Pahalgam Terror: 35 साल पहले और अब, आतंकवाद को लेकर कितने बदले कश्मीरी? जानिए सच

Pahalgam Terror: कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले ने एक तरफ पूरे देश को शोक में डुबो दिया तो दूसरी तरफ कश्मीर से ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिन्हें पिछले 35 साल में देखा जाना सिर्फ एक सपने के जैसा था। कश्मीर के रहने वाले मीरवाइज ने 25 अप्रैल को श्रीनगर की जामिया मस्जिद में एक धार्मिक उपदेश के दौरान पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की। यह वो ही जामिया मस्जिद है जहां से कभी अलगाववाद के नारे और अलगाववादियों के पक्ष में बात होती थी। एक दशक पहले तक जैसे ही शुक्रवार आता था, तो सेना के अलर्ट हो जाती थी कि इस मस्जिद से जुमे की नमाज के बाद एक भीड़ निकलेगी जो सेना पर पत्थर बरसाएगी। पत्थरबाज अलगाववादियों का ये मस्जिद पुराना ठिकाना रही है। लेकिन अब इसी मस्जिद से आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ आवाज उठना, आतंकी हमले की निंदा किया जाना बताता है कि पिछले 10 साल में कश्मीर प्रगति के रास्ते पर कितना आगे निकल आया है।

10 साल में कितनी बदली श्रीनगर की जामिया मस्जिद

श्रीनगर की जामिया मस्जिद में अब शुक्रवार की नमाज भी अमन के साथ अदा की जाती है और नमाज के बाद सभी धार्मिक सद्भावना के साथ अपने-अपने काम पर जाते हैं। यहां तक कि अब इस मस्जिद को अतिसंवेदनशील इलाकों की सूची से बाहर रखा गया है। जो बताता है कि अगर अपवादों को छोड़ दें तो, कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद आतंकवाद और अलगाववाद के लिए कोई जगह नहीं बची।

Pahalgam Terror

पहलगाम आतंकी घटना से पूरे कश्मीर में गुस्सा

पहलगाम की घटना के बाद पूरे भारत समेत कश्मीर में भी विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसमें मशाल के साथ जुलूस निकालकर पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ कश्मिीरी नागरिकों ने अपना गुस्सा जाहिर किया गया, जिसमें हिन्दू, मुस्लिम और सिख तीनों ही समुदाय के लोग शामिल थे। यह एकजुटता बताती है कि कश्मीर में पाकिस्तान को अब घुसपैठ की इजाजत नागरिक स्तर पर अस्वीकार है। क्योंकि यह 35 सालों में इस तरह के आतंकवाद के खिलाफ पहली बार कश्मीरियों ने पूर्ण बंद का ऐलान किया और खुद इसकी पहल की। हालांकि यह एकजुटता सभी मुद्दों को हल नहीं करेगी, लेकिन यह क्षेत्र के लिए एक उम्मीद का संकेत है। जो देश के बाकी हिस्सों से आने वाले लोगों के प्रति अपनापन उजागर करता है।

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कश्मीरी युवा पाकिस्तान के खिलाफ

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन(ORF) की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 से, कई युवा कश्मीरियों ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की निंदा करते हुए भारत के साथ रहने में दिलचस्पी दिखाई है। वे पहलगाम हमले को अपनी शांति आकांक्षाओं के लिए सजा के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि इस बार उनके रोजगार पर हमला पाकिस्तान ने किया है, क्योंकि अनुच्छेद 370 हटने के बाद स्थानीय व्यापार को पर्यटन से जो मुनाफा हो रहा था, ये हमला सीधा उस पर चोट है। कुछ असमाजिक तत्वों द्वारा एकीकरण का विरोध करने के बावजूद, ये युवा सतर्क रहते हैं और समाज के भीतर पनप रहे खतरों की पहचान करने में सुरक्षा एजेंसियों की सहायता करते हैं।

जब कश्मीरियों की हो रही थी प्रगति तब हुआ हमला

आतंकवादी हमला उस समय हुआ जब कश्मीर भारत के साथ आर्थिक और राजनीतिक रूप से आगे बढ़ रहा था। अनुच्छेद 370 और 35ए के निरस्त होने के बाद अलगाववाद और आतंकवाद अपने सबसे निचले स्तर पर था। 2019 से पहले, अनुच्छेद 370 के कारण कश्मीर में आतंकवाद और भ्रष्टाचार की जद में था, जिसने क्षेत्रीय दलों को अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। लेकिन 2020 से कश्मीरियों की शुरु हुई प्रगति 2025 में बहुत तेज गति पकड़ चुकी थी, यहां तक कि विदेशी डेलिगेशन और पर्यटकों का भी कश्मीर में आवागमन बढ़ गया था।

अलगाववादियों के लिए बंद हुआ समर्थन

2019 के बाद के सुधारों ने जमात-ए-इस्लामी, जैश-ए-मोहम्मद जैसे तमाम पाकिस्तानी गठबंधनों को खत्म कर दिया और आतंकवादी नेटवर्क को उनके निचले स्तर पर पहुंचा दिया। जवाब में, आतंकवादियों ने कश्मीर टाइगर्स और द रेजिस्टेंस फ्रंट जैसे नए समूह बनाए। लेकिन नाम मात्र के समर्थन और बढ़े हुए सुरक्षा उपायों के कारण इन समूहों ने अपनी रणनीति बदल दी। कश्मीरियों ने घाटी में टारगेट किलिंग्स का विरोध किया, उन्हें हिंसा भड़काने की कोशिश माना। पहलगाम हमले ने 'हम हिंदुस्तानी हैं' और 'आतंकवाद मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए, जिससे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन अचम्भे में पड़ गए। दबाव में, द रेजिस्टेंस फ्रंट ने हमले में शामिल होने से इनकार कर दिया। जो पहले इस हमले की जिम्मेदारी लेना चाहता था

आतंकियों ने कश्मीरियों को बनाया निशाना

कश्मीर में लोगों की भावनाएं उनके खिलाफ होने के कारण आतंकवादियों ने ऐसे लोगों की हत्याएं करना शुरू किया जो थे तो कश्मीरी लेकिन उनकी आवाज आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ थी। 27 अप्रैल 2025 को कुपवाड़ा जिले में स्थानीय लोगों में डर पैदा करने के लिए एक स्थानीय शख्स की हत्या इसी कड़ी की एक कोशिश थी। इन बदलावों के बीच पाकिस्तानी मीडिया द्वारा फैलाई गई गलत सूचनाएं चिंता का विषय बन गईं, लेकिन उनका असर नहीं हो सका।

पाक मीडिया की फैलाई गलत खबरें बेअसर

पहलगाम हमले के बाद, पाकिस्तानी मीडिया ने झूठा दावा किया कि यह हमला सरकार द्वारा करवाया गया था। पाकिस्तान के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दुष्प्रचार करने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए फेक वीडियो को बढ़ावा दिया। कुछ अकाउंट्स ने तो पुराने वीडियो का इस्तेमाल करके झूठा दावा किया कि कश्मीरी छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है। लेकिन जब स्थानीय लोगों को धरातल पर ऐसा कुछ नजर नहीं आया तो वे पाकिस्तान की चाल समझ गए।

चुनौतियों के बीच सुरक्षा सुनिश्चित करना

अन्य राज्यों में कश्मीरियों के खिलाफ़ कुछ धमकाने की घटनाओं के बावजूद, सरकारों ने उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए। एक मामले में, पुलिस ने कश्मीरियों को धमकाने वाले व्यक्ति के खिलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की और तनाव को शांत करने के लिए छात्रों से मुलाक़ात की। पहलगाम हमले ने पूरे भारत को शोक में एकजुट कर दिया है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के निवासी भी शामिल हैं। हालांकि, कुछ सोशल मीडिया पोर्टल पाकिस्तान और क्षेत्रीय नेताओं द्वारा प्रचारित झूठी कहानियों को फैलाना जारी रखते हैं। कश्मीरियों के लिए इन कहानियों का शिकार होने से बचना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए सरकार ने ऐसे कई चैनल्स और अकाउंट्स को भारत में बैन कर दिया है।

पहलगाम हमले में पाक की खुली पोल

इस हमले के ज़रिए साम्प्रदायिक तनाव पैदा करनेे में पाकिस्तान की आर्मी और सरकार की भूमिका की विफलता, कश्मीरियों की भारत के साथ बढ़ते अपनेपन की इच्छा को दिखाती है। इन चुनौतियों के बीच यह समझना ज़रूरी है कि युद्ध में पूरा देश शामिल है। इसलिए पाकिस्तान को इस हमले के बाद दोहरी चोट मिलना तय है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कॉमेंट में जरूर बताएं।

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