चांद की मिट्टी से निकलेगी ऑक्सीजन? NASA के वैज्ञानिकों ने खोज लिया तरीका, इंसानी बस्ती का सपना होगा पूरा!
नासा वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च किया है, जिसके चलते भविष्य में चंद्रमा की मिट्टी से ही ऑक्सीजन निकालने का काम संभव हो सकता है। यह न सिर्फ चंद्रमा मिशन के लिए, बल्कि बाकी अंतरिक्ष मिशन के लिए भी बड़ी सफलता है।

चंद्रमा पर ऑक्सीजन नहीं है, इसलिए वैज्ञानिक वहां अपने मिशन को लंबे समय तक ठहरने की व्यवस्था नहीं कर पा रहे। अगर वहीं पर ऑक्सीजन उपलब्ध हो जाए तो अंतरिक्ष के कई रहस्यों को वहीं पर देर तक ठहर कर खोला जा सकता है। वह व्यवहारिक रूप से पृथ्वी के एक सेंटर के तौर पर कार्य सकता है। अब जाकर वैज्ञानिकों को उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी है।

चांद पर ऑक्सीजन की आवश्यकता
अगर चांद की मिट्टी से ऑक्सीजन निकाला जा सकता है तो वहां इंसानी बस्तियां भी बसाई जा सकती हैं। नासा के वैज्ञानिकों ने इसी दिशा में काम को आगे बढ़ाया है। अगर चांद पर ही ऑक्सीजन की व्यवस्था हो जाती है तो वहां इंसानी जीवन तो संभव हो ही सकता है, उस ऑक्सीजन का इस्तेमाल वहां से आगे की दुनिया में गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्रणोदक के रूप में भी किया जा सकता है।

चंद्रमा की मिट्टी से निकलेगी ऑक्सीजन!
दरअसल, नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर में वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की कृत्रिम मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने में कामयाबी हासिल की है। पहली बार ऐसा शून्य वातावरण में किया गया है और वैज्ञानिकों को लगता है कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि चंद्रमा की मिट्टी ही, ऑक्सीजन की प्रमुख स्रोत बन जाएगी।

कैसे निकाली गई ऑक्सीजन?
चंद्रमा की कृत्रिम मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने के लिए नासा के वैज्ञानिकों ने एक खास तरह के गोलाकार चैंबर का इस्तेमाल किया। इसका व्यास 15 फीट है, जिसे डर्टी थर्मल वैक्युम चैंबर कहा जाता है। इस परीक्षण के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग उसी तरह की परिस्थितियां तैयार कीं, जो चांद पर पाया जाता है।

नासा के मुताबिक यहां डर्टी का मतलब अशुद्ध नमूनों से है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने इस परीक्षण के बारे में बताया, 'टीम ने कृत्रिम ऊष्मा के लिए सोलर एनर्जी कंसंट्रेटर से उच्च-शक्ति के लेजर का उपयोग किया और एक कार्बोथर्मल रिएक्टर के भीतर चंद्रमा की बनाबटी मिट्टी को पिघलाया।'
इस तरह से निकाला कार्बन मोनोऑक्साइड
इसी रिएक्टर में गर्म करने और ऑक्सीजन निकालने की प्रक्रिया पूरी होती है। पृथ्वी पर दशकों से इसी तरह से सोलर पैनल और इस्पात का निर्माण होता आया है। जैसे ही मिट्टी गर्म हो गई, टीम ने मास स्पेक्ट्रोमीटर ऑब्जर्विंग लुनर ऑपरेशन (MSolo) उपकरण से कार्बन मोनोऑक्साइड खोज लिया।
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चांद पर भेजा जाएगा यह उपकरण
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भेजे जाने वाले अगले दो मिशनों के साथ वैज्ञानिक इसी तरह का उपकरण भेजेंगे। यह दो मिशन हैं- 2023 में पोलर रिसोर्सेज आइस माइनिंग एक्सपेरिमेंट-1 और नवंबर 2024 में नासा के वोलाटाइल्स इंवेस्टिगेटिंग पोलर एक्सप्लोरेशन रोवर (VIPER)।

मिट्टी की वजह से कई गुना ज्यादा ऑक्सीजन निकलने की संभावना
नासा के सीनियर इंजीनियर और जॉनसन में कार्ड प्रोजेक्ट मैनेजर ऐरोन पाज ने कहा, 'इस तकनीक में चांद की सतह पर सालाना अपने खुद के वजन से कई गुना ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करने की क्षमता है। इससे वहां इंसानी मौजूदगी सुनिश्चित हो सकेगी और चांद की अर्थव्यवस्था भी चलेगी।'

चांद पर भेजा जाएगा यह उपकरण
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रोटोटाइप स्पेस में परीक्षण के लिए तैयार है। नासा विभिन्न मिशनों के माध्यम से अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर भेजने की योजना पर काम कर रहा है। उसका लक्ष्य है कि लंबे समय तक अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर ठहरने की व्यवस्था हो सके। इस दिशा में वहां ऑक्सीजन की उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण है और ताजा रिसर्च इस दिशा में बड़ी उम्मीदें जगा रहा है। (तस्वीरें- प्रतीकात्मक)












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