पाकिस्तान में अविश्वास प्रस्ताव: इमरान ख़ान के लिए आने वाले दिन कितने मुश्किल?
पाकिस्तान में सियासी हालात बेहद तेज़ी के साथ बदलते दिख रहे हैं. सरकार से लेकर विपक्षी दलों तक सभी अलग-अलग स्तर पर बैठकों में व्यस्त हैं.
जहां एक ओर इमरान ख़ान सरकार अविश्वास प्रस्ताव की चुनौती से पार पाने की कोशिश कर रही है. वहीं, दूसरी ओर विपक्षी दल इमरान ख़ान सरकार को सत्ता से बेदखल करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं.
पाकिस्तान के विपक्षी दल पहले ही सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने का एलान कर चुके हैं. यही नहीं, विपक्षी दल आने वाले दिनों में सड़क पर उतरने का भी एलान कर रहे हैं.
माना जा रहा है कि शुक्रवार को नेशनल असेंबली में सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जा सकता है.
अविश्वास प्रस्ताव कितनी बड़ी समस्या
इस प्रस्ताव को पेश कराने से लेकर उसे पारित कराने के बीच विपक्ष को एक लंबा सफ़र तय करना है क्योंकि 342 सांसदों वाली पाकिस्तानी संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित कराने के लिए विपक्ष को कम से कम 172 सांसदों के समर्थन की ज़रूरत होगी. फ़िलहाल पाकिस्तान के तमाम विपक्षी दलों के पास इतने सांसद नहीं हैं.
वहीं, इमरान सरकार के पास 155 सांसद हैं और सहयोगी दलों के साथ मिलकर कुल 176 सांसद हैं.
ऐसे में विपक्षी दल इमरान सरकार के घटक दलों को अपने साथ मिलाने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, सरकार भी अपने सहयोगियों को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश कर रही है.
लेकिन घटक दलों की ओर से कुछ सासंदों द्वारा सरकार के ख़िलाफ़ बयानबाजी करने के बाद सरकार सकते में आ गई है.
सरकार के सामने संकट ये है कि अगर इन सांसदों ने, जिनकी संख्या कम से कम 12 बताई जा रही है, अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में वोट दे दिया तो सरकार ख़तरे में पड़ सकती है.
सरकार ने इसी समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. लेकिन सरकार को सुप्रीम कोर्ट के हाथों निराशा हाथ लगी है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अब इमरान ख़ान सरकार के पास क्या विकल्प शेष हैं और आने वाले दिन कितने मुश्किल होने वाले हैं?
इमरान ख़ान क्या करेंगे?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अविश्वास प्रस्ताव से पहले इस्तीफ़ा देने से इनकार करते हुए कहा है कि वह अपने पत्ते जल्द खोलेंगे.
जहां विपक्षी दल 26 मार्च को इस्लामाबाद पहुंचने की बात कर रहे हैं, वहीं इमरान ख़ान भी 27 मार्च को इस्लामाबाद में ही एक बड़ी रैली करने जा रहे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार के लिए आने वाले दिन कितनी बड़ी चुनौती लेकर आ सकते हैं.
गुरुवार को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट में मौजूद रहे बीबीसी उर्दू सेवा के संवाददाता शहज़ाद मलिक बताते हैं, "ये बात सही है कि सरकार के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होंगे क्योंकि पाकिस्तान के तमाम विपक्षी दल एकजुट हैं, और ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि सरकार अविश्वास प्रस्ताव में मात खा सकती है."
बाग़ी सांसदों को वापस बुलाने की कोशिश
इमरान सरकार ने अपने ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करने वाले सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था. इस नोटिस में पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 63 (ए) का ज़िक्र था जो कि दलबदल से जुड़ा है.
सरकार इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी गई जहां उसने 63 (ए) को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या सरकार के ख़िलाफ़ मतदान करने पर इन सांसदों को आजीवन चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है.
इसे सरकार द्वारा बाग़ी सांसदों पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन इस कोशिश में इमरान ख़ान सरकार को असफलता हाथ लगी है.
शहज़ाद बताते हैं, "पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले में कहा है कि जो अपराध हुआ ही नहीं है, उसके आधार पर हम कैसे किसी को अपराधी घोषित कर सकते हैं.''
इसके साथ ही अदालत ने कहा है कि अगर सांसदों को मतदान नहीं करने दिया गया तो ये उनके साथ अन्याय होगा. अदालत के मुताबिक़ सांसद वोट डाल भी सकते हैं और स्पीकर उनके मतों की गिनती करने के लिए बाध्य भी हैं.
लेकिन पाकिस्तान की सियासी सरगर्मियों पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद मानते हैं कि सरकार फ़िलहाल कुछ समय हासिल करने की कोशिश में लगी हुई है.
वह कहते हैं, "पाकिस्तान संसद की एक रवायत रही है कि जब किसी संसद सदस्य का निधन हो जाता है तो संसद की कार्यवाही शुरू होने पर उनके लिए दुआएं करने के बाद संसद स्थगित हो जाती है. लेकिन विपक्षी दल जैसे पीपल्स पार्टी आदि कह रहे हैं कि भले ही शुक्रवार को सत्र न चले, लेकिन इसके अगले दिन या जल्द ही स्पीकर को संसद का सत्र बुलाना चाहिए ताकि अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग हो सके.
लेकिन सरकार की सूरते-ए-हाल देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार चाहती है कि उसे अपने बचाव के लिए कुछ वक़्त मिल जाए. लेकिन विपक्ष ने एलान किया है कि कुछ लोगों का मार्च 26 मार्च को इस्लामाबाद के लिए बढ़ेगा. इस तरह विपक्षी दल भी सरकार पर दबाव डालना चाहते हैं कि जल्द से जल्द संसद का सत्र बुलाया जाए.
इमरान ख़ान 27 मार्च को इस्लामाबाद में एक बहुत बड़ा जलसा करने वाले हैं जिसके बारे में वह पाकिस्तान के लोगों से कह रहे हैं कि वे आएं और बताएं कि वे किसके साथ खड़े हैं. ऐसे में राजनीतिक खींचतान का दौर जारी है.
और इमरान ख़ान सरकार चाहती है कि इस मामले में मतदान रमज़ान के बाद हो लेकिन मुझे नहीं लगता कि अब विपक्ष सरकार को इतना लंबा समय देगा. उनकी कोशिश ये होगी कि अगर वे 26 तारीख़ से आकर इस्लामाबाद में बैठना शुरू हो जाएंगे तो ये जल्द से जल्द यानी रमज़ान से पहले ही निपट जाए तो बेहतर है."
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पाकिस्तान की सेना का क्या रुख़?
ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तान में जिस भी पार्टी की हुक़ूमत हो, उसमें पाकिस्तानी सेना का दखल रहता है और पाकिस्तान के विपक्षी दल एक लंबे समय तक इमरान ख़ान को 'सेलेक्टेड पीएम' कहते रहे हैं.
लेकिन सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और सेना के बीच संबंध में दूरियां आ गई हैं क्योंकि इस मुद्दे पर अब तक सेना की ओर से इमरान ख़ान को राहत पहुंचाने वाला बयान नहीं आया है.
हारून रशीद कहते हैं, "पाकिस्तान के इतिहास से अलग इस बार पाकिस्तानी सेना ने इस मामले में एक तटस्थ रुख़ अख़्तियार किया हुआ है. अफ़वाहें जो भी उड़ रही हों लेकिन अब तक सेना ने खुलकर इस मामले में कुछ भी नहीं कहा है."
ऐसे में जानकारों का यही मानना है कि आनेवाला समय इमरान ख़ान के लिए आसान नहीं होगा. मौजूदा संकट से उबरने के लिए उन्हें काफ़ी सियासी मशक्कत करनी पड़ सकती है और और वो नहीं चाहेंगे कि उनकी सरकार किसी भी सूरत में गिर जाए.
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