तालिबान पर पाकिस्तानी समाज में दरार, जानिए इस्लामिक संगठनों से 'गृहयुद्ध' का खतरा कैसे मंडराया

1996 में पाकिस्तान वो पहला देश था, जिसने तालिबान को मान्यता दी थी। लेकिन, इस बार स्थिति बदल चुकी है। पाकिस्तान चाहकर भी तालिबान को मान्यता देने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान पर 100 अरब डॉलर का कर्ज है।

इस्लामाबाद, अक्टूबर 09: पाकिस्तान की राजनीति में शक्तिशाली इस्लामी गुट अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से मान्यता देने के लिए सरकार पर भारी दबाव डाल रहे हैं। जिसकी वजह से प्रधानमंत्री इमरान खान काफी टेंशन में आ चुके हैं। पाकिस्तान की इस्लामिक पार्टियों के पास ना सिर्फ जनता का बड़ा जनाधार रहता है, बल्कि ये संगठन किसी भी वक्त देश में गृहयुद्ध भड़काने की स्थिति में रहते हैं। जिसका उदाहरण इसी साल तहरीक-ए-लब्बैक पेश कर चुका है, जब एक हफ्ते से ज्यादा वक्त तक पाकिस्तान गृहयुद्ध की आग में जलता रहा है। ऐसे में तालिबान को लेकर पाकिस्तान का समाज दो हिस्सों में बंट गया है। एक हिस्सा जो तालिबान का कट्टर समर्थक है, तो वहीं एक हिस्सा ऐसा भी है, जो तालिबान के खिलाफ खड़ा हो रहा है।

तालिबान के समर्थन में इस्लामिक पार्टियां

तालिबान के समर्थन में इस्लामिक पार्टियां

पाकिस्तान की इस्लामिक राजनीतिक दल, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई) के प्रमुख फजलुर रहमान ने मांग की है कि, इस्लामाबाद अफगानिस्तान में धार्मिक तालिबान सरकार को आधिकारिक रूप से मान्यता दे। फजलुर रहमान, पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली मौलवियों में से एक हैं, और देश के विपक्षी दलों के सबसे बड़े गठबंधन, पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट के प्रमुख नेता भी हैं। पाकिस्तान के अंदर फजलुर रहमान का एक बड़ा समर्थक वर्ग तो है ही, इसके साथ ही देश के धार्मिक और राजनीतिक हलकों में उनका काफी प्रभाव है।

फजलुर रहमान की धमकी चिंता क्यों?

फजलुर रहमान की धमकी चिंता क्यों?

पाकिस्तान में करीब 36 हजार इस्लामिक मदरसों का संचालन किया जाता है, जिनमें से 18 हजार से ज्यादा मदरसों में देवबंदी विचारधारा की शिक्षा दी जाती है, जो सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक कानून के पालन करने पर जोर देता है। अफगान तालिबान और फजलुर रहमान, दोनों देवबंदी विचारधारा का पालन करते हैं, और तालिबान अधिकारियों और पैदल सैनिकों ने समान रूप से इन मदरसों में अध्ययन किया है, जिनमें से कुछ मदरसे फजलुर रहमान के संगठन जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआईय) के ही हैं। हालांकि, तालिबान अंतर्राष्ट्रीय मान्यता हासिल करने के लिए हर पैंतरे को आजमा रहा है, लेकिन कोई भी देश उसे मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है। वहीं, तालिबान की सरकार के कई मंत्री अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी सूची में भी हैं।

इस्लामिक पार्टियों की तालिबान पर राय

इस्लामिक पार्टियों की तालिबान पर राय

पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है, कि वे अफगानिस्तान को चलाने में तालिबान के शरिया कानून के एप्लिकेशन का समर्थन करते हैं। फजलुर रहमान के जेयूआई का मानना है कि तालिबान को मान्यता देना पाकिस्तान के राष्ट्रीय हित में हैं। फजलुर रहमान के सहयोगी जलाल उद्दीन ने 'डीडब्ल्यू' को बताया कि, तालिबान "पाकिस्तान के अनुकूल" है, और इस्लामाबाद से मान्यता मिलने पर दो मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करेगी। भले ही पाकिस्तान में कई आलोचनात्मक लोग यह मानते हैं कि तालिबान बंदूक के दम पर सत्ता में आए हैं, और उनकी सरकार को नाजायज मानते हैं, लेकिन, पाकिस्तान के इस्लामिक संगठनों ने इमरान सरकार पर भारी दवाब बनाना शुरू कर दिया है।

तालिबान के पक्ष में संगठित होते दल

तालिबान के पक्ष में संगठित होते दल

पाकिस्तान की इस्लामिक पार्टियों का आरोप है कि, पाकिस्तान में मौजूद कुछ उदारवादी लोगों ने तालिबान के खिलाफ अभियान शुरू किया हुआ है। वहीं, इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में स्थिति एक इस्लामी संगठन, शहीद फाउंडेशन के हाफिज इहतेशम ने दावा किया कि, 2001 के यूएस-नाटो आक्रमण ने तालिबान को अफगानिस्तान के वैध शासकों के रूप में अपदस्थ कर दिया और अब उनका शासन "बहाल" कर दिया गया है। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि, "हमें लगता है कि पाकिस्तान एक संप्रभु और स्वतंत्र देश है और उसे पश्चिमी दबाव की अनदेखी करनी चाहिए और इस (तालिबान) सरकार को मान्यता देनी चाहिए।" इहतेशाम ने कहा कि उनका संगठन तालिबान को मान्यता देने के अनुरोध के साथ सरकार से संपर्क करने पर विचार कर रहा है। वहीं, इस्लामिक राजनीतिक दल 'जमात-ए-इस्लामी' के नेता मौलाना अब्दुल अकबर चित्राली का कहना है कि, उनकी पार्टी के प्रमुख मांग कर रहे हैं कि इस्लामाबाद, अफगानिस्तान में तालिबान शासन को मान्यता दे। उन्होंने कहा कि, हम जल्द ही इस मुद्दे पर संसद को घेरने की कोशिश करेंगे।

क्या पाकिस्तान देगा तालिबान को मान्यता?

क्या पाकिस्तान देगा तालिबान को मान्यता?

1996 में जब तालिबान ने पहली बार अफगानिस्तान पर कब्जा किया था, पाकिस्तान उनकी सरकार को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश था। तालिबान ने बंदूक के साथ देश पर शासन किया, लोगों को अमानवीय दंड दिए गये और महिलाओं को घर के बाहर देखने पर भी प्रतिबंध लगा दिए गये थे। अगर कोई महिला घर की बालकनी में भी आ जाए, तो उनके लिए कोड़े मारने का प्रावधान किया गया था। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने भी तालिबान की पहली अफगान सरकार को मान्यता दी थी। लेकिन, इस बार विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान, इस्लामवादियों को मान्यता देकर पश्चिम को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकता। इस्लामाबाद एक लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था से निपट रहा है, मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक संस्थानों पर निर्भर है, और पाकिस्तान के ऊपर 100 अरब डॉलर से ज्यादा कर्ज है। वाशिंगटन के एक थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में दक्षिण और मध्य एशिया के निदेशक हुसैन हक्कानी ने कहा कि ,पाकिस्तान यह देखेगा कि निर्णय लेने से पहले अन्य देश कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।

इमरान की पार्टी भी तालिबान के समर्थन में

इमरान की पार्टी भी तालिबान के समर्थन में

उन्होंने 'डीडब्ल्यू' से कहा कि, अगर इस बार तालिबान को मान्यता देने की गलती पाकिस्तान करता है, तो इस्लामाबाद को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाएगा। हक्कानी ने कहा कि, इस्लामाबाद को दक्षिणपंथी धार्मिक दलों के दबाव को नजरअंदाज करना चाहिए। हालांकि, सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के एक पाकिस्तानी सांसद ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि उसने अमेरिकी दबाव के कारण अफगान तालिबान को मान्यता नहीं दी है। मुहम्मद बशीर खान ने कहा कि कई पाकिस्तानी और पीटीआई सदस्य तालिबान को मान्यता देने का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि, "काबुल सरकार के साथ हमारे बहुत सौहार्दपूर्ण संबंध हैं और हम चीन, रूस और अन्य क्षेत्रीय राज्यों के परामर्श से उन्हें मान्यता देना चाहते हैं।"

पाकिस्तान के 'धर्मनिरपेक्ष समाज' का विरोध

पाकिस्तान के 'धर्मनिरपेक्ष समाज' का विरोध

वहीं, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के साथ तालिबान के व्यवहार को लेकर पाकिस्तान के धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल स्तब्ध हैं। वे तालिबान की किसी भी औपचारिक मान्यता का पुरजोर विरोध करते हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के एक दिग्गज नेता ताज हैदर ने कहा, "मैं एक लोकतांत्रिक हूं और मैं एक ऐसी सरकार में विश्वास करता हूं जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए सत्ता में आती है।" उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि, तालिबान का अधिग्रहण गैर-लोकतांत्रिक था और इस्लाम की उनकी कठोर व्याख्या मौलिक मानवाधिकारों के खिलाफ है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि, "उस सरकार को मान्यता देने का कोई कारण नहीं है।" वहीं, पाकिस्तान की महिला अधिकार समूहों का दावा है कि, अगर इस्लामाबाद तालिबान शासन को मान्यता देता है, तो फिर पाकिस्तान को भी तालिबानी शासन के लिए तैयार हो जाना चाहिए। महिला अधिकार कार्यकर्ता फरजाना बारी ने डीडब्ल्यू को बताया कि, तालिबान ने पहले ही महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भागीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया है। उन्होंने तालिबान को मान्यता देने की बात का सख्त विरोध करते हुए कहा कि, "उन्हें तब तक कोई मान्यता नहीं दी जानी चाहिए जब तक कि वे निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने, महिलाओं पर सभी प्रतिबंधों को हटाने और मानवाधिकारों पर सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों को स्वीकार करने का फैसला नहीं लेते हैं।"

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