धधकने लगा हमारा प्लानेट, सबक सीखने को नहीं है दुनिया तैयार... क्या ग्लोबल साउथ बनेगा पृथ्वी का पहरेदार?

Climate Change: हमारी धरती अब सुलगने लगी है, धधकने लगी है और जलने लगी हैं और अब भी अगर दुनिया ने ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन को मजाक समझा, तो पृथ्वी से इंसानों के नामोनिशान मिटने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की मई के मध्य में आई लेटेस्ट ग्लोबल वार्मिंग भविष्यवाणियों ने मानव सभ्यता के सामने खतरे की घंटी बजा दी है। डब्ल्यूएमओ ने चेतावनी दी है, कि औद्योगिक क्रांति से लेकर अगले पांच वर्षों में दुनिया में पहली बार तापमान औद्योगिक युग के बाद 1.5 डिग्री सेल्सियल बढ़ जाएगी और डेढ़ डिग्री तापमान के बढ़ने का मतलब है, हजारों-हजार लोगों की मौत, क्योंकि सिर्फ इस साल, भीषण धूप की वजह से भारत और पाकिस्तान में कई सौ लोग मारे गये हैं।

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ग्लोबल वॉर्मिंग पर खतरनाक रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र के मौसम विभाग ने आशंका जताई है, कि साल 2100 तक दुनिया का तापमान डेढ़ डिग्री सेल्सियस कम करने का जो लक्ष्य दुनिया ने बनाया है, शायद ही उस तक पहुंचा जा सकता है, लिहाजा इंसाों के आगे विनाश अपने मुंह को लगातार फैला रहा है।

पूरी दुनिया में अब साजिशन या प्राकृतिक वजहों से, साल भर जंगलों में भीषण आग लगती है। जंगल में आग लगाने के पीछे बड़े बड़े माफिया का हाथ होता है, जिसका मकसद जंगलों पर कब्जा करना होता है, जिसमें कई सरकारें भी माफिया के साथ मिली होती हैं। जैसे ब्राजील के अमेजन के जंगल में लगी आग में हजारों-हजार एकड़ जंगल का जल जाना और लाखों जानवरों का जलकर मर जाना, बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा है।

इसके अलावा, पिछले दो सालों से लगातार कनाडा और अमेरिका के जंगलों में आग लग रही है, लेकिन आग कैसे लगती है, इसकी जांच के बजाए अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय देश, भारत और चीन पर कोयले का इस्तेमाल रोकने के लिए दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। जबकि, अमेरिका और कनाडा में पिछले दो सालों में जो गर्मी पड़ी है, जो लू चली है, उसमें हजार से ज्यादा लोग मारे गये हैं। जबकि, पिछले साल पाकिस्तान में आई विनाशकारी बाढ़ एक ट्रेलर है, कि प्रकृति को बर्बाद करने का अंजाम क्या हो सकता है।

तो क्या वाकई साल 2100 तक दुनिया में तापमान को डेढ़ डिग्री सेल्सियस कम करने के लक्ष्य को पाया जा सकता है? क्या दुनिया को बचाने की अभी भी उम्मीद बाकी है? क्या जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है? ऐसे कई सवाल हैं, जिनका उत्तर जानना जरूरी है।

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क्या हैं इन सवालों के जवाब?

यूरोप और अमेरिका अपना विकास कर चुके हैं और अब विकास की बारी विकासशील देशों की है, लिहाजा चीन और भारत जैसे देशों का कहना है, कि वो भला अपने हितों से समझौता क्यों करे?

इसके अलावा, करीब करीब सभी विकसित देशों ने जलवायु परिवर्तन को लेकर यूनाइटेड नेशंस में जो वादा किया था, उसे निभाने में नाकाम साबित हो गये हैं, जिनमें अमेरिका और यूरोपीय देश शामिल हैं। लेकिन कई विकासशील देश, जैसे गाम्बिया, कोस्टा रिका, मोरक्को और माली, एक ऐसे संकट से लड़ने के लिए कई साहसिक कदम उठा रहे हैं, जिसके लिए वो कभी जिम्मेदार नहीं रहे हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे खतरनाक असर इन्हीं देशों पर पड़ता है।

लेकिन, इन देशों के साहसिक कदम नाकाफी हैं, क्योंकि उन्हें दुनिया से मदद नहीं मिलती है।

अफ्रीकी देश गाम्बिया प्रकृति के कहर से कांपता रहता है। आए दिन तूफानी बारिश इस देश में हर साल सैकड़ों लोगों को बेमौत मारती है। लोग यह तक तय नहीं कर पाते हैं, कि वो तूफानी बारिश में घर के अंदर रहकर दीवार गिरने से दबकर मरें, या घर से बाहर निकलकर प्रचंड बारिश और बाढ़ में बहकर अपनी जान दें।

गाम्बिया में आने वाला तूफान एक झटके में सैकड़ों घरों की छतों को अपने साथ उड़ाकर ले जाता है, दीवारें धाराशाई हो जाती हैं और फिर भीषण बाढ़ तबाही मचाती है।

क्या ग्लोबल साउथ रोक पाएगा विनाश?

लगातार बढ़ती विकास संबंधित आवश्यकताओं के बोझ तले दबे दबे विकासशील देश अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वनों और पहाड़ों का संहार कर रहे हैं, जिसमें चीन और भारत जैसे देश शामिल हैं, जो तेजी से विकसित होना चाहते हैं। लिहाजा, कई विकासशील देश अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

लेकिन, गाम्बिया वो देश है, जिसने 2015 के पेरिस समझौते को पूरा किया है। क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर ने गाम्बिया के कदमों को 'लगभग पर्याप्त' कहा है और ऐसा तब हुआ, जब इस देश ने कार्बन उत्सर्जन के तेजी से कम किया और कोयले के इस्तेमाल पर रोक के लिए कई कदम उठाए।

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शोध से पता चलता है, कि उप-सारा अफ्रीका में, 2050 तक अपने ही देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण करीब 9 करोड़ विस्थापित हो सकते हैं, और उत्तरी अफ्रीका में 1.9 करोड़ लोग विस्थापित हो सकते हैं। मार्च 2023 में दक्षिणी अफ्रीका में आए चक्रवात फ्रेडी ने मलावी में लगभग 660,000 लोगों को विस्थापित होने के लिए मजबूर किया था।

लिहाजा, अगर ग्लोबल साउथ ने फौरन जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सख्ती से तेज कदम नहीं उठाए, तो साल 2100 तक दुनिया की क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है और उस वक्त इंसानों का ये विकास धरा का धरा रह जाएगा।

भारत ने हर एक प्लेटफॉर्म पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कारगर कदम उठाने की वकालत की है और भारत ने खुद 2050 तक कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन पश्चिमी देशों की चालबाजियां अभी भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। पश्चिमी देश चाहते हैं, कि भारत अपने पूरे लक्ष्य को पूरा करे, लेकिन उन्हें आजादी मिलती रहे, लिहाजा अब भारत की जिम्मेदारी है, कि वो एक जिम्मेदार देश बनकर पृथ्वी को बचाए।

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