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SEATO बनाकर पाकिस्तान की जला दी थी जीभ, क्या QUAD पर US दे रहा भारत को धोखा? अमेरिका की दोमुंहा डिप्लोमेसी!

India-US Tie: अमेरिका की डिप्लोमेसी और अमेरिका के सुरक्षा समझौते तभी तो टिकते हैं, जब तक या तो अमेरिका का हित सधता रहता है या फिर अमेरिका का हुक्म बजाने से जब तक कोई इनकार नहीं कर देता है।

SEATO के नाम से पाकिस्तान की जीभ जलाने के बाद अब ऐसी आशंका है, कि QUAD, जिसमें अमेरिका के साथ साथ भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं, वो अपनी अंतिम सांसे ले रहा है। ऐसा माना जा रहा है, कि QUAD का हाल भी सीटो की तरह ही हो सकता है।

India-US Tie

अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ SEATO समझौता 1954 में किया था, जिसने 1977 तक आते आते दम तोड़ दिया और अब ये सिर्फ कागजों पर ही मौजूद है। तो सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या अब QUAD अमेरिका के हित में नहीं रहा, या फिर अमेरिका की हां में हां मिलाने से भारत का इनकार, इस ग्रुप के अंत की वजह बना है?

पाकिस्तान के SEATO जैसा भारत के QUAD का अंजाम?

एक साल होने को आए हैं, जबसे क्वाड निष्क्रीय पड़ा हुआ है और माना जा रहा है, कि इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह अमेरिका और भारत के बीच के मतभेद हैं और एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अमेरिका ने भारत के आंतरिक मामलों में टांग अड़ाकर इस जियो-पॉलिटिकल प्लेटफॉर्म की आहूति दे दी है।

हालांकि, अब भारत में चुनाव खत्म हो चुके हैं नरेन्द्र मोदी फिर से चुनाव जीत चुके हैं और कई एक्सपर्ट्स उम्मीद जता रहे हैं, कि भारत और अमेरिका के संबंधों में तल्खी का जो बुरा समय था, वो बीत चुका है, मगर फिर भी सवाल ये हैं, कि क्या वाकई ऐसा है? अमेरिका की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह है, कि उसने खालिस्तानी नेता गुरपतवंत सिंह पन्नून, जिसे भारत आतंकवादी मानता है, उसकी हत्या की कोशिश में भारत सरकार के कुछ अधिकारियों को आरोपी ठहराया है और भारत की नाराजगी की वजह है, चुनाव से पहले भारतीय चुनावी व्यवस्था और भारत की अंदरूनी राजनीति पर बाइडेन प्रशासन की बार बार टिप्पणी।

लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी अपनी पहली विदेशी यात्रा में जी7 शिखर सम्मेलन में शिरकत करने इटली पहुंच गये हैं और अमेरिका के एनएसए ने पुष्टि की है, कि प्रधानमंत्री मोदी और जो बाइडेन के बीच द्विपक्षीय बैठक हो सकती है, लिहाजा सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी, कि मोदी से मुलाकात के वक्त बाइडेन का लहजा कैसा होगा?

हालांकि, वॉशिंगटन लगातार भारत के साथ साझेदारी को लेकर अभूतपूर्व संभावनाओं की बात करता है, लेकिन क्या अमेरिका और भारत अपने बीच विवादित मुद्दो को सुलक्षा पाएंगे? ये एक बड़ा सवाल है।

भारत के आंतरिक मुद्दों में अमेरिका की टिप्पणी

अमेरिका की तरफ से बार बार प्रचार किया जा रहा है, कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक सत्तवादी लोकतंत्र में बदल गया है और वॉशिंगटन स्थिति 'फ्रीडम हाउस' ने मोदी सरकार पर मुस्लिमों से भेदभाव और हिंसा रोकने में नाकाम रहने का आरोप लगातर लोकतंत्र के इंडेक्स में भारत के स्कोर को घटा दिया है और उसे 'स्वतंत्र' से 'आंशिक तौर पर स्वतंत्र' की कैटोगिरी में ला दिया है।

फ्रीडम हाउस का आरोप है, कि "मोदी सरकार पत्रकारों, गैर सरकारी संगठनों (NGO) और सरकार की आलोचना " करने वाले अन्य संगठनों का उत्पीड़न कर रही है और तेजी से राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं, पिछले दो सालों अमेरिकी विदेश विभाग से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) ने सिफारिश की है, कि भारत को "विशेष चिंता" वाला देश घोषित किया जाए।

इसके अलावा, भारत में जब चुनाव हो रहे थे, उस वक्त अमेरिका ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी से लेकर कांग्रेस के फंड को फ्रीज करने तक को लेकर बयान दिए, जिसपर मोदी सरकार की तरफ से सख्ततम प्रतिकिया दी गई थी।

इसके अलावा, भारत का स्ट्रैटजिक स्टेब्लिशमेंट इस बात को मजबूती से मान रहा है, कि पश्चिमी देशों ने, खासकर अमेरिका ने भारत में हुए चुनाव को प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर हस्तक्षेप किया है। पश्चिमी देशों की मीडिया ने मोदी सरकार के खिलाफ पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों आर्टिकिल लिखे, जिसमें बताया गया, कि भारत में मुसलमान कितनी दुर्दशा में रहते हैं और विदेशी एक्सपर्ट्स ने बार बार भारतीय लोकतंत्र पर सवाल उठाए।

भारत के पूर्व राजनयिक कंवल सिब्बल, जो विदेश सचिव का पद भी संभाल चुके हैं, उनका कहना है, कि "इस बार के चुनाव में पश्चिमी देशों के हमले की तीव्रता काफी बढ़ गई। न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, द इकोनॉमिस्ट, फाइनेंशियल टाइम्स, ले मोंडे, डॉयचे वेले, वॉल स्ट्रीट जर्नल, फ्रांस 24, बीबीसी और जर्नल फॉरेन अफेयर्स ने मोदी के खिला सुनियोजित अभियान चलाया है। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्राष्ट्रीय आयोग, स्वीडन के वी-डेम, जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, अमेरिकी विदेश विभाग की मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट ने भी मोदी सरकार पर बार बार हमले किए और फिर अमेरिका के कई सांसदों ने इन अखबारों की डफली पर अपना राग बजाना शुरू कर दिया।

कुल मिलाकर इनकी कोशिश, किसी ना किसी तरह से मोदी की मजबूत सरकार को सत्ता से हटाना था और चुनावी नजीतों में मोदी की पार्टी बीजेपी, बहुमत से दूर रह गई।

मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका और कनाडा, लगातार खालिस्तानी आंदोलन को हवा दे रहे हैं और भारत को एक बार फिर से खालिस्तानियों के आग से घाव देना चाहते हैं। जाहिर तौर पर, मोदी सरकार इससे नाराज है और कनाडा के साथ भारत के रिश्ते खराब हो चुके हैं।

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क्या QUAD को अमेरिका ने खत्म कर दिया?

जियो-पॉलिटिक्स की सबसे खास बात ये होती है, कि यहां कोई ग्रुप खत्म नहीं होता, बस उसे निष्क्रीय कर दिया जाता है, जैसे अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ अपने समझौते SEATO के साथ किया।

ऐसा कहा जा रहा है, कि भारत और अमेरिका के संबंध में आने वाले तनाव की इन तमाम वजहों का QUAD पर गहरा असर पड़ा है। QUAD की बैठक सवा साल से नहीं हो पाई है, जबकि बाइडेन ने अपने कार्यकाल के पहले साल में बार बार QUAD का राग गाया था। बाइडेन ने 2021 में व्हाइट हाउस में QUAD के नेताओं की पहली व्यक्तिगत बैठक की मेजबानी की थी और जापानी प्रधान मंत्री फुमियो किशिदा ने मई 2022 में दूसरे शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। 2023 की क्वाड बैठक मई में ऑस्ट्रेलिया में होनी थी, लेकिन बाइडेन ने घरेलू मामला बताकर ऑस्ट्रेलिया का दौरा रद्द कर दिया था और जापान में ही क्वाड की बैठक की गई जब जापान G7 की मेजबानी कर रहा था।

इस साल भारत को QUAD की मेजबानी करनी थी और मोदी सरकार गंभीरता से कोशिश कर रही थी, कि गणतंत्र दिवस के मौके पर इसका आयोजन किया जाए और भारत ने इे ध्यान में रखते हुए जो बाइडेन को गणतंत्र दिवस का मुख्य मेहमान बनने के लिए आमंत्रित किया था। अमेरिका ने इसकी पुष्टि भी कर दी, लेकिन फिर अचानक से भारत आने से मना कर दिया, जो भारत के लिए अपमानजनक था।

हालांकि, वाशिंगटन ने कहा पहले कहा था, कि इस साल के अंत में भारत में शिखर सम्मेलन को फिर से आयोजित किया जाएगा, लेकिन ऐसा होना बहुत ही असंभव लगता है, क्योंकि नवंबर में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव हैं और चुनाव प्रचार के बीच बाइडेन का भारत आना मुश्किल है। जाहिर है, अमेरिका टालमटोल कर रहा था।

ऑस्ट्रेलिया के ग्रिफिथ विश्वविद्यालय में भारतीय राजनीति के विशेषज्ञ इयान हॉल के मुताबिक, अब नई दिल्ली और वाशिंगटन, दोनों में विदेश नीति के अभिजात वर्ग के बीच QUAD को लेकर संदेह बढ़ रहा है। कई अन्य टिप्पणीकार इस पर विवाद कर सकते हैं, लेकिन QUAD के आलोचकों को अब यह कहने का एक बड़ा मौका मिल गया है, कि यह एक अप्राकृतिक संगठन होने के कारण यह SEATO की तरह ही खत्म हो जाएगा।

चीन कई बार भविष्यवाणी कर चुका है, कि QUAD कभी कामयाब नहीं हो पाएगा और ऐसा ही होता दिख भी रहा है।

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अमेरिका-पाकिस्तान SEATO समझौता क्या था?

अमेरिका ने दक्षिण एशिया में चीन की साम्यवादी विचारधारा को रोकने के लिए South East Association Treaty Organization का गठन किया था और इसमें पाकिस्तान के साथ साथ फिलीपींस और थाईलैंड जैसे दक्षिण एशियाई देश शामिल हुए थे। लेकिन अंत में इसका परिणाम यह हुआ, कि SEATO पर बाहरी देशों का प्रभुत्व बढ़ता गया और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने इसपर अप्रत्यक्ष तौर पर 'कब्जा' कर लिया।

एक्सपर्ट्स का मानना है, कि QUAD में ऐसे कई तत्व हैं, जो SEATO से मेल खाते हैं और सबसे बड़ा फैक्टर ये, कि QUAD के आधार पर भारत को अमेरिका का 'जागीरदार' बनना कबूल नहीं था।

इसके अलावा, अमेरिका QUAD के जरिए भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहता था और अमेरिका की मंशा थी, कि भारत चीन से पंगा ले और वो इसका फायदा उठाए। अमेरिका का मकसद साफ है, जो देश चीन को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हो सकता है, उसका साथ देना, क्योंकि अमेरिका हर हाल में चीन को कमजोर करना चाहता है, लेकिन भारत ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

भारत किसी युद्ध लड़ने के पक्ष में नहीं है, बल्कि भारत की रणनीति खुद को आत्मनिर्भर बनाने और चीन की तरह अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की है। जाहिर है, चीन से लड़कर ये लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता है। जो अमेरिका को पसंद नहीं आया।

अमेरिका ने कई बार QUAD को सैन्य गठबंधन बताने की कोशिश की, लेकिन भारत ने इस विचार को खारिज कर दिया। भारत ने कहा, कि स्वास्थ्य, शिक्षा, नई तकनीकों और समुद्री डोमेन में जागरूकता पैदा करना, बुनियादी ढांचे का विकास, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन QUAD का मकसद है। लिहाजा, अमेरिका की अपेक्षाएं QUAD से पूरी नहीं हो पाईं हैं।

लिहाजा, अमेरिका ने QUAD जैसा एक और संगठन बनाने की कोशिश की। अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया और यूके के साथ एक ग्रुप बनाया, जिसका नाम AUKUS रखा गया और इसे QUAD का विकल्प माना जाता है। ये तीनों ही देश ऑकस को सैन्य संगठन बताते हैं। इस बीच अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर में चीन के विरोधी फिलीपींस को अपने जाल में फंसाया, जिसने चीन से लड़ने के लिए तलवारें भींच रखी हैं।

हालांकि, एक्सपर्ट्स अभी भी इस बात पर सहमत हैं, कि QUAD अभी भी खत्म नहीं हुआ है और QUAD की तरफ आना अमेरिका की मजबूर है, क्योंकि एशिया का कोई भी देश, चीन के खिलाफ भारत का विकल्प नहीं हो सकता है। लिहाजा, तमाम विरोध और मनमुटाव के बाद भी भारत और अमेरिका साझेदारी में बने रहेंगे और यही साझेदारी जियो-पॉलिटिक्स को नया आकार दे सकने में सक्षम है।

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