पाकिस्तान तालिबान को लेकर बढ़ा सकता है भारत का संशय
अफ़ग़ानिस्तान की कमान तालिबान के हाथ में आने पर सवाल उठ रहे हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व का क्या होगा? साउथ एशिया असोसिएशन फ़ॉर रीजनल कोऑपेशन यानी सार्क में अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भारत क्या करेगा.
सार्क की अगली बैठक पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होनी है. कई विशेषज्ञों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान की सदस्यता तालिबान के नेतृत्व में बनने वाली सरकार पर निर्भर करेगा. देखा जाएगा कि सरकार किस हद तक समावेशी है.
इस बार पाकिस्तान सार्क की मेज़बानी कर रहा है, इसलिए अफ़ग़ानिस्तान को आमंत्रित करने की ज़िम्मेदारी उसी की है. मंगलवार को क़तर की राजधानी दोहा में भारतीय राजदूत दीपक मित्तल और तालिबान के प्रतिनिधि की मुलाक़ात के बाद संकेत मिल रहे हैं कि मोदी सरकार तालिबान पर अपनी नीति की समीक्षा करने के लिए तैयार है.
अब ये इस बात पर भी निर्भर करेगा कि तालिबान भारत को अपने लिए कितना अहम समझता है और भारत तालिबान को किस हद तक अहम मानता है.
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भारत के लिए असमंजस
हाल के वर्षों में पाकिस्तान और भारत के रिश्तों में आई तल्ख़ी का असर सार्क पर भी सीधा पड़ा है. कोविड महामारी के दौरान भी भारत ने सार्क देशों को एक मंच पर लाने की कोशिश की थी.
हालाँकि भारत की कोविड वैक्सीन का फ़ायदा पाकिस्तान को नहीं मिला था. पाकिस्तान को वैक्सीन के मामले में चीन से ही मदद मिली. कोविड पर सार्क की एक वर्चुअल बैठक में पाकिस्तानी प्रतिनिधि शामिल हुए थे.
सार्क के महासचिव एसेला वीराकून आठ से 14 अगस्त तक दिल्ली में थे. एसेला श्रीलंका के हैं. उन्होंने इस दौरे में सार्क को सक्रिय बनाने की संभावनाओं को खंगाला था. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में जारी संकट के कारण यह दौरा नेपथ्य में चला था.
अफ़ग़ानिस्तान को लेकर जो संशय सार्क के सामने खड़ा होगा, वही संयुक्त राष्ट्र के सामने भी होगा. तालिबान का अतीत काफ़ी हिंसक रहा है. मानवाधिकारों के संगीन उल्लंघन, आत्मघाती हमलावर और कई तरह के हमलों में शामिल होने के कारण स्थिति जटिल हो गई है.
संयुक्त राष्ट्र ने भी अपने सभी कर्मचारियों को वापस बुला लिया है और सारी गतिविधियाँ बंद कर दी हैं.
भारत के लिए चुनौती तब पेश होगी, जब पाकिस्तान तालिबान को प्रतिनिधि के तौर पर आमंत्रित करने के लिए अड़ जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इस लाइन पर सार्क में बड़ी जटिल स्थिति पैदा हो सकती है.
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पाकिस्तान को बढ़त
तालिबान को लेकर पाकिस्तान को कोई कन्फ्यूज़न नहीं है. पाकिस्तानी पीएम ने तो तालिबान के सत्ता में आने के बाद यहाँ तक कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान के लोगों ने ग़ुलामी की जंज़ीर को तोड़ दिया है.
तालिबान को पाकिस्तान से मदद मिलती रही है, इसे लेकर भी कई रिपोर्ट आ चुकी है. अशरफ़ ग़नी की सरकार पाकिस्तान पर सीधा हमला बोलती थी कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को सत्ता में लाने में लगा है.
एक तरह से पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने का स्वागत किया है. ऐसे में पाकिस्तान सार्क की बैठक में तालिबान के नेतृत्व वाले अफ़गानिस्तान को नहीं बुलाए, ऐसा नहीं हो सकता है.
अफ़ग़ानिस्तान 2007 में आठवें सदस्य के तौर पर सार्क में शामिल हुआ था. तब देश की कमान हामिद करज़ई के पास थी. इन सालों में अफ़ग़ानिस्तान को कई सार्क परियोजनाओं का फ़ायदा मिला और बैठकों में शामिल हुआ.
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संयुक्त राष्ट्र भी नरम
इसके साथ ही काठमांडू स्थित इंटरगवर्नमेंटल ऑर्गेनाइज़ेशन ICIMOD में तालिबान का क्या होगा, इस सवाल का भी जवाब नहीं है. इसके अफ़ग़ानिस्तान समेत बांग्लादेश, भूटान, भारत, चीन, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान सदस्य हैं.
सार्क की पिछली बैठक नेपाल की राजधानी काठमांडू में 2014 में हुई थी. अगली बैठक इस्लामाबाद में थी, लेकिन 2016 में पठानकोट में चरमपंथी हमले के कारण इसे स्थगित करना पड़ा.
पिछले शुक्रवार को भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा था, ''अफ़ग़ानिस्तान में अभी अनिश्चितता की स्थिति है. पहली चिंता लोगों की सुरक्षा है. अभी तक काबुल में सरकार गठन के लेकर कुछ स्पष्ट नहीं हुआ है. मुझे लगता है कि हम मान्यता के सवाल को लेकर जल्दबाज़ी में हैं.''
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था, ''अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर हमारी नज़र बनी हुई है. अभी हमारा पूरा ध्यान वहाँ से लोगों को सुरक्षित निकालने पर है. दूसरे देश भी मान्यता के सवाल पर चीज़ों को देख और समझ रहे हैं.''
कहा जा रहा है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार को जब तक मान्यता नहीं दे देता है, तब तक सार्क में उसे अफ़ग़ानिस्तान के प्रतिनिधि के तौर पर स्वीकार करना आसान नहीं होगा.
अमेरिकी सैनिकों के निकलने के बाद 31 अगस्त को भारत की अध्यक्षता में यूएनएससी में जो प्रस्ताव पास हुआ है, उसमें तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में एक तरह से स्टेट के नेता के तौर पर स्वीकार कर लिया गया है. यूएनएससी का यह प्रस्ताव फ़्रांस, यूके, यूएस और भारत समेत कुल 12 देशों की ओर से प्रायोजित था. रूस और चीन इस प्रस्ताव की वोटिंग से बाहर रहे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यूएनएससी के प्रस्ताव में तालिबान का नाम पाँच बार लिया गया लेकिन एक बार भी निंदा नहीं की गई. बल्कि ये कहा गया कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान से लोगों को सुरक्षित निकालने को लेकर प्रतिबद्ध है. प्रस्ताव में यह भी नहीं कहा गया है कि अगर तालिबान अपनी प्रतिबद्धता नहीं निभाता है, तो क्या होगा.
कॉपी - रजनीश कुमार
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