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हेनरी किसिंजर की गाली, बिल क्लिंटन का प्रतिबंध... रेड कार्पेट बिछाकर भारत का स्वागत क्यों कर रहा अमेरिका?

India-US Relation: जियो-पॉलिटिक्स में कहा जाता है, कि कोई भी देश किसी दूसरे देश का ना तो स्थाई दुश्मन होता है और ना ही स्थाई दोस्त। एक वक्त एक दूसरे के खिलाफ खड़े रहने वाले चीन और रूस, आज बेहतरीन संबंधों का आनंद ले रहे हैं, तो एक वक्त अमेरिका का पिट्ठू बना पाकिस्तान, चीन के खेमे में खड़ा है।

लेकिन, बात अगर भारत की करें, तो भारत और अमेरिका के संबंध इतिहास में कभी मधुर नहीं रहे हैं। याद कीजिए भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ा गया 1971 का युद्ध, जिसमें भारत के खिलाफ अमेरिका ने अपना सातवां बेड़ा भेज दिया था और अगर रूस की मदद भारत को नहीं मिलती, तो शायद युद्ध का परिणाम कुछ और हो सकता था।

India-US Relation

भारत से खार खाता रहा है अमेरिका

इतिहास में थोड़ा और आगे बढ़ते हैं, तो याद आता है वो मशहूर वाकया, जब अमेरिका के पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया था, लेकिन उस घटना के 52 सालों के बाद अब जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका की राजकीय यात्रा पर जा रहे हैं, तो उसी हेनरी किसिंजर ने भारत को दुनिया का उभरती हुई शक्ति करार दिया है।

साल 1971 में जब इंदिरा गांधी ने अमेरिका का दौरा किया था, उस वक्त हेनरी किसिंजर अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हुआ करते थे, जबकि राष्ट्रपति थे रिचर्ड निक्शन। उस दौरान निक्शन ने अपने दफ्तर के बाद इंदिरा गांधी को इंतजार कराया था और हेनरी किसिंजर ने भारतीयों को गाली तक दे दी थी।

वक्त आगे बढ़ता गया और भारत अपने बलबूते पर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ता चला गया। फिर साल आया 1998-99 का, जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अमेरिकी धमकियों को दरकिनार करते हुए पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था।

अमेरिका नहीं चाहता था, कि भारत एक परमाणु संपन्न देश बने, लिहाजा परमाणु परीक्षण के बाद भारत को दंडित करने के लिए अमेरिका ने प्रतिबंधों के जाल में हमें जकड़ दिया। उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे बिल क्लिंटन। बिल क्लिंटन ने भारत पर प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए अमेरिका में ना सिर्फ भारतीय कंपनियों को फ्रीज कर दिया, बल्कि भारत को आर्थिक तौर पर परेशान करने के लिए कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।

स्थिति ये हो गई, कि अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने भारत को ऋण देना बंद कर दिया, लेकिन भारत पर उन प्रतिबंधों का रत्ती भर भी असर नहीं हुआ। अलबत्ता, भारत और मजबूत बनकर उभरा।

सख्त प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिका को सिर्फ जापान का साथ मिला, जबकि दुनिया के बाकी सभी देशों ने भारत के साथ व्यापार करना जारी रखा। कुछ ही महीनों में अमेरिका को लगने लगा, कि उसके प्रतिबंध फेल साबित हो गये हैं, लिहाजा अमेरिका ने प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा कर दी और पहली बार अमेरिका को भारत की शक्ति का अहसास हुआ।

बाद में बिल क्लिंटन और अटल बिहारी बाजपेयी मिले और दोनों देशों के बीच के संबंध का पुनर्निमाण हुआ। मार्च 2003 में बिल क्लिंटन भारत के दौरे पर आए और उस वक्त पहली बार दोनों देशों के बीच इंडो-यूएस साइंस एंड टेक्नोलॉजी फोरम की स्थापना की गई।

यूपीए के शासनकाल के दौरान भारत और अमेरिका के संबंधों में पहली बार तेजी देखी गई और पहली बार तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भारत को लेकन ऐतिहासिक बयान दिया। जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अपने बयान में कहा...

"भारत लोकतंत्र का एक महान उदाहरण है और भारत एक बहुत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। भारत में अनेकों धर्म है, लेकिन हर धर्म के लोग अपने अपने धर्म को लेकर सहज हैं। अब दुनिया को भारत की जरूरत है।" यानि, अमेरिका ने 2004 के बाद पहली बार माना, कि अब दुनिया को भारत की जरूरत है। साल 2004 के बाद अमेरिका ने भारत को लेकर अपनी नीति में परिवर्तन किया और फिर मोदी सरकार के कार्यकाल में दोनों देश रणनीतिक पार्टनर बन गये।

हालांकि, अभी भी भारत अमेरिकी खेमे में नहीं खड़ा है, बल्कि भारत रणनीति पार्टनर है, कोई सैन्य पार्टनर नहीं। भारत ने अपनी विदेश नीति से थोड़ा अलग रूख रखते हुए साफ शब्दों में दुनिया को बताया, कि भारत अब अपने हितों की बात करेगा और अपने हितों को देखते हुए वैश्विक संबंध बनाएगा।

भारत के लिए अमेरिका का रेड कार्पेट

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वागत के लिए अमेरिका रेड कार्पेट बिछा चुका है और ये सिर्फ कहने की बात नहीं है, बल्कि हकीकत में अमेरिका, भारत के आगे 'प्रणाम' की मुद्रा में आ चुका है। पूरी दुनिया महसूस कर रही है, कि अमेरिका कमजोर हो रहा है और दुनिया को अब समझ में आ चुका है, कि अमेरिका की विदेश नीति पहली बार कमजोर हो रही है।

चीन और रूस के आगे अमेरिका बेबस नजर आ रहा है। लाख कोशिशों के बाद भी अमेरिका, रूस को यूक्रेन पर हमला करने से रोक नहीं पाया, तालिबान की हकीकत जानने के बाद भी अमेरिका को अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा और अब इंडो-पैसिफिक में चीन की आक्रामकता ने अमेरिका को डरा दिया है। सुपरपावर अमेरिका को पहली बार अपनी पॉजिशन को लेकर डर सता रहा है और पहली बार अमेरिका मान रहा है, कि भारत दुनिया की शक्ति बन चुका है।

जो अमेरिका टेक्नोलॉजी को लेकर बात तक नहीं करता था, वो अमेरिका भारत को जेट इंजन, मिलिट्री बख्तरबंद वाहन और ड्रोन की टेक्नोलॉजी दे रहा है। अमेरिका हमारे साथ क्रिटिकल टेक्नोलॉजी को लेकर iCET डील कर चुका है और अमेरिका इस बात को स्वीकर कर चुका है, कि भारत रूस के साथ अपनी मर्जी से संबंध रखने के लिए स्वतंत्र है।

हालांकि, कई एक्सपर्ट्स अभी भी मानते हैं, कि भारत से रिश्तों को मजबूत कर अमेरिका अपना उल्लू सीधा कर रहा है, लेकिन शायद अमेरिका अभी भी नहीं जानता है, कि भारतीयों के मन में हमेशा अमेरिका को लेकर एक 'शक' रहता है और भारत के लोग अमेरिका के ऊपर, आंख बंदकर विश्वास नहीं कर सकते, जिस तरह से संकट के साथी रूस पर करते हैं।

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