाले हैं।
1- भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में केन्द्रीय भूमिका में आ जाएगा और भारत में चिप निर्माण सेक्टर में तेज इजाफा होगा।
2-- भारत सरकार ने चिप निर्माण इंडस्ट्री को बढ़ावा देन के लिए 10 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, जिसका मकसज चिप इंडस्ट्री को मुख्य खिलाड़ी बनाने की है, जिससे भारत अमेरिका और चीन के बाद चिप इंडस्ट्री का हब बन सकता है।
3-- इसके अलावा, चिप इंडस्ट्री के लिए भारत को अमेरिका से सेमीकंडक्टर चिप्स के लिए सोर्सिंग आपूर्ति आधार में विविधता लाने में मदद मिलेगी। अमेरिका पहले से ही तीन अन्य शीर्ष सेमीकंडक्टर निर्माताओं, ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ 'चिप 4' गठबंधन की पहल कर रहा है। सितंबर 2021 में, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने "सेमीकंडक्टर्स और उनके घटकों तक सुरक्षित पहुंच के लिए" एक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला पहल स्थापित करने की योजना की घोषणा की थी। लिहाजा, इसकी काफी संभावना है, कि भारत भी 'चिप-4' गठबंधन का हिस्सा बन सकता है और इसकी तेज चर्चा चल रही है।
-- वहीं, रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच कई समझौते देख जाने की संभावना है, जो पहले से मौजूद द्विपक्षीय सहयोग ढांचे पर आधारित है। भारत और अमेरिका के बीच बख़्तरबंद वाहनों, गोला-बारूद और हवाई युद्ध जैसे क्षेत्रों में सहयोग में सौदा शामिल हो सकता है। इसके अलावा भारत में जेट इंजन के निर्माण पर भी सहमति बन गई है। जेट इंजन का भारत में निर्माण होना ही अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि आगे जाकर भारत जेट इंजन को अपने स्पेस रॉकेट्स और स्पेसक्राफ्ट्स में इस्तेमाल कर सकता है।
व्यापार बाधा का हो पाएगा समाधान?
-- अमेरिका के पास अभी भी भारत पर महत्वपूर्ण निर्यात नियंत्रण है (1998 के परमाणु परीक्षण के बाद स्थापित), जो टेक्नोलॉजी के मुक्त हस्तांतरण को रोकता है। और अगर जेट इंजन सौदा होता है, तो इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी मिलना जरूरी होगा।
-- जिन बकाया व्यापार मुद्दों के समाधान की आवश्यकता है, उनमें वीज़ा में देरी और 2019 में सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीएसपी) कार्यक्रम के तहत भारत के व्यापार लाभों को रद्द करना शामिल है। (ट्रंप प्रशासन ने लिया था फैसला)
अमेरिका ने उस दौरान भारत की व्यापार नीति के अत्यधिक संरक्षणवादी होने की शिकायत की थी और अमेरिका ये शिकायत अभी भी जारी है। अमेरिका की बार बार शिकायत ये होती है, कि भारत सरकार भारत की कंपनियों की रक्षा को ध्यान में रखते हुए ऐसी पॉलिसी के सहारे चलती है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को भारत में व्यापार करना काफी मुश्किल होता है।
दशकों से चली आ रही टैरिफ को कम करने की पिछली नीति को उलटते हुए भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में टैरिफ बढ़ा रहा है।
इसके पीछे भारत का मकसद ये है, कि विदेशी कंपनियां किसी और देश में निर्माण कर भारत में बेचने के बजाए भारत में ही निर्माण करे। जैसा की टेस्ला के साथ विवाद चलता रहा है। वहीं, भारत सरकार, भारतीय कंपनियों को उस मजबूती तक ले जाना चाहती है, जहां से वो किसी और विदेशी कंपनियों का मुकाबला कर सके।
लेकिन, भारत की इस नीति की आलोचना की जाती है और अमेरिका का कहना है, कि भारत इस रवैये को हटाए और अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार को पूरी तरह से खोले। लिहाजा देखना दिलचस्प होगा, कि क्या भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर जो ये तनातनी कई सालों से चली आ रही है, क्या वो खत्म हो पाएगी?












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