'पीरियड्स से इतना परेशान हुई कि गर्भाशय ही निकलवा दिया'

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महीने के 'कुछ दिनों' में लूसी एक अलग ही इंसान बन जाती थीं- उन्हें कई तरह की मानसिक और शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था. वो खुद नहीं समझ पा रही थीं कि कुछ दिन के लिए उन्हें क्या हो जाता है.

लूसी ने कई साल एक ऐसे डॉक्टर की तलाश की जो उन्हें उनकी समस्या के बारे में कुछ बता सकें. और फिर 28 साल की उम्र में उन्होंने अपना गर्भाशय ही निकलवा दिया.

लूसी कहती हैं, "सुबह उठने से पहले ही मैं जान पाती थी कि दिन सामान्य नहीं रहेगा. एक वक्त तो ऐसा था कि मैं डॉक्टर के पास गई और उनसे कहा कि मुझ पर किसी प्रेतात्मा का साया है."

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यौवन तक पहुंचने से पहले लूसी शांत, खुशमिजाज़ और एक लापरवाह बच्ची थी. 13 साल की उम्र से ही उन्हें डिप्रेशन (अवसाद), चिंता और तनाव के दौरे पड़ने लगे थे.

वो खुद को नुक़सान पहुंचाने लगीं और उन्हें अधिक मूड स्विंग्स होने लगे. इस कारण उन्हें स्कूल से निकाल कर युवाओं के मानसिक अस्पताल में रखा गया.

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'मां बनी तो तनाव के लक्षण ग़ायब हो गए'

लूसी कहती हैं, "मुझे पता चला कि मुझे पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिज़ॉर्टड (गंभीर तनाव) और ऑबसेसिव कंपल्सिव डिज़ॉर्डर (ओसीडी) है." लेकिन इनके लक्षणों से कुछ भी हर महीने दिखने वाले लूसी के लक्षणों से मेल नहीं खा रहा था.

16 साल की उम्र में उनके लिए चीज़ें उस वक्त पूरी तरह से बदल गईं जब वो मां बनने वाली थीं.

लूसी कहती हैं, "गर्भाधान के कुछ महीनों में मैंने अस्पताल छोड़ दिया. तनाव के सभी लक्षण ग़ायब हो गए. मैं खुश थी, मुझे अच्छा लग रहा था और आश्चर्य की बात थी लेकिन मैं मानसिक तौर पर सामान्य महसूस कर रही थी."

गर्भाधान और उसके बाद जब तक लूसी बच्चे को दूध पिलाती रहीं तब तक वो सामान्य रहीं, उसके बाद पीरीयड्स लौटे और तनाव के दौरे भी.

कुछ साल बाद लूसी के आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में दाख़िला लिया, लेकिन हर महीने आने वाला तनाव उनके लिए इतना अधिक था कि उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी. उसके बाद उन्होंने टीचिंग असिस्टेंट बनने के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक योग्यता के कार्यक्रम में दाख़िला लिया और तनाव के बीच दो महीने पढ़ाई करने के बाद कार्यक्रम पूरा नहीं कर पाईं.

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'मैं आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगी'

23 साल की उम्र में लूसी फिर मां बनीं और इस बार भी पहले की तरह वो खुद को सामान्य अनुभव करने लगीं. लेकिन कुछ महीनों के बाद उनके पुराने लक्षण लौट आए और इस बार वो पहले से अधिक गंभीर थे. उन्हें जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द रहने लगा, वो बहुत अधिक थक जती थीं, तेज़ आवाज़ बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो गया, तेज़ गंध और किसी का छूना भी उन्हें चिड़चिड़ा बनाने के लिए काफी होता था. मानसिक तौर पर वो चीज़ें भूलने लगीं, चिड़चिड़ी हो गईं और हताश रहने लगीं.

वो कहती हैं, "बात यहां तक पहुंच गई कि मैं लोगों को पहचान नहीं पाती थी. कभी-कभी मेरी आवाज़ भी मुझे अनजान लगती थी, आइने में मैं खुद को नहीं पहचान पाती थी."

लूसी को आत्महत्या करने का ख़्याल सताने लगा और वो खुद को मुसीबत में डालने लगीं. लेकिन ये सब हर महीने कुछ दिनों के लिए ही होता था.

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लूसी के पति मार्टिन कोशिश करते कि वो इस दौरान ऐसा कुछ ना करें जिससे लूसी का तनाव बढ़े. धीरे-धीरे लूसी को लगा कि उनका चिड़चिड़ापन पीरियड्स के पहले कुछ दिनों के दौरान ही होता है.

वो बताती हैं, "मुझे समझ आ रहा था कि पीरियड्स शुरू होने वाला है- इस बात का अहसास मुझे काफ़ी परेशान करता था. लेकिन एक बार ब्लीडिंग शुरू होती थी को मैं सामान्य हो जाती थी. इसीलिए मैंने अपनी शादी भी इस तरह प्लान की कि वो उस दौरन हो जब ब्लीडिंग हो रही हो."

अब तक वो यही मानती रही थीं कि हॉर्मोन की गड़बड़ी के कारण उनके साथ ऐसा होता है. उन्होंने अपने लक्षणों की पूरी लिस्ट बनाई और इंटरनेट पर जानकारी जुटाने के बाद डॉक्टर के पास पहुंचीं. डॉक्टर उन्हें यही बताते रहे कि दूसरे बच्चे के जन्म के बाद वो डिप्रेशन में घिर गई हैं. लेकिन लूसी को यक़ीन था कि मामला ये नहीं था.

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सही डॉक्टर की तलाश

पहले तो लूसी को उनके डॉक्टर ने तनाव कम करने के लिए काफ़ी दवाएं दीं. बाद में उन्हें मेन्टल हेल्थ टीम के पास भेज दिया. टीम ने कहा लूसी का समस्या मानसिक नहीं बल्कि शारीरिक है. इसके बाद लूसी ने अपने डॉक्टर से कहा कि वो स्त्रीरोग विशेषज्ञ से मिलना चाहती हैं. लेकिन उनके डॉक्टर को लगा कि लूसी की समस्या ऐसे नहीं हल होगी सो उन्होंने फिर से लूसी को मेन्टल हेल्थ टीम के पास भेजा.

इस बार टीम ने कहा कि लूसी को प्रीमेन्स्ट्रूअल डाइस्फोरिक डिज़ॉर्डर है जो एक गंभीर किस्म का प्रीमेन्स्ट्रूअल सिन्ड्रोम है. उन्होंने सिफ़ारिश की कि "लूसी की बीमारी के उपचार के लिए शरीर में अंडाणु बनने की प्रक्रिया को हमेशा के लिए रोकने के बारे में सोचा जाए."

लेकिन इसके लिए लूसी के डॉक्टर तैयार नहीं थे. उन्होंने इस बार लूसी को गर्भनिरोधक गोलियां देनी शुरू कीं लेकिन इस कारण लूसी लगातार बीमार रहने लगीं. इसका ख़ास असर नहीं पड़ा तो डॉक्टर ने लूसी को तनाव और डिप्रेशन की दवाएं देनी शुरू कीं और धीरे-धीरे उनकी मात्रा बढ़ाई गई.

लेकिन इसका असर लूसी पर नकारात्मक ही रहा. लूसी की स्थिति बद से बदतर होती चली गई- उनके लिए बात करना, एक वाक्य तक बनाना मुश्किल हो गया, वो याद्दाश्त खोने लगीं और डॉक्टर के पास जाना उनके लिए मुश्किल होने लगा.

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लेकिन मार्टिन ने सुनिश्चित किया कि लूसी नियमित तौर पर डॉक्टर के पास जाएं. उन्होंने अन्य डॉक्टरों की राय लेनी शुरू की. आख़िरकार लूसी की मुलाकात एक ऐसे डॉक्टर से हुई जिन्होंने उन्हें स्त्रीरोग विशेषज्ञ के पास भेजा.

उन्हें शरीर में अंडाणु बनने के लिए ज़रूरी इस्ट्रोजेन हॉर्मोन ना बने इसके लिए हर चार घंटे में इंजेक्शन दिए जाने लगे. इस कारण अस्थाई तौर पर लूसी का रजोनिवृत्ति कराया जाने लगा ताकि इस बात की पुष्टि हो सके कि उन्हें प्रीमेन्स्ट्रूअल डाइस्फोरिक डिज़ॉर्डर है या नहीं.

पहले दो सप्ताह तो बेहद परेशान करने वाले रहे लेकिन उसके बाद लूसी सामान्य अनुभव करने लगीं. किसी चमत्कार की तरह दो महीनों में ही तनाव की सारी दवाएं बंद कर दी गईं और उनमें किसी तरह के तनाव का कोई लक्षण भी नहीं दिखा.

इसके पांच महीनों बाद इस बात की पुष्टि हो गई कि लूसी को प्रीमेन्स्ट्रूअल डाइस्फोरिक डिज़ॉर्डर है और इसका स्थाई इलाज खोजने के लिए ऑपरेशन के ज़रिए गर्भाशय निकालवाने की बात सामने आई.

लूसी चाहती थीं कि उनका एक और बच्चा हो लेकिन खुद को सामान्य देखने की चाह के कारण उन्हें गर्भाशय निकालवाने की बात पसंद आई और उन्होंने इसके लिए मार्टिन से बात की. अभी उन्होंने फ़ैसला लिया भी नहीं था कि लूसी के तनाव के लक्षण एक बार फिर लौट आए.

लूसी इंजेक्शन लगवाने के लिए तड़प महसूस करने लगीं और उन्हें लगा कि इसका असर कम हो रहा है. हालांकि स्त्रीरोग विशेषज्ञ का कहना था कि इंजेक्शन का असर कम हो ऐसा नहीं हो सकता, हो सकता है कि ये प्रीमेन्स्ट्रूअल डाइस्फोरिक डिज़ॉर्डर ना हो. उन्होंने लूसी को फिर से गर्भनिरोधक दवाएं लेने के लिए कहा.

ये सुन कर लूसी डर गईं. इसके बाद उन्हें एक और डॉक्टर के पास भेजा गया जिन्होंने लूसी का केस आगे लंदन स्थित चेल्सी एंड वेस्टमिंस्टर अस्पताल के पास भेज दिया.

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आख़िर निकलवा दिया गर्भाशय

जिस डॉक्टर से लूसी मिलीं उन्होंने उनके बीते 15 सालों की स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में पूरी जानकारी पर ग़ौर करने के बाद उन्हें इस्ट्रोजेन बनाने से रोकने के इंजेक्शन दिए. हालांकि लूसी का तनाव तो कम हुआ लेकिन उन्हें दूसरी मुश्किलें पेश आने लगीं- उनकी हड्डियां कमज़ोर पड़ने लगीं.

उन्हें हॉर्मोन रीप्लेसमेंट थेरपी दी गई जो काफ़ी सफल रही. इसके बाद दिसंबर 2016 में लूसी ने मन बना लिया कि वो ऑपरेशन के ज़रिए अपना गर्भाषय निकलवा देंगी.

ऑपरेशन के दिन तक वो अपने फ़ैसले के बारे में सोचती रहीं. लेकिन ऑपरेशन के बाद उनकी स्थिति में सुधार हुआ और वो खुद को स्वस्थ और समान्य महसूस करने लगीं. उन्होंने असंभव लगने वाली राष्ट्रीय व्यावसायिक योग्यता कार्यक्रम की अपनी पढ़ाई पूरी की और टीचिंग असिस्टेंट के तौर पर काम करने लगीं.

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लूसी कहती हैं, "शुक्र है कि देर से सही लेकिन मुझे अपनी समस्या का इलाज तो मिला. कई बार लोग महिलाओं को पीरियड्स से पहले होने वाले तनाव को प्रीमेन्स्ट्रूअल सिंड्रोम बताते हैं और कहते हैं कि ये तो सभी को होता है. लेकिन ऐसा नहीं है."

"अगर डॉक्टर मेरी बात को मेरे दूसरे बच्चे यानी बैला के होने के बाद थोड़ी अधिक तवज्जो देते तो अच्छा होता. मैं चाहती थी कि कोई मेरी मुश्किलें सुनता."

ऑपरेशन का असर लूसी पर जितना हुआ उससे कहीं ज़्यादा उनके आसपास के लोगों पर हुआ. अब लूसी अपने बच्चों का ख्याल रखने की ज़िम्मेदारी बेहतर तरीके से निभा पा रही हैं. पेशे से संगीतकार मार्टिन अब अपने काम पर अधिक ध्यान दे पा रहे हैं.

लूसी का बेटा टोबी अब अपनी मां तो खुश देखकर खुश रहता है. लूसी आशा करती हैं कि उनकी बेटी बैला उनके उस मुश्किल दौर को याद नहीं रखेगी. लूसी का परिवार अब पहले से अधिक खुश है.

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